निष्पक्षता, निर्भीकता और जनपक्षधरता को जीवन का मूलमंत्र मानने वाले पत्रकार का संघर्ष आज भी पत्रकारिता के लिए प्रेरणास्रोत है।
पत्रकारिता के गिरते स्तर को लेकर आज खूब चर्चा हो रही है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं और पत्रकारों की निष्पक्षता को लेकर तरह-तरह की टिप्पणियां की जा रही हैं। सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखने वाले पत्रकारों की कमी महसूस की जा रही है। ऐसे दौर में स्वर्गीय ब्रह्मदेव सिंह शर्मा ‘गुरुजी’ का स्मरण पत्रकारिता के उन आदर्शों की याद दिलाता है, जिनकी बुनियाद ईमानदारी, निष्पक्षता, निर्भीकता और जनपक्षधरता पर टिकी थी। गुरुजी ने न केवल आजीवन इन आदर्शों का पालन किया, बल्कि अपने संपर्क में आने वाले पत्रकारों को भी इसी राह पर चलने के लिए प्रेरित किया।
‘न काहू से दोस्ती न काहू से वैर’ पत्रकारिता को लेकर उनका मूलमंत्र था। दुर्भाग्य से आज की पत्रकारिता में यह सिद्धांत कहीं पीछे छूटता दिखाई देता है। पत्रकारिता जब सत्ता, प्रभाव और व्यक्तिगत संबंधों के दबाव से मुक्त नहीं रह पाती, तब उसकी विश्वसनीयता पर आंच आना स्वाभाविक है। पहले भी पत्रकारिता पर सवाल उठते थे, लेकिन आज जिस तरह उसके मूल चरित्र को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं, वह गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे समय में गुरुजी का जीवन और उनकी पत्रकारिता नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए एक बड़ी सीख है।
गुरु जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी पीड़ित के पक्ष में कलम उठाने से पहले उसकी जाति, धर्म, सामाजिक हैसियत या राजनीतिक पहचान नहीं देखते थे। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण यह था कि अन्याय किसके साथ हुआ है और अन्याय करने वाला कौन है। पीड़ित चाहे कितना ही कमजोर क्यों न हो, उसकी आवाज बुलंद करना वे अपना दायित्व समझते थे। दूसरी ओर, अत्याचार करने वाला कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, उसकी हैसियत का असर गुरुजी की कलम पर नहीं पड़ता था।
धनबाद के कोयलांचल में जब माफिया ताकतों का प्रभाव चरम पर था और प्रशासन तथा पुलिस भी उनके खिलाफ कार्रवाई करने से कई बार परहेज करते थे, तब गुरुजी की कलम बेखौफ होकर उनके विरुद्ध लिखती थी। वे जानते थे कि ऐसी ताकतों के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत चुकानी पड़ सकती है, लेकिन उन्होंने कभी इस आशंका को अपने पत्रकारिता धर्म के आड़े नहीं आने दिया।
उनकी निर्भीक पत्रकारिता का एक उल्लेखनीय प्रसंग मालती मझियाइन से जुड़ा है। धनबाद में एक अपराधी की बहन मालती मझियाइन के साथ पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर गलत व्यवहार किया। उस समय के पुलिस अधीक्षक जगदीश राज ने पुलिस की कार्रवाई को यह कहकर उचित ठहराने की कोशिश की कि वह एक अपराधी की बहन है। गुरुजी को यह तर्क स्वीकार नहीं था। उनका मानना था कि किसी व्यक्ति के परिजन की पहचान के आधार पर उसके साथ अन्याय को जायज नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने मालती मझियाइन के पक्ष में अपनी कलम उठाई और पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ आवाज बुलंद की।
