
जमशेदपुर में जिस तरह अपराधियों का नंगा नाच चल रहा है, वह अब महज चिंता का विषय नहीं, बल्कि शहर की कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी बनता जा रहा है। पिछले कुछ दिनों से चापड़ जैसी घटनाओं ने लोगों को दहशत में डाल रखा था, लेकिन पिछले तीन दिनों में अपराध की जिस श्रृंखला ने शहर को झकझोरा है, उसने हालात की गंभीरता को और बढ़ा दिया है।
पहले शहर के इतिहास की सबसे बड़ी बैंक डकैती ने पुलिस और प्रशासन की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। अभी इस घटना के 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि उसी घटनास्थल से महज सवा सौ मीटर की दूरी पर एक ज्वेलरी दुकान में सेंधमारी हो गई। अपराधियों ने दुकान की दीवार काटी और लाखों के जेवरात लेकर फरार हो गए। विरोध में व्यापारियों को गोलमुरी बाजार बंद करना पड़ा।
लेकिन अपराध का सिलसिला यहीं नहीं रुका। मरीन ड्राइव स्थित बिंदल मॉल में रेस्टोरेंट में लोग परिवार के साथ खाना खा रहे थे और अपराधियों ने वहां अंधाधुंध फायरिंग कर दी। इस गोलीबारी में एक बुजुर्ग भी घायल हो गए, जो अपनी पत्नी के साथ भोजन करने पहुंचे थे।
सवाल यह है कि आखिर जमशेदपुर में हो क्या रहा है?
जिस शहर में लोग परिवार के साथ बाजार, रेस्टोरेंट और मॉल जाने को सामान्य और सुरक्षित मानते थे, वहां यदि भोजन करते समय गोलियां चलने लगें तो आम आदमी के मन में सुरक्षा का भरोसा कैसे कायम रहेगा? आने वाले दिनों में क्या परिवार के साथ बाहर निकलने से पहले लोगों को सौ बार सोचना पड़ेगा?
बैंक डकैती ने खोली सुरक्षा व्यवस्था की पोल
गोलमुरी केनरा बैंक में जिस तरह डकैती हुई, वह सामान्य अपराध की श्रेणी में नहीं रखी जा सकती। भीड़भाड़ वाले बाजार में अपराधी लंबे समय तक बैंक के भीतर रहे। बैंककर्मियों और ग्राहकों को हथियार के बल पर बंधक बनाया, चाबी हासिल की और बैंक को खंगाल डाला।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अपराधियों ने सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी के बावजूद बिना किसी खास हड़बड़ी के पूरी वारदात को अंजाम दिया और मोटरसाइकिल से निकल गए। यदि जांच में सामने आई यह तस्वीर सही है, तो यह अपराधियों के दुस्साहस के साथ-साथ उनके आत्मविश्वास को भी दर्शाती है।
और इस घटना के बाद पुलिस की स्वाभाविक रूप से अतिरिक्त सतर्कता होनी चाहिए थी। लेकिन घटनास्थल से चंद कदम की दूरी पर अगले ही दिन ज्वेलरी दुकान में सेंधमारी हो जाना सवाल खड़ा करता है कि आखिर उस इलाके में पुलिस की मौजूदगी और गश्त कितनी प्रभावी थी?
पुलिस का डर अपराधियों के मन से क्यों खत्म हो रहा है?
आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बैंक डकैती, ज्वेलरी चोरी या गोलीबारी के आरोपियों को पुलिस कब गिरफ्तार करेगी। असली सवाल इससे बड़ा है—अपराधियों के मन से पुलिस का डर आखिर खत्म क्यों होता जा रहा है?
किसी भी शहर में अपराध पूरी तरह खत्म नहीं हो सकते। लेकिन कानून-व्यवस्था की असली परीक्षा तब होती है जब अपराधी यह महसूस करें कि वारदात के बाद बच निकलना आसान नहीं होगा। यदि अपराधी लगातार दुस्साहस दिखाते हुए एक के बाद एक वारदात करते रहें, तो यह केवल अपराध की समस्या नहीं रहती, बल्कि कानून के भय से जुड़ा सवाल बन जाती है।
बिष्टुपुर डीडी बार कांड के बाद सरकार को पुलिस नेतृत्व में बदलाव करना पड़ा था। नए वरीय पुलिस अधीक्षक के आने के बाद पुलिसिंग को लेकर सक्रियता भी दिखाई दी और कई स्तरों पर कार्रवाई हुई। लेकिन इसके बावजूद यदि अपराध की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, तो यह देखने की जरूरत है कि पुलिस की रणनीति और जमीनी कार्रवाई में कहां कमी रह जा रही है।
तीन दशक पुराना जमशेदपुर याद आने लगा
आज के हालात ने करीब तीन दशक पहले के उस जमशेदपुर की याद ताजा कर दी है, जब अपराध और भय का माहौल शहर की बड़ी चिंता हुआ करता था। उस समय विशेष परिस्थितियों में डॉक्टर अजय कुमार को जमशेदपुर पुलिस की कमान सौंपी गई थी। उनकी पुलिसिंग की चर्चा आज भी होती है और यह माना जाता है कि उस दौर में पुलिस की सक्रियता और अपराधियों पर दबाव के कारण स्थिति में बदलाव आया था।
आज जब जमशेदपुर में अपराधी लगातार चुनौती पेश कर रहे हैं, तो स्वाभाविक रूप से लोगों को उस दौर की पुलिसिंग याद आ रही है। सवाल किसी व्यक्ति विशेष की वापसी का नहीं, बल्कि उस तरह की प्रभावी और परिणाम देने वाली पुलिसिंग की जरूरत का है।
जमशेदपुर औद्योगिक शहर है, लेकिन इसकी पहचान केवल कारखानों और उद्योगों से नहीं है। इस शहर की एक बड़ी ताकत इसका सामाजिक ताना-बाना और अपेक्षाकृत शांत माहौल भी रहा है। यदि अपराधी इसी तरह एक के बाद एक वारदात करते रहे और पुलिस की भूमिका हर घटना के बाद प्राथमिकी, जांच और गिरफ्तारी तक सीमित रही, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
अब जरूरत सिर्फ अपराधियों को पकड़ने की नहीं है। जरूरत ऐसी पुलिसिंग की है जिससे अपराध करने से पहले अपराधी सौ बार सोचें।
जमशेदपुर की जनता आज यही जानना चाहती है—
आखिर वह दिन कब आएगा, जब अपराधियों के मन में पुलिस का डर और आम आदमी के मन में अपनी सुरक्षा का भरोसा वापस लौटेगा?
