दिल्ली BRICS में जुटी आधी दुनिया, अमेरिकी मीडिया को लगी मिर्ची

 

नई दिल्ली:

दिल्ली में ब्रिक्स देशों का सम्मेलन शनिवार और रविवार को होने वाला है. उसके लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई देशों के नेता दिल्ली पहुंच चुके हैं. इसके अलावा चीनी नेता शी जिनपिंग भी शनिवार को पहुंचने वाले हैं. इस समिट को अमेरिका समेत दुनिया भर के देशों में चर्चा मिल रही है. इस बीच अमेरिका के नामी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी ब्रिक्स समिट पर दो रिपोर्ट छापी हैं. इनमें से एक रिपोर्ट में तो उसने सीधे तौर पर समिट को लेकर तंज कसा है. ऐसा लग रहा है कि अमेरिका को इतने बड़े जमावड़े से मिर्ची लग रही है और वह इसे अपने प्रभुत्व के लिए एक बड़ी चुनौती के तौर पर देख रहा है. शायद यही वजह है कि उसने इस जमावड़े को लेकर नकारात्मक टिप्पणी ही की है.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि भले ही इस समिट में दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले देश जुड़ रहे हैं, लेकिन उनके बीच मतभेद भी गहरे हैं. अखबार लिखता है कि चीन,रूस, ब्राजील और भारत चाहते हैं कि पश्चिमी संस्थानों पर निर्भरता कम हो जाए. लेकिन इसमें यूएई जैसा देश भी शामिल है, जो अमेरिका का सुरक्षा साझीदार है. इसके अलावा ईरान भी इसमें है, जिसने यूएई पर हमला तक किया था. ईरान इस समिट के जरिए यह दिखाना चाहता है कि अमेरिकी पाबंदियों के बाद भी वह अकेला नहीं है. अब भारत के पीएम नरेंद्र मोदी की बात करें तो उनके लिए यह मंच पावर बैलेंस के तौर पर है. वह भू-राजनीति में पावर बैलेंस की तलाश में रहे हैं.
‘चीन और भारत के बीच ही गहरे मतभेद, कैसे सफल होगा संगठन?’

इसके आगे अखबार ने भारत और चीन के मतभेदों का भी जिक्र किया है. अखबार ने लिखा, ‘भारत और चीन भले ही इस समूह के संस्थापक सदस्य हैं, लेकिन दोनों के बीच गहरे मतभेद रहे हैं. भारत हमेशा यह चाहता रहा है कि दुनिया में बीजिंग का प्रभाव ज्यादा न बढ़े. इसके अलावा भले ही भारत ने रूस के साथ दोस्ती बनाकर रखी है, लेकिन वह अमेरिका विरोधी भी नहीं दिखना चाहता.’ अखबार ने लिखा कि ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के अलावा मिस्र, ईरान, सऊदी अरब, इंडोनेशिया जैसे भी इसका हिस्सा हैं. इसके अलावा 10 देश पार्टनर के तौर पर हैं. इस तरह सभी सदस्य देशों को जोड़ लें तो उनकी आबादी मिलकर दुनिया की आधी के बराबर है. दुनिया की 40 फीसदी जीडीपी इनकी है. इतनी बड़ी ताकत होने के बाद भी इन देशों के बीच ऐसी चीजें बहुत कम हैं, जो इनमें कॉमन हैं.

अखबार ने लिखा कि ये देश एक समान उद्देश्य के लिए आपस में संघर्ष कर रहे हैं. इस समूह का कोई एक

समान उद्देश्य नहीं है. चीन, रूस और ईरान की कोशिश है कि अमेरिकी प्रभुत्व से इतर एक वैकल्पिक वर्ल्ड

ऑर्डर बने. इसके अलावा कुछ देश अमेरिका के करीब हैं और वे ऐसी राय नहीं रखते. अखबार लिखता है कि

जैसे मिस्र को अमेरिकी सहायता मिली है और यूएई में तो अमेरिका के कई मिलिट्री बेस ही हैं. अखबार ने

लिखा कि रूस और ईरान तो यही दिखाना चाहते हैं कि वह अकेले नहीं हैं. इस समिट के बहाने वे खुद को

दुनिया की मुख्यधारा में पेश करना चाहते हैं. व्लादिमीर पुतिन पश्चिम के देशों को यह दिखाने की कोशिश कर

रहे हैं कि पश्चिम के मुकाबले में उनके साथ कई ताकतवर दोस्त हैं. सच यह भी है कि इन देशों ने एक

आर्थिक संबंध भी विकसित कर लिए हैं. जैसे चीन ने रूस में अपना आयात बढ़ाया है, जिन चीजों के लिए

मॉस्को को पश्चिम पर निर्भर रहना पड़ता था. इसके अलावा भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदकर उसकी मदद

की है. वहीं ब्राजील ने रूस से बड़ी मात्रा में फर्टिलाइजर खरीदा है. हालांकि इसके साथ मतभेद भी लगातार बने

हुए हैं. पीएम नरेंद्र मोदी ने तो पिछले दिनों खुलकर पुतिन से अपील की थी कि यूक्रेन की जंग को समाप्त कर

दें.

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