त्यौहारों से पहले चीनी के संकट से देश की एक बड़ी आबादी प्रभावित है. इसके पीछे उत्पादन कम होने से लेकर डिमांड-सप्लाई में अंतर जैसी कई वजहें बताई जा रही हैं. इथेनॉल पॉलिसी को लेकर भी बहस छिड़ी हुई है. इस बीच सरकार ने साफ किया है कि चीनी के दाम काबू में रहे, इसके लिए कई कदम उठाए गए हैं. सरकार का दावा है कि चीनी संकट के पीछे इथेनॉल वजह नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई और वजहें हैं.
कंज्यूमर्स मिनिस्ट्री ने शुक्रवार शाम बताया कि चीनी की बढ़ती कीमतों को काबू में करने के लिए, चीनी का निर्यात रोकने से लेकर रॉ-शुगर के ड्यूटी फ्री आयात को मंजूरी तक कई बड़े कदम उठाए गए हैं. पिछले एक महीने में चीनी के दाम करीब 48.18 रुपये से बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं. सरकार का कहना है कि त्योहारों के सीजन में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों को काबू में रखने के लिए लगातार निगरानी की जा रही है.
चीनी महंगी होने की वजह सिर्फ इथेनॉल नहीं
चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए इथेनॉल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन (दूसरी तरफ इस्तेमाल) से जोड़ना गलत है. असल में, इथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में लगभग 12% से घटकर 2025-26 में लगभग 9% हो गया है. इसके अलावा, देश में उत्पादित होने वाले इथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्के से आता है.
सरकार ने साफ किया है कि चीनी के दाम बढ़ने की वजह इथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल बढ़ना नहीं है. इथेनॉल के लिए चीनी डायवर्ट करने की हिस्सेदारी 2022-23 में करीब 12% से घटकर 2025-26 में करीब 9% रह गई है.
…आखिर क्यों पैदा हुआ चीनी का संकट?
सरकार के मुताबिक, जमाखोरी इसके पीछे की बड़ी वजह है. साथ ही कम उत्पादन भी वजह है. सरकार के मुताबिक इस बार चीनी का उत्पादन अनुमान से कम रहा है. गन्ने की फसल में रेड रॉट और टॉप बोरर बीमारी, ज्यादा बारिश और जलभराव से नुकसान हुआ है. इसके साथ ही त्योहारों से पहले मांग बढ़ी है और कुछ जगहों पर जमाखोरी व सट्टेबाजी ने भी कीमतों पर असर डाला है.
इस सीजन में चीनी का उत्पादन करीब 306 लाख टन (LMT) रहने का अनुमान है, जबकि राज्यों ने शुरुआत में करीब 343 LMT उत्पादन का अनुमान लगाया था. हालांकि सरकार का कहना है कि देश में इतना चीनी स्टॉक मौजूद है कि अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू मांग पