जमशेदपुर, 18 सितंबर
हिंदी साहित्य के युगपुरुष भारतेंदु हरिश्चंद्र की साहित्यिक चेतना, भाषा-दृष्टि, सांस्कृतिक सरोकार, राष्ट्रीय भावना तथा आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास में उनके योगदान को केंद्र में रखते हुए ‘भारतेंदु साहित्य उत्सव’ का भव्य आयोजन आज एल.बी.एस.एम. कॉलेज, जमशेदपुर के सेमिनार हॉल में किया गया।
यह आयोजन अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, झारखंड एवं साहित्य कला परिषद्, एल.बी.एस.एम. कॉलेज, जमशेदपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 10:00 बजे दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। साहित्यकारों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं कवियों की उल्लेखनीय उपस्थिति ने आयोजन को गरिमामय बनाया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अशोक कुमार सिंह, अध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, झारखंड प्रदेश ने की। कार्यक्रम के समन्वयक एवं संयोजक सूरज सिंह राजपूत, महामंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, जमशेदपुर महानगर रहे, जबकि स्वागताध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल’, प्रधानाचार्य, एल.बी.एस.एम. कॉलेज, जमशेदपुर रहे।
उद्घाटन सत्र में साहित्यिक विमर्श एवं पुस्तक लोकार्पण
उद्घाटन सत्र में अतिथियों के स्वागत एवं सम्मान के पश्चात डॉ. विजय प्रकाश, महामंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, झारखंड ने स्वागत भाषण दिया। इसके बाद डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल’ ने विषय प्रवेश एवं बीज भाषण प्रस्तुत करते हुए भारतेंदु युग की साहित्यिक एवं सामाजिक चेतना पर प्रकाश डाला।
डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल’ ने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि भारतेंदु साहित्य उत्सव केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः स्मरण करने का अवसर है। उन्होंने अतिथियों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों, कवियों एवं साहित्यप्रेमियों का स्वागत करते हुए कहा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी साहित्य को आधुनिक दृष्टि, सामाजिक सरोकार और राष्ट्रीय चेतना से समृद्ध किया।
उन्होंने रेखांकित किया कि भारतेंदु की साहित्यिक दृष्टि में भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जागृत करने और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत करने का साधन थी। आज के दौर में भारतेंदु के विचारों और साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुँचाना साहित्यकारों और शिक्षण संस्थानों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
डॉ. ‘अविचल’ ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली सृजनात्मक शक्ति भी है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से साहित्य, शिक्षा और संस्कृति के बीच संवाद को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने भारतेंदु साहित्य उत्सव में देश-प्रदेश के साहित्यकारों की सहभागिता को हिंदी जगत के लिए महत्वपूर्ण बताया और सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर विभिन्न विधाओं की महत्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। लोकार्पित पुस्तकों में—
‘भारतेंदु राजश्री जयंती’ — डॉ. राजश्री जयंती, रांची,‘कानन दीप’ — एल.बी.एस.एम. कॉलेज पत्रिका,‘स्वयं की तलाश’ — काव्य संग्रह, सोनम झा, देवघर,‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ — डॉ. संतोष कुमार,‘नीम तले क्षणती ला’ — रचना झा, देवघर प्रमुख रहीं।
कार्यक्रम में वैभव मणि त्रिपाठी, वरीय निबंधक, जमशेदपुर तथा विमल जलान, अध्यक्ष, पूर्ववर्ती छात्रसंघ, एल.बी.एस.एम. कॉलेज की विशिष्ट उपस्थिति रही।
‘भारतेंदु साहित्य रत्न’ सम्मान
भारतेंदु साहित्य एवं हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘भारतेंदु साहित्य रत्न सम्मान’ से—
डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल’, जमशेदपुर,डॉ. राजश्री जयंती, झारखंड,डॉ. विजय शंकर, देवघर, झारखंड
को सम्मानित किया गया।
उद्घाटन सत्र का संचालन प्रो. बिनोद कुमार ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. विनय कुमार गुप्ता ने किया।
डॉ. अशोक कुमार सिंह ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में निम्न प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित किया—
