कड़वा सच- कछुए की चाल चलता सिस्टम और सडक़ों पर मौत का तांडव

फोटो- एग्रिको में हादसे के शिकार पिता और मासूम पुत्र
जमसेदपुर 15 सितंबर जमशेदपुर में भारी वाहनों का परिचालन किस तरह कभी भी मौत बनकर सामने आ सकता है, यह शहर के लोगों को वर्षों से परेशान करता रहा है। लेकिन एग्रिको में हाल ही में हुए दर्दनाक सडक़ हादसे में पिता-पुत्र की मौत ने इस पीड़ा को एक बार फिर आक्रोश में बदल दिया है। यह महज एक सडक़ दुर्घटना नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल है जो हादसे के बाद जागती है और फिर कुछ दिनों में सब कुछ भूल जाती है।
जमशेदपुर की अपनी एक औद्योगिक मजबूरी है। शहर के बीचोंबीच उद्योग है और उसके चारों ओर शहर बस चुका है। उद्योग को चलाने के लिए भारी वाहनों की आवाजाही जरूरी है। इसी वजह से प्रशासन ने नो-एंट्री की व्यवस्था बनाई है। दिन में दो बार दो दो घंटे के लिये भारी वाहनों की आवाजाही की इजाजत है। शाम पांच बजे तक भारी वाहनों की निकासी की इजाजत है ताकि कार्यालय और बाजार से लौटती भीड़ के बीच दुर्घटनाओं की आशंका कम हो। लेकिन एग्रिको में नो-एंट्री की अवधि समाप्त होने के महज एक घंटे के भीतर जो हुआ, उसने इस पूरी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए।
एक पिता अपने 12-13 साल के बच्चे को स्कूटी पर लेकर जा रहा था। सामने से आती जिंदगी सामान्य थी, लेकिन कुछ ही क्षणों में एक डंपर की चपेट में आकर पिता-पुत्र दोनों की दर्दनाक मौत हो गई। अस्पताल में जब मृतक की पत्नी शव के पास दहाड़ मारकर रोते हुए बार-बार कह रही थी—”उठिए ना…”—तो वहां मौजूद हर व्यक्ति का कलेजा बैठ गया होगा। यह सिर्फ एक परिवार का उजडऩा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसमें सडक़ पर निकलना भी कई बार जोखिम बन जाता है।
हादसे के बाद लोगों का आक्रोश स्वाभाविक था। सवाल सीधा था—जब भारी वाहनों के लिए समय निर्धारित है तो उसके पालन की जिम्मेदारी किसकी है? ट्रैफिक व्यवस्था क्या सिर्फ हेलमेट और सीट बेल्ट की जांच तक सीमित रह गई है? शहर के लोगों में यह धारणा लगातार मजबूत हो रही है कि ट्रैफिक पुलिस की सक्रियता का सबसे आसान तरीका चालान और जांच तक सीमित है, जबकि सडक़ पर भारी वाहनों की वास्तविक निगरानी और यातायात प्रबंधन उतना प्रभावी नहीं दिखता।
सबसे गंभीर बात यह है कि जमशेदपुर में सडक़ हादसे कोई अपवाद नहीं हैं। औसतन हर महीने करीब 19-20 लोगों की सडक़ दुर्घटनाओं में मौत होना किसी भी संवेदनशील प्रशासन के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। लेकिन इस भयावह आंकड़े पर न तो पर्याप्त सार्वजनिक बहस होती है और न ही कोई दीर्घकालिक समाधान दिखाई देता है। हादसा होता है, बयान आते हैं, कुछ दिनों तक चर्चा होती है और फिर व्यवस्था उसी ढर्रे पर लौट जाती है।
शहर को छुए बिना बाहर निकलें भारी वाहन
जमशेदपुर की इस समस्या का स्थायी समाधान वर्षों पहले खोजने की कोशिश हुई थी। औद्योगिक क्षेत्र से निकलने और प्रवेश करने वाले भारी वाहनों को सीधे हाईवे तक पहुंचाने की योजना बनाई गई थी, ताकि उन्हें शहर की आबादी और व्यस्त सडक़ों से होकर न गुजरना पड़े।
