आदित्यपुर में उद्योग हित के मुद्दों पर सफेदपोश की चुप्पी पर सवाल स्ट्रीट लाइट शुल्क से लेकर ई-बिडिंग तक छोटे उद्यमियों की मुश्किलें बढ़ीं, एसिया, लउभा की भूमिका पर उठ रहे सवाल

जमशेदपुर। आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में उद्यमियों से जुड़े कई व्यावहारिक मुद्दे लंबे समय से चर्चा में हैं। इनमें स्ट्रीट लाइट शुल्क, ई-बिडिंग के माध्यम से भूखंड आवंटन तथा औद्योगिक क्षेत्र में छोटे उद्यमियों की पहुंच जैसे विषय प्रमुख हैं। इन मुद्दों पर उद्योग संगठनों एसिया , लघु उद्योग भारती ( लउभा) , आदि की अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखने को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं। आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र के सफेदपोश माफिया ने संघ-सांसद और संगठन के प्रभाव से अपना साम्राज्य तो बढ़ाया, उसने स्थानीय उद्योगों और उद्यमियों की भलाई पर कोई ध्यान नहीं दिया जिसका जीता जागता उदाहरण है औद्योगिक क्षेत्र में स्ट्रीट लाइट के लिये उद्यमियों से जियाडा द्वारा शुल्क वसूलना. जियाडा आवंटित उद्योग भूमि के लिये सेस और लेवी हर प्रकार के शुल्क लेती है लेकिन देश में शायद यह पहला नमूनाा होगा जब कोई संस्था उद्यमियों से स्ट्रीट लाइट के लिए पैसा वसूलती हो. शुल्क बकाया होने पर जियाडा से जुड़े उद्यमियों का कोई भी काम कागज पर आगे नहीं बढ़ सकता. स्ट्रीट लाइट शुल्क का क्लीयरेंस कराए बिना किसी काम की कोई गुंजाइश नहीं. यह माफिया आदित्यपुर में दो-दो औद्योगिक संगठनों का कर्ताधर्ता बना हुआ है, लेकिन इस मुद्दे पर कभी जोरदार आवाज या विरोध का स्वर नहीं फूटा. स्ट्रीट लाइट के लिये शुल्क चुकाना उस समय जले पर नमक छिडक़ना होता है जब शायद ही कई स्ट्रीट लाइट जलती हो लेकिन एक फिक्स्ड राशि प्लॉट के क्षेत्रफल के अनुसार उस उद्यमी को चुकाना ही पड़ता है. पता चला है कि श्रीमती वंदना डाडेल (आईएएस) के आयडा एमडी कार्यकाल में स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था बहाल की गई, तबसे लेकर आजतक उद्योग हित की बात करनेवाला यह संगठन और वह माफिया चुप्पी साधे रहते हैं. इसी तरह प्लॉटों के लिये ई-बिडिंग की व्यवस्था भी उद्योग और आम उद्यमियों के लिये बहुत बड़ी बाधक बन गई. इस व्यवस्था के चलते छोटे उद्यमियों का आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में प्रवेश असंभव सा हो गया. बड़े और संपन्न उद्यमी बिडिंग में जो रेट ऑफर कर देते हैं, वह छोटे लोगों के वश की बात नहीं. इन सारी व्यवहारिक समस्याओं पर सफेदपोश आवाज नहीं उठाता. कारण साफ दिखता है उसका मकसद उद्यमियों और उद्योग का भला करना नहीं, सिर्फ सामने अधिकारियों से रैपो कायम करना और उसे लाइजनिंग का प्लेटफॉर्म बनाना है. इस तरह की अनेक बातें देखी और सुनी जा रही है, जिसमें इस सफेदपोश ने औद्योगिक क्षेत्र में प्लॉटों पर स्वयं काबिज होने के लिये जियाडा की जी-हुजुरी की. फिलहाल उसकी दाल नहीं गल रही. कहा जाता है कि एमडी को तकनीकी सलाह देने के लिये एक सीए की योग्यता वाले शातिर व्यक्ति को जियाडा में पदस्थापित कराने में भी उस सफेदपोश का बड़ा हाथ था जिसे वर्तमान प्रशासन ने विमुक्त कर दिया है. यह सी ए एक योजना के तहत माफिया को औद्योगिक प्लॉट आवंटित कराने के लिए खास लोगों के हित में हिडेन एजेंडा चलाता रहा जिसका संदेह होने पर उसे जियाडा से हटाया गया। जारी…….

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