भारतेंदु हरिश्चंद्र का साहित्य राष्ट्रीय चेतना का सशक्त माध्यम रहा, जिसने समाज में स्वाभिमान और जागरूकता का भाव उत्पन्न किया।
भारतेंदु ने साहित्य को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा और अपने समय की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय परिस्थितियों को रचनात्मक अभिव्यक्ति दी।
हिंदी भाषा के विकास और प्रतिष्ठा में भारतेंदु का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा, जिसके कारण उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माण-काल की प्रमुख विभूति माना जाता है।
साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली शक्ति है। वर्तमान समय में भी साहित्यकारों को सामाजिक और राष्ट्रीय प्रश्नों के प्रति सजग रहना चाहिए।
भारतेंदु की पत्रकारिता और साहित्यिक गतिविधियों ने जनजागरण को गति दी, जिससे हिंदी समाज में नई वैचारिक चेतना का निर्माण हुआ।
भारतीय संस्कृति, परंपरा और आधुनिक चेतना के समन्वय में भारतेंदु साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को भारतेंदु के साहित्य से जोड़ना समय की आवश्यकता है, ताकि साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना मजबूत हो।
तकनीकी सत्र में हुआ भारतेंदु साहित्य का व्यापक विमर्श
उद्घाटन सत्र के बाद आयोजित तकनीकी सत्र का मूल विषय ‘भारतेंदु साहित्य विमर्श’ रहा। सत्र में भारतेंदु साहित्य के विभिन्न आयामों पर विद्वानों ने अपने विचार रखे।
‘भारतेंदु साहित्य में भाषा विमर्श’ विषय पर डॉ. लक्ष्मण प्रसाद चन्द,
‘भारतेंदु साहित्य में संस्कृति विमर्श’ विषय पर डॉ. संजय मिश्रा,
‘भारतेंदु साहित्य में राष्ट्रीय भावना’ विषय पर जय प्रकाश राय, संपादक , चमकता आईना, ने अपने व्याख्यान में भारतेंदु साहित्य में राष्ट्रप्रेम, स्वदेशी भावना, भारतीय संस्कृति, हिंदी भाषा के उत्थान, सामाजिक जागरण तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान के स्वर पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतेंदु का साहित्य तत्कालीन समाज को जागृत करने और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने का सशक्त माध्यम था।
‘भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर आनंदमठ का प्रभाव’ विषय पर डॉ. प्रसेनजीत तिवारी, मानद महासचिव, हिंदी साहित्य सम्मेलन, तुलसी भवन, ने अपने सारगर्भित व्याख्यान में आनंदमठ के माध्यम से भारतीय राष्ट्रीय चेतना के जागरण, मातृभूमि-प्रेम और स्वतंत्रता की भावना के प्रसार पर प्रकाश डाला। उन्होंने सनातन परंपरा और सरना संस्कृति की प्रकृति-आस्था, मातृभूमि के प्रति श्रद्धा तथा सांस्कृतिक चेतना के संदर्भ में राष्ट्रीय आंदोलन से उनके जुड़ाव को रेखांकित किया।
‘भारतेंदु कालीन भारत’ विषय पर क्षमा त्रिपाठी ने अपने विचार प्रस्तुत किए।
तकनीकी सत्र की अध्यक्षता जय प्रकाश राय ने की तथा संचालन डॉ. सुधीर कुमार सुमन ने किया।
भव्य कवि सम्मेलन बना आयोजन का प्रमुख आकर्षण
अपराह्न 2:30 बजे से आयोजित भव्य कवि सम्मेलन ने साहित्यिक उत्सव को काव्यात्मक ऊँचाई प्रदान की। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल’ ने की तथा मंच संचालन सूरज सिंह राजपूत ने किया।
कवि सम्मेलन में बिहार, झारखंड एवं विभिन्न क्षेत्रों से आए कवियों ने अपनी रचनाओं का प्रभावशाली काव्य-पाठ किया। इसमें भानु प्रताप सिंह, आरा (भोजपुर) सहित जॉबा मुर्मू, दुबरौली हो, विजय शंकर मिश्रा, ओमेश पाठक, चंद्रकांत सिंह, सत्यनारायण तिवारी, के. डी. शरद, ममचंद्र अग्रवाल, आरती श्रीवास्तव, संगीता मिश्रा, सुष्मिता मिश्रा, सुदीप्ता जेठी राउत, प्रेमलता कुमारी, रचना झा, सोनम झा, बिनोद कुमार, विनय गुप्ता, नूतन झा सहित अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।
कवि सम्मेलन में हिंदी एवं क्षेत्रीय साहित्य की विविध विधाओं और संवेदनाओं का सुंदर समागम देखने को मिला।
साहित्य और संस्कृति का महत्वपूर्ण संगम
भारतेंदु साहित्य उत्सव केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि हिंदी भाषा, साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के विविध पक्षों को एक मंच पर लाने का महत्वपूर्ण प्रयास रहा। कार्यक्रम में भारतेंदु हरिश्चंद्र की साहित्यिक दृष्टि और उनके समय के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश पर गंभीर विमर्श के साथ-साथ समकालीन साहित्य की रचनात्मक अभिव्यक्ति भी देखने को मिली।
आयोजन ने साहित्यकारों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं कवियों को एक साझा मंच प्रदान करते हुए हिंदी साहित्य के अध्ययन, संवाद और सृजन की परंपरा को आगे बढ़ाने का संदेश दिया।
