नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि दिल्ली और अन्य राज्य सरकारें NEET पेपर लीक को लेकर प्रदर्शनों में शामिल होने वाले छात्रों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस ले सकती हैं या बंद कर सकती हैं, बशर्ते उनका गंभीर या जघन्य अपराधों का कोई पुराना रिकॉर्ड न हो. शीर्ष अदालत ने पैलेट गन के इस्तेमाल पर एक प्रोटोकॉल तैयार करने का भी संकेत दिया.
यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष आया. शीर्ष अदालत ने साफ किया कि “आपराधिक इतिहास” शब्द का तात्पर्य केवल गंभीर और जघन्य अपराधों से है.
सुनवाई की शुरुआत में, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत के सामने दलील दी कि केंद्र सरकार गंभीर और जघन्य अपराधों के इतिहास वाले लोगों को छोड़कर, प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को आगे न बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता को लेकर गंभीर है. मेहता ने कहा कि गंभीर और जघन्य अपराधों के इतिहास वाले 2,000 से अधिक लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस नहीं ली जाएंगी.
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान वकीलों के बच्चों को भी पीटा गया था. वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन ने 28 जुलाई के आदेश पर स्पष्टीकरण मांगा, जिसने राज्यों को जांच आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी. उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता उन कुछ नामजद अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई चाहते हैं, जिनकी हिंसा की हरकतें वीडियो में कैद हुई थीं.
पीठ ने स्पष्ट किया कि 28 जुलाई के आदेश में “आपराधिक इतिहास” शब्द का अर्थ केवल “गंभीर और जघन्य अपराधों” से था. 28 जुलाई के आदेश में, पीठ ने उन छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी थी जिनका कोई “आपराधिक इतिहास” नहीं था. याचिकाकर्ताओं द्वारा इस शब्द को अस्पष्ट बताने और छोटे-मोटे अपराधों वाले छात्रों के लिए मुश्किलें पैदा होने की बात कहने के बाद अदालत ने यह स्पष्टीकरण दिया.
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि “आपराधिक इतिहास” शब्द को स्पष्ट किया जाना चाहिए ताकि ड्राइविंग उल्लंघन जैसे छोटे-मोटे अपराधों का सामना कर रहे छात्रों को उत्पीड़न का सामना न करना पड़े. जब मेहता ने कहा कि कुछ लोग हत्या और बलात्कार के आरोपों वाले भी हैं, तो वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने बायोमेट्रिक निगरानी और फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (चेहरा पहचानने वाली तकनीक) का मुद्दा उठाया.
पीठ के समक्ष यह दलील दी गई कि वीडियो बेहद चौंकाने वाले थे, और याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को 300 वीडियो सौंपे थे. यह तर्क दिया गया कि चूंकि निर्देश शीर्ष अदालत से आए हैं, इसलिए पुलिस कमिश्नर को इन सभी पर गौर करना चाहिए. याचिकाकर्ता के वकील ने दावा किया कि उन्होंने पुलिस की इस बर्बरता को अंजाम देने वाले बिना वर्दी वाले व्यक्तियों की पहचान कर ली है.
वकील ने पीठ से पुलिस कमिश्नर और आरएएफ निदेशक को निर्देश जारी करने का आग्रह किया कि पुलिस ने पैलेट गन आदि का इस्तेमाल क्यों किया. वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने अपनी हस्तक्षेप याचिका का हवाला देते हुए तर्क दिया कि एक युवा वकील हवालात में बंद लोगों की जमानत कराने पुलिस स्टेशन गया था, जिसे पुलिस ने पकड़ लिया, एक कमरे में ले गए और बेरहमी से पीटा, और यह भी जांच का हिस्सा होना चाहिए.
मेहता ने कहा कि सब कुछ जांच का हिस्सा होगा. पीठ ने साफ किया कि ऐसा संदेश नहीं जाना चाहिए कि ज्यादती में कथित तौर पर शामिल किसी पुलिस अधिकारी को प्रथम दृष्टया अनुचित रूप से बचाया जा रहा है, या कोई शातिर अपराधी छात्र आंदोलन की आड़ में काम कर रहा है.
अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि सरकार द्वारा दायर किए जाने वाले हलफनामे में सभी एफआईआर की सूची शामिल होनी चाहिए, जिसे वे किसी भी परिस्थिति में प्राप्त नहीं कर सकीं क्योंकि ये एफआईआर अलग-अलग राज्यों में हैं. मेहता ने कहा कि जो कोई भी फैसला लेने वाले नेता का प्रतिनिधित्व कर रहा है, उसे यह सूची सौंप दी जाएगी.
ग्रोवर ने कहा, “हम (सीजेपी के) नेताओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं. हम इस देश के युवाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और हम सभी उनके हितों की रक्षा करने जा रहे हैं.”
भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि युवाओं की शिक्षा बाधित नहीं होनी चाहिए, यह देखते हुए कि उनके माता-पिता भी अपनी मेहनत की कमाई खर्च कर रहे हैं और बच्चों से उनकी उम्मीदें जुड़ी हैं, खासकर यदि उन्हें अनावश्यक रूप से इसमें घसीटा गया है. CJI ने मेहता से कहा, “जवाब दाखिल करें. आपका जवाब किसी वरिष्ठ अधिकारी की ओर से हो सकता है.” जिस पर वह सहमत हो गए.
ग्रोवर ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े मामले की ओर भी इशारा किया और कहा, “मैंने इस पर गहन शोध किया है. 1967 से लेकर अब तक एक भी ऐसा स्थायी आदेश या नियम नहीं है जिसमें पैलेट गन के इस्तेमाल का जिक्र हो. इसका इस्तेमाल 2010 में कश्मीर में किया गया था, और उसके बाद 2016 में.”
उन्होंने कहा कि 2011 का एक एसओपी है, जिसे केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता वाली एक टास्क फोर्स ने तैयार किया था और 2016 की उच्च अधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है. उन्होंने कहा कि “दिल्ली पुलिस का ऐसा कोई स्थायी आदेश नहीं है जो पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति देता हो… उन्हें अपना हलफनामा दाखिल करने दें.”
सीजेआई ने कहा, “हम उनका हलफनामा लेंगे और आपकी सहायता तथा कुछ क्षेत्र विशेषज्ञों की राय से… हम एक पूरा प्रोटोकॉल तैयार करना चाहेंगे. चाहे इसका इस्तेमाल किया जा सकता हो या नहीं, और यदि अनुमति दी जाए तो किन परिस्थितियों में.” पीठ ने इस मामले को अगली सुनवाई के लिए 18 अगस्त को सूचीबद्ध किया है.
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने कहा था कि सिर्फ आंदोलन होने के कारण पुलिस की बर्बरता या ‘लाठीचार्ज’ को सही नहीं ठहराया जा सकता और इस बात पर जोर दिया था कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार “पूरी तरह से गारंटीकृत” है.
बता दें कि दिल्ली में 20 जुलाई को सीजेपी के नेतृत्व में निकाले गए मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें देखी गई थीं, जिसमें संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठियों और आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया गया था.