इस घटना का उल्लेख केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि एक पत्रकार की गिरफ्तारी के खिलाफ बड़ा आंदोलन हुआ था। इसकी असली अहमियत यह है कि गुरुजी ने अपनी निष्पक्षता और ईमानदारी से समाज में ऐसा विश्वास अर्जित किया था कि संकट की घड़ी में लोग उनके साथ खड़े होने से पीछे नहीं हटे। उनकी पत्रकारिता ने उन्हें केवल एक संपादक या पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठा नहीं दिलाई, बल्कि उन्हें जनविश्वास का प्रतीक बनाया। यह विश्वास किसी प्रचार या प्रभाव से नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, निष्पक्ष लेखन और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता से अर्जित हुआ था।
गुरुजी के व्यक्तित्व को समझने के लिए उनके स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अनुभवों और शिक्षक के रूप में उनकी भूमिका को भी ध्यान में रखना होगा। आजादी के आंदोलन में भाग लेने का प्रभाव उनकी पत्रकारिता में स्पष्ट दिखाई देता था। उनके भीतर अन्याय के प्रति प्रतिरोध, स्वतंत्रता के प्रति सम्मान और समाज को बेहतर बनाने की बेचैनी थी। एक शिक्षक होने के नाते वे समाज को केवल उसकी समस्याएं दिखाने तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि उसे सही दिशा दिखाने का प्रयास भी करते थे। उनकी कलम का केंद्र हमेशा समाज और आम आदमी रहा।
आज के दौर में ऐसी पत्रकारिता की कल्पना कई लोगों को असाधारण लग सकती है। पत्रकारिता के सामने व्यावसायिक दबाव हैं, राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव हैं तथा व्यक्तिगत हितों के टकराव भी हैं। इन परिस्थितियों में निष्पक्ष बने रहना आसान नहीं है, लेकिन कठिनाइयां ही किसी सिद्धांत की प्रासंगिकता को समाप्त नहीं करतीं। बल्कि ऐसे समय में सिद्धांतों की जरूरत और अधिक बढ़ जाती है। गुरुजी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता की असली ताकत उसके संसाधनों या प्रभाव में नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता में होती है।
आजादी के बाद उन्होंने अखबार निकालना शुरू किया और अपने जीवन का बड़ा हिस्सा पत्रकारिता को समर्पित कर दिया। 12 अक्टूबर 2003 को जब वे इस दुनिया से विदा हुए, उस दिन भी उनका पूरा समय अखबार के काम में बीता। यह प्रसंग अपने आप में बताता है कि पत्रकारिता उनके लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य थी। जिस काम को उन्होंने अपना धर्म माना, अंतिम समय तक उसी के प्रति समर्पित रहे।
गुरुजी के सानिध्य में अनगिनत पत्रकारों ने पत्रकारिता का ककहरा सीखा। उनके संपर्क में आए पत्रकारों के काम में आज भी उनकी शिक्षा और संस्कारों की झलक दिखाई देती है। किसी व्यक्ति की वास्तविक विरासत केवल उसके जीवनकाल में अर्जित प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उन मूल्यों से तय होती है, जिन्हें वह अपने बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है। इस कसौटी पर गुरुजी की विरासत समृद्ध है।
ब्रह्मदेव सिंह शर्मा ‘गुरुजी’ सचमुच अलग मिट्टी के बने थे। उन्होंने अपनी कलम को न बिकने दिया, न झुकने दिया और न ही किसी प्रभावशाली व्यक्ति के सामने उसकी धार कुंद होने दी। उनकी पत्रकारिता हमें याद दिलाती है कि पत्रकार का पहला धर्म जनता के प्रति है, सत्ता के प्रति नहीं; सत्य के प्रति है, व्यक्तिगत संबंधों के प्रति नहीं; और न्याय के प्रति है, किसी प्रभावशाली व्यक्ति की प्रतिष्ठा के प्रति नहीं।
गुरुजी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके आदर्श आज भी जीवित हैं। पत्रकारिता के सामने जब भी निष्पक्षता और विश्वसनीयता का संकट खड़ा होगा, ब्रह्मदेव सिंह शर्मा का जीवन एक कसौटी की तरह सामने आएगा। उनकी स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि पत्रकारिता की नई पीढ़ी उनकी निर्भीकता, ईमानदारी और जनपक्षधरता से प्रेरणा ले तथा उस मूलमंत्र को फिर से आत्मसात करे— ‘ न काहू से दोस्ती न काहू से वैर।’
