‘हम जेन-जी हैं’ का असर: क्या बदलते भारत में सत्ता तंत्र नई पीढ़ी से डरने लगा है?

लद्दाख में सुरक्षा कर्मियों द्वारा रास्ता रोके जाने पर एक युवती का यह कहना कि “हम जेन-जी हैं”, और उसके बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की यह टिप्पणी कि “हम जेन-जी हैं” कहकर वैसे ही डराया जा रहा है जैसे कभी कहा जाता था —“तुम्हें पता है मेरा बाप कौन है?”—आज के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर एक अलग ही सवाल खड़ा करती है।
दरअसल, दिल्ली के आंदोलन के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में जेन-जी और जेन-अल्फा की सक्रियता जिस तरह दिखाई दे रही है, उसने राजनीतिक दलों से लेकर शासन-प्रशासन तक को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है। छात्र किसी मुद्दे पर सड़क पर उतरते हैं, सोशल मीडिया पर अभियान चलाते हैं और देखते ही देखते उनकी आवाज राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन जाती है। कई मामलों में सरकारों को भी पीछे हटकर उनकी मांगों पर विचार करना पड़ता है।
यही वजह है कि आज शायद ही कोई राजनीतिक दल युवाओं के सवालों से सीधे टकराने का जोखिम लेना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से केंद्रीय मंत्रियों को विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों से संवाद करने और सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं के साथ संपर्क बढ़ाने की बात हो, या नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का अलग-अलग विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों से संवाद करना—सियासत का एक बड़ा हिस्सा अब युवाओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में छात्रों से जुड़े मामलों की सुनवाई भी लगातार सार्वजनिक चर्चा का विषय बनी हुई है। अदालत के रुख को लेकर अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं हो सकती हैं, लेकिन इतना जरूर है कि छात्र अब केवल विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित शक्ति नहीं रह गए हैं। उनकी आवाज अदालत, संसद, मीडिया और सोशल मीडिया—हर जगह दिखाई दे रही है।
यहां तक कि देश के प्रधान न्यायाधीश के विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों में जाने को लेकर भी विरोध की स्थिति पैदा होना बताता है कि नई पीढ़ी अब संस्थानों और प्रतिष्ठित पदों से सवाल पूछने में भी संकोच नहीं कर रही। ‘कॉकरोच’ संबंधी टिप्पणी के बाद जिस तरह विवाद बढ़ा, उसने इस बहस को और हवा दी।
भारत के राजनीतिक इतिहास में छात्र आंदोलनों की अपनी लंबी परंपरा रही है। लगभग हर डेढ़ दशक के आसपास देश ने किसी न किसी बड़े जन या छात्र आंदोलन का प्रभाव देखा है। लेकिन इस बार फर्क यह है कि आंदोलन का चेहरा पारंपरिक छात्र संगठन नहीं, बल्कि डिजिटल युग की जेन-जी और आने वाली जेन-अल्फा है।
इस पीढ़ी की ताकत उसकी संख्या से ज्यादा उसकी कनेक्टिविटी है। एक वीडियो, एक पोस्ट या एक हैशटैग कुछ ही घंटों में देशव्यापी मुद्दा बन सकता है। सत्ता के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है—क्योंकि इस पीढ़ी को नियंत्रित करने के लिए केवल प्रशासनिक ताकत पर्याप्त नहीं है।
लेकिन यहां एक दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्या हर मांग इसलिए सही हो जाती है क्योंकि उसे जेन-जी उठा रही है? लोकतंत्र में युवा शक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती इस बात में है कि किसी भी मांग का फैसला सड़क के दबाव से नहीं, बल्कि तथ्यों, कानून और संवैधानिक प्रक्रियाओं के आधार पर हो।
‘हम जेन-जी हैं’ अगर आत्मविश्वास का प्रतीक है तो यह स्वागत योग्य है। लेकिन अगर यह भी उसी पुराने ‘तुम जानते नहीं मैं कौन हूं’ वाले अहंकार का नया डिजिटल संस्करण बन जाए, तो फिर फर्क सिर्फ इतना रह जाएगा कि पहले ताकत परिवार और पद से आती थी, अब सोशल मीडिया की भीड़ से आने लगेगी।
इसलिए आज असली जरूरत जेन-जी से डरने की नहीं, उसे समझने की है। सत्ता को भी यह समझना होगा कि यह पीढ़ी सवाल पूछेगी, जवाब मांगेगी और अपनी बात रखने के लिए नए माध्यमों का इस्तेमाल करेगी। वहीं युवाओं को भी समझना होगा कि आंदोलन की सफलता केवल सरकार को झुकाने में नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने में है।
शायद उमर अब्दुल्ला की टिप्पणी का सबसे गंभीर पहलू यही है—‘हम जेन-जी हैं’ को लोकतांत्रिक अधिकार और जिम्मेदारी का प्रतीक बनाया जाए, न कि सत्ता पर दबाव बनाने का नया हथियार।

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