करीब डेढ़ दशक पहले टाटा स्टील के तत्कालीन वी पी संजीव पाल ने कोल्हान के करीब एक दर्जन विधायकों की मौजूदगी स्थानीय बेल्डीह क्लब में में भारी वाहनों के लिए वैकल्पिक मार्ग का विस्तृत खाका प्रस्तुत किया था। कंपनी की ओर से तब यह भरोसा भी दिया गया था कि अनुमति मिलने के बाद करीब 18 से 20 महीने में फ्लाईओवर अथवा प्रस्तावित मार्ग तैयार किया जा सकता है। जो सीधे हाई वे से कंपनी को जोड़ेगा। उस समय प्लांट क्षेत्र के आसपास जमीन चिन्हित करने और उसे खाली कराने की प्रक्रिया की चर्चा भी सामने आई थी। लेकिन बाद में यह योजना कहां चली गई, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
विडंबना यह है कि जिस समय यह योजना सामने आई थी, उस समय की तुलना में आज जमशेदपुर का औद्योगिक और लॉजिस्टिक दबाव कहीं अधिक बढ़ चुका है। उत्पादन बढ़ा है, माल की आवाजाही बढ़ी है और आने वाले दिनों में इसके और बढऩे की संभावना है। ऐसे में डेढ़ दशक पुरानी व्यवस्था के भरोसे शहर का यातायात चलाना आत्मघाती सोच से कम नहीं।
भारी वाहनों के लिए बने वैकल्पिक मार्गों और पुलों की भी यदि कहीं तकनीकी खामियां हैं तो उन्हें दूर करना होगा। एक-दो वैकल्पिक रास्ते तैयार कर देने भर से समस्या हल नहीं होगी। जरूरत ऐसी समग्र परिवहन व्यवस्था की है जिसमें कंपनियों के लिए आने-जाने वाले भारी वाहन शहर की मुख्य आबादी को छुए बिना सीधे हाईवे तक पहुंच सकें।
बस स्टैंड भी उसी बीमारी का हिस्सा
जमशेदपुर का बस स्टैंड भी इसी कुव्यवस्था का एक उदाहरण है। शहर के अत्यंत व्यस्त हिस्से में बसों की आवाजाही यातायात पर अतिरिक्त दबाव डालती है। बस स्टैंड ऐसे गोलचक्कर के पास है जहां हमेशा जाम की ही स्थिति बनी रहती है। रांची के लिये बस स्टैंड तो सडक़ से ही संचालित होता है। लंबी दूरी की बसें भी सडक़ों को आधा घेर कर पार्क की जाती हैं. कोई देखने-पूछने वाला नहीं है। वर्षों से बस स्टैंड को शहर से बाहर स्थानांतरित करने की चर्चा होती रही है, लेकिन योजना कब जमीन पर उतरेगी, इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है।
भारी वाहन, बसें, बढ़ता निजी यातायात और सीमित सडक़ ढांचा—इन सबका बोझ एक ही शहर की सडक़ों पर डालकर सुरक्षित यातायात की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
समस्या यह नहीं है कि जमशेदपुर में उद्योग है। समस्या यह है कि औद्योगिक शहर के लिए परिवहन का ढांचा उसी गति से विकसित नहीं हुआ जिस गति से उद्योग और शहर का विस्तार हुआ।
और यही सबसे बड़ा सवाल है।
हर हादसे के बाद दो-चार दिन संवेदना, बयान और कार्रवाई की बातें होती हैं। फिर फाइलें ठंडी पड़ जाती हैं और सडक़ें अपनी पुरानी रफ्तार से चलने लगती हैं। लेकिन सडक़ पर चलने वाले लोगों के लिए यह कोई फाइल नहीं, उनकी जिंदगी है।
भारी वाहनों के लिए अलग कॉरिडोर, वैकल्पिक मार्ग, नो-एंट्री के कड़ाई से पालन, बस स्टैंड का स्थानांतरण और शहर की बढ़ती औद्योगिक जरूरतों के अनुरूप परिवहन ढांचे का विस्तार—इन सब पर एक साथ काम करना होगा।
क्योंकि हर बार किसी पिता और उसके मासूम बच्चे की मौत के बाद यह कहना कि “हादसा दुर्भाग्यपूर्ण था”, पर्याप्त नहीं है।
जब खतरा वर्षों से दिखाई दे रहा हो और समाधान भी वर्षों से कागज पर मौजूद हो, फिर भी व्यवस्था आगे न बढ़े तो सवाल सिर्फ हादसे का नहीं रहता।
फिर सवाल सिस्टम की जवाबदेही का होता है।
और जमशेदपुर में यह सिस्टम सचमुच कछुए की चाल से भी धीमा चलता दिखाई दे रहा है।

Share this News...