छात्र आंदोलनों की चिंगारी अब दूर तक जाएगी

दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के छात्र आंदोलन की चिंगारी अब धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। शुरुआत भले ही एक खास मुद्दे और एक मंत्री के इस्तीफे की मांग से हुई हो, लेकिन उसका प्रभाव इससे कहीं व्यापक नजर आ रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्र अब अपनी समस्याओं, परीक्षाओं में गड़बड़ी और शिक्षा व्यवस्था की विसंगतियों को लेकर सत्ता के सामने खुलकर सवाल खड़े करने लगे हैं।
झारखंड इसका ताजा उदाहरण है। यहां लंबे समय से जेपीएससी, जेएसएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्रों में नाराजगी थी। लेकिन दिल्ली के आंदोलन ने शायद उन्हें यह भरोसा दिया कि संगठित होकर अपनी बात उठाई जा सकती है और सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
दिल्ली के आंदोलन का एक दूसरा असर भी महत्वपूर्ण है। वहां पुलिस कार्रवाई, लाठीचार्ज और उसके बाद केंद्र सरकार पर बने दबाव ने यह संदेश दिया कि छात्र आंदोलनों को बल प्रयोग से दबाना अब सरकारों के लिए इतना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि झारखंड में भी 10 अगस्त को विधानसभा घेराव के दौरान पुलिस ने लंबे समय तक बेहद संयम बरता। करीब दस घंटे तक परिस्थितियों को संभालने की कोशिश की गई। लेकिन देर शाम जब लाठीचार्ज हुआ तो सरकार भी सवालों के घेरे में आ गई।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देर रात रांची के उपायुक्त और एसएसपी को मीडिया के सामने आकर यह बताना पड़ा कि लाठीचार्ज की नौबत क्यों आई। यह अपने आप में बताता है कि छात्र आंदोलन अब केवल सड़क पर छात्रों और पुलिस के बीच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बन चुका है।
लाठीचार्ज के बाद छात्रों के तेवर भी कुछ बदले हुए नजर आ रहे हैं। अब उनकी ओर से यह कहा जा रहा है कि बातचीत होगी तो सीधे मुख्यमंत्री से होगी। बीच के किसी अधिकारी या प्रतिनिधि के साथ बातचीत को वे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। यही वह बिंदु है जहां से आंदोलन के लंबा खिंचने की आशंका पैदा होती है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक सकारात्मक पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
देश का युवा अब केवल यह मानकर बैठने को तैयार नहीं है कि जो कुछ हो रहा है, उसे देखते रहो और स्वीकार कर लो। वह सवाल पूछ रहा है। वह व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहा है। वह चाहता है कि परीक्षा निष्पक्ष हो, भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो और मेहनत करने वाले विद्यार्थियों के साथ अन्याय न हो।
दरअसल शिक्षा व्यवस्था में जो विसंगतियां और गड़बड़ियां वर्षों से चली आ रही हैं, उन्हें दूर किए बिना शिक्षा में सुधार की कल्पना ही नहीं की जा सकती। लंबे समय से ‘एक देश, एक शिक्षा व्यवस्था’ जैसी बातें कही जाती रही हैं, लेकिन जमीन पर शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था आज भी अनेक स्तरों पर बंटी हुई दिखाई देती है।
सबसे बड़ी समस्या तो उस शिक्षा माफिया के कॉकस की है, जिसकी जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि वह केवल किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। केंद्र हो या राज्य, सत्ता में आने वाला राजनीतिक दल अक्सर इस तंत्र के सामने कहीं न कहीं कमजोर पड़ता दिखाई देता है। विपक्ष में रहते हुए जो दल परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और शिक्षा माफिया के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, सत्ता में आने के बाद कई बार वही व्यवस्था उनके सामने चुनौती बन जाती है।
यही कारण है कि आज के छात्र आंदोलन को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने की जरूरत नहीं है। आंदोलन में यदि राजनीतिक नारे हैं, उत्तेजना है या कहीं-कहीं भाषा की मर्यादा भी टूटती है तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन उसके मूल सवालों को खारिज नहीं किया जा सकता।
सवाल यह है कि परीक्षा कराने वाली संस्थाओं पर भरोसा कैसे कायम हो? मेहनत करने वाले छात्रों का भविष्य सुरक्षित कैसे हो? पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी करने वालों पर ऐसी कार्रवाई कैसे हो कि भविष्य में कोई इस तरह का दुस्साहस न कर सके?
युवा वर्ग का यह उभरता हुआ आंदोलन यदि इन सवालों तक खुद को सीमित रखता है और व्यवस्था में वास्तविक सुधार की मांग करता है तो इसे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत ही माना जाएगा।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं है जब युवा सवाल पूछते हैं। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब युवा सवाल पूछना ही छोड़ देते हैं।
आज देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्र सवाल पूछ रहे हैं। यह सरकारों के लिए असुविधाजनक जरूर हो सकता है, लेकिन व्यवस्था के लिए शायद यही सबसे जरूरी चेतावनी है।किसी एक राज्य या किसी एक दल के खिलाफ नाराजगी नहीं है. इसका रूप बड़ा और व्यापक होता जा रहा है.
आखिरकार शिक्षा व्यवस्था सुधरेगी तभी, जब उसकी खामियों पर बात होगी। और खामियों पर बात तभी होगी, जब युवा चुप रहने के बजाय सवाल पूछेंगे।

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