कोचिंग संस्थानों की वर्चस्व की लड़ाई और छात्रों का भविष्य

 

 

नीट यूजी, यूजीसी और सीबीएसई विवाद के बीच बिहार में कोचिंग संस्थानों के बीच वर्चस्व की लड़ाई ने एक बार फिर शिक्षा के नाम पर चल रहे उस कड़वे सच को उजागर कर दिया है, जिसकी चर्चा लंबे समय से होती रही है। पटना के दो चर्चित कोचिंग संस्थानों से जुड़े विवाद ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों छात्रों का भविष्य किसके भरोसे है।
अब तक यह आरोप लगते रहे हैं कि कोचिंग संस्थान सफल छात्रों को अपना बताने, परिणामों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने और बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। लेकिन पटना में जो घटनाक्रम सामने आया, उसने इस प्रतिस्पर्धा का एक भयावह और हिंसक चेहरा उजागर कर दिया। शिक्षा और मार्गदर्शन का दावा करने वाले संस्थानों के बीच विवाद का इस स्तर तक पहुंच जाना चिंताजनक है।
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसमें ऐसे नाम शामिल हैं जो छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय रहे हैं। शिक्षक समाज में आदर्श माने जाते हैं और युवाओं को सही दिशा देने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर होती है। ऐसे में यदि उनके ऊपर ही गंभीर आरोप लगने लगें तो छात्रों और अभिभावकों का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। पुलिस कार्रवाई के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इस पूरे विवाद में हजारों विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर लग गया है। जिन छात्रों ने इन संस्थानों में दाखिला लेकर अपने सपनों को आकार देने की कोशिश की थी, वे आज असमंजस और तनाव की स्थिति में हैं। उनका समय, धन और मेहनत ऐसी परिस्थितियों में प्रभावित हो रही है, जिसके लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं।
राजनीतिक दलों की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। सामान्यत: शिक्षा, युवाओं और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो जाती है, लेकिन इस प्रकरण में अपेक्षाकृत सन्नाटा दिखाई दे रहा है। सबसे हैरत अंग्रेज मामला यह है कि इतना कुछ हो गया मगर राजनीतिक दलों ने रहस्यमय चुप्पी साध रखी है. एक ओर एक मुस्लिम शिक्षक है तो दूसरी ओर यादव .बिहार में इन दोनों ही समुदाय का वोट बैंक के लिहाज से खासा राजनीतिक महत्व है और कोई भी राजनीतिक दल किसी एक समुदाय को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता.यही वजह है कि  ये दल चुप हैँ.

इससे यह धारणा मजबूत होती है कि कई बार वोट बैंक की राजनीति महत्वपूर्ण मुद्दों पर खुलकर बोलने से रोक देती है।
यह घटना केवल दो संस्थानों के बीच विवाद भर नहीं है, बल्कि देश में तेजी से बढ़ते कोचिंग उद्योग की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। जब शिक्षा सेवा न रहकर कारोबार बन जाती है, तब प्रतिस्पर्धा का स्वरूप भी बदल जाता है। ऐसे में सरकार और नियामक संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोचिंग संस्थान पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक मानकों का पालन करें।
अंतत: शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों का भविष्य संवारना है, न कि उन्हें संस्थागत प्रतिस्पर्धा और विवादों का शिकार बनाना। पटना की घटना ने कोचिंग उद्योग का एक ऐसा काला सच सामने ला दिया है, जिसके बारे में अब तक फुसफुसाहट होती थी। अब जरूरत इस बात की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और यह संदेश जाए कि छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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