धर्माचार्य बातें तो धर्मादर्शों की करेंगे लेकिन खड़े रहेंगे सत्ता के पक्ष में- अनिरुद्ध त्रिपाठी ‘अशेष’ संदर्भ -एससी/एसटी एक्ट और यूजीसी का दुरुपयोग

गीता-व्याख्यानमाला के तृतीय सत्र के अन्तर्गत एक श्रोता द्वारा एससी/एसटी एक्ट और यूजीसी के दुरुपयोग, सवर्णों के भारी विरोध तथा अंधी-बहरी सत्ता के चरित्र से देश में लगी आग को शांत करने का ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ के आलोक में उपाय संबंधी प्रश्न पूछा गया। उत्तर देते हुए अनिरुद्ध त्रिपाठी ‘अशेष’ ने कहा कि मनुष्य का ‘मैं’ सत्ता पाकर धृतराष्ट्र की तरह मदांध हो जाता है। सत्ता-मद और सत्ता-लोलुपता में अंधा मनुष्य देश को ‘कुरुक्षेत्र’ बनाकर गृहयुद्ध में झोंक देता है। सत्ता के प्रति राग के कारण वह कोई भी कानून देश और प्रजा के हित के लिए नहीं बनाता है, सिर्फ अपने हित के लिए बनाता है, जिसमें न्याय के लिए कोई जगह नहीं होती है। उसका कानून प्रजा में प्रेम और समरसता पैदा करने के लिए नहीं होता है, नफरत और असमानता पैदा करने के लिए होता है ताकि प्रजा में एकता का अभाव बना रहे और वह स्वयं संगठित विरोध से सुरक्षित रहे। सत्ता को राह दिखाने का कार्य धर्माचार्यों का है। किन्तु सत्ता की सुख-सुविधा के लोभी भीष्म, द्रोण और कृप जैसे धर्माचार्य बातें तो धर्मादर्शों की करेंगे लेकिन खड़े रहेंगे सत्ता के पक्ष में। आज के तमाम तथाकथित साधु-संत और धर्मगुरु इन्हीं धर्माचार्यों के प्रतिनिधि हैं जो बातें तो धर्मादर्शों की करते हैं लेकिन न्याय के लिए संघर्ष कर रही प्रजा के साथ खड़े न होकर सत्ता के साथ खड़े हैं। इसीलिए हमारे यहाँ सत्ता का अधिकार ‘ऋषि’ के हाथों में दिया गया था, जिसे ‘राजर्षि’ कहा जाता था। ऋर्षि ‘मैं’ से मुक्त होता है। अत: वह सत्ता के प्रति किसी राग अथवा मोह में नहीं होता है। और, इसीलिए वह स्वयं सत्ताधारी नहीं होता है, सत्ताधारी उसका ‘विवेक’ होता है और उसका मंत्री ‘वैराग्य’ होता है- “सचिव बिराग बिबेक नरेसू।” ऋर्षि ‘धर्मक्षेत्र’ का सृजन करता है। मोह को उसकी तमाम मनोविकाररूपी सेनाओं सहित जीतकर इस विवेकरूपी ऋर्षि के राज्य में ही सब प्रकार की सुख-संपदा और सुकाल संभव है-
“जीति मोह महिपाल दल सहित बिबेक भुआलु।
करत अकंटक राज पुरँ सुख संपदा सुकालु।।
पं० दीनदयाल उपाध्याय का ‘एकात्मवाद’ क्या है, आर्ष-चिंतन ही तो है, जो देश के नागरिकों में प्रेम और सामरस्य पैदा करने के लिए अनिवार्य शर्त है। दुर्भाग्य है कि वर्तमान सरकार पं० दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्मवाद’ को अपने लिए शुभ नहीं मान रही है।

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