अनमैप्ड और नोटिस वाले वोटर्स के घर जाकर दस्तावेज इकट्ठा करेंगे BLO, ECI का फैसला

नई दिल्ली: विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बीच, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने शनिवार को फैसला किया कि अगर किसी व्यक्ति को इस प्रक्रिया के दौरान मैप नहीं होने और तार्किक विसंगतियों के लिए नोटिस जारी किया गया है, तो बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) दस्तावेजों के संग्रह के लिए ऐसे व्यक्तियों के घरों का दौरा करेंगे और उसके बाद उन्हें निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के निर्णय के लिए ECINet पर अपलोड करेंगे.

यह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू वाली चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ द्वारा नई दिल्ली ECI मुख्यालय में आयोजित बैठक के दौरान लिए गए निर्णयों में से एक था.

ECI की तरफ से जारी बयान के मुताबिक, ऐसे लोगों को सुनवाई के लिए ERO/AERO दफ्तर बुलाने की जरूरत नहीं है. सिर्फ विशेष परिस्थितियों में, जैसा ERO तय करेगा, बेहतर होगा कि सुनवाई ऑनलाइन हो. जरूरत पड़ने पर परिवार के किसी भी बड़े सदस्य को वोटर अपनी तरफ से सुनवाई में शामिल होने के लिए अधिकृत (Authorised) कर सकते हैं. ऑनलाइन सुनवाई की सुविधाओं को और मजबूत किया जाएगा.

चुनाव आयोग ने यह भी तय किया कि DEOs (जिला निर्वाचन अधिकारी) जरूरत के हिसाब से नाइट शेल्टर में रहने वाले लोगों, मजदूरों, गरीब लोगों, बेघर लोगों आदि के लिए पर्याप्त हेल्प डेस्क बनाएंगे या स्पेशल कैंप लगाएंगे.

यह बताते हुए कि SIR के लिए फॉर्म 6 से जुड़ी घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है, ECI ने एक बयान में कहा कि यह निर्णय लिया गया कि गैर-एसआईआर अवधि के लिए, नियमों के अनुसार निर्धारित फॉर्म (निर्वाचकों के पंजीकरण नियम 1960) का उपयोग किया जाएगा.

यह देखते हुए कि फील्ड ऑफिसर्स के पास उनकी वैधानिक शक्तियों के अनुसार ECINET प्रणाली तक भूमिका-आधारित पहुंच है, ECI ने कहा कि सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर (DEC) की अध्यक्षता में एक समिति, जिसमें IIT/IIIT के एक स्वतंत्र विशेषज्ञ भी शामिल होंगे, ECINET की समीक्षा करेगी. यह समिति यह दोबारा जांच करेगी कि क्या यह प्रणाली अधिनियमों और नियमों के प्रावधानों का अनुपालन करती है और आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी.

बयान में कहा गया है कि पिछले कुछ महीनों में राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) से मिले सुझावों के आधार पर पोर्टल में पहले ही कई अपग्रेडेशन किए जा चुके हैं. अगर फील्ड ऑफिसर्स को आगे किसी भी तरह के लचीलेपन की जरूरत होगी, तो उसे लागू कर दिया जाएगा. अब से, आईटी मॉड्यूल और पोर्टलों से जुड़ी सभी नई पहलों पर आयोग द्वारा मंजूरी दिए जाने से पहले अधिकारियों की समिति (COO) में चर्चा की जाएगी.

दिल्ली और महाराष्ट्र में समय-सीमा बढ़ी
सीईओ दिल्ली से प्राप्त अनुरोध पर ध्यान देते हुए, चुनाव आयोग ने कहा है कि दावे और आपत्तियां दर्ज करने की अवधि आयोग द्वारा 30 अक्टूबर तक बढ़ा दी गई है. नोटिस और दावों और आपत्तियों के निपटान की अवधि 30 नवंबर तक बढ़ा दी गई है. बयान ने यह भी का गया कि सीईओ महाराष्ट्र से प्राप्त अनुरोध के अनुसार, महाराष्ट्र में दावों और आपत्तियों को दर्ज करने की अवधि आयोग द्वारा 12 अक्टूबर तक बढ़ा दी गई है. महाराष्ट्र में नोटिस और दावों और आपत्तियों के निपटान की अवधि 10 नवंबर तक बढ़ा दी गई है.

यह भी तय किया गया कि आयोग की सभी मीटिंग के लिए एजेंडा पहले से भेजा जाएगा और मिनट्स जारी किए जाएंगे और सभी अधिकारियों की APARS (एनुअल परफॉरमेंस अप्रेजल रिपोर्ट) हर साल दिसंबर में तय समय में पूरी की जाएगी; अधिकारियों के विदेश दौरों के लिए आयोग की मंजूरी ली जाएगी और आयुक्तों द्वारा आयोग के अधिकारियों को दिए गए सभी निर्देशों का सख्ती से पालन किया जाएगा.

यह हवाला देते हुए कि बिहार और पश्चिम बंगाल सहित 20 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर पहले ही पूरा हो चुका है, आयोग ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जिसका नाम एसआईआर के दौरान या उसके बाद छूट गया हो और युवा या पहली बार मतदाता सहित कोई भी व्यक्ति, निरंतर अपडेट की प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में अपना नाम शामिल करने के लिए संबंधित ईआरओ को आवेदन कर सकता है.

बयान में कहा गया है कि CEOs को इस प्रक्रिया को आसान बनाने के निर्देश दिए गए हैं. CEOs, DEOs, EROs तुरंत इन मतदाताओं के पंजीकरण के लिए एक विशेष अभियान शुरू करेंगे.

मतभेद पर आयोग का बयान
चुनाव आयोग के भीतर शीर्ष अधिकारियों के बीच मतभेदों पर हाल की न्यूज रिपोर्ट के संदर्भ में, ECI चुनाव ने दोहराया कि कैबिनेट सचिव को लिखा गया पत्र आयोग या आईटी प्रभाग के किसी नीतिगत मामले से संबंधित नहीं था, बल्कि चुनाव आयोग में प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी के कामकाज से संबंधित था. आयोग ने कहा कि संबंधित अधिकारी द्वारा जारी किए गए कार्य पुनर्वितरण आदेशों (work re-distribution orders) को वास्तव में दोनों आयुक्तों के आदेशों के बाद भी लागू नहीं किया गया था, और डीईसी द्वारा आईटी प्रभाग पर रखी जा रही निगरानी को वास्तव में कभी वापस नहीं लिया गया था.

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