सीएसआईआर-एनएमएल और आर 2ई ग्रीनटेक के बीच करार, पुरानी लिथियम-आयन बैटरियों से निकलेंगी मूल्यवान धातुएं

जमशेदपुर : सीएसआईआर-एनएमएल) ने पुरानी एवं अनुपयोगी लिथियम-आयन बैटरियों के वैज्ञानिक पुनर्चक्रण के लिए नई दिल्ली की आर2ई ग्रीनटेक प्राइवेट लिमिटेड के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किया है। इस करार का उद्देश्य एनएमएल द्वारा विकसित स्वदेशी बैटरी रीसाइक्लिंग तकनीक का औद्योगिक स्तर पर व्यावसायीकरण करना तथा बैटरी कचरे से मूल्यवान धातुओं की पुनर्प्राप्ति को बढ़ावा देना है।
एनएमएल द्वारा विकसित तकनीक के माध्यम से उपयोग समाप्त लिथियम-आयन बैटरियों से लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, मैंगनीज, तांबा, एल्यूमिनियम और ग्रेफाइट जैसे महत्वपूर्ण पदार्थों को पुनः प्राप्त किया जा सकेगा। ये धातुएं इलेक्ट्रिक वाहनों, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और बैटरी निर्माण उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
एमओयू पर हस्ताक्षर एनएमएल के निदेशक डॉ संदीप घोष चौधरी की उपस्थिति में हुए। इस अवसर पर मुख्य वैज्ञानिक एवं परियोजना प्रमुख डॉ मनीष कुमार झा धातु निष्कर्षण एवं पुनर्चक्रण प्रभाग के प्रमुख डॉ संजय कुमार सहित कई वरिष्ठ वैज्ञानिक और अधिकारी मौजूद रहे। वहीं कंपनी की ओर से निदेशक अखिलेश नंदकिशोर दुबे और हरीश कुमार पांडेय ने भाग लिया।
बैटरी कचरा बन रहा बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार इलेक्ट्रिक वाहनों, मोबाइल फोन, लैपटॉप और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के बढ़ते उपयोग के कारण आने वाले वर्षों में लिथियम-आयन बैटरी कचरे की मात्रा तेजी से बढ़ेगी। अनुमान है कि वर्ष 2030-31 तक दुनिया में प्रतिवर्ष करीब 11 मिलियन मीट्रिक टन पुरानी बैटरियां उत्पन्न होंगी, जबकि भारत में वर्ष 2035 तक लगभग 20 लाख टन लिथियम-आयन बैटरी कचरा पैदा हो सकता है।
यदि इन बैटरियों का वैज्ञानिक तरीके से निपटान नहीं किया गया तो आग लगने, मिट्टी और जल प्रदूषण तथा स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। वहीं पुनर्चक्रण के माध्यम से मूल्यवान धातुओं की पुनर्प्राप्ति कर आयात निर्भरता को कम किया जा सकता है।
सर्कुलर इकोनॉमी को मिलेगा बढ़ावा
एनएमएल और आर2ई ग्रीनटेक का यह सहयोग बैटरी कचरा प्रबंधन, संसाधन सुरक्षा और सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे बैटरी रीसाइक्लिंग क्षेत्र के औपचारिकरण को बढ़ावा मिलेगा तथा स्वदेशी तकनीकों के माध्यम से सतत विकास और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच इस प्रकार की साझेदारी भविष्य में बैटरी पुनर्चक्रण, स्वच्छ तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता को प्राप्त करना।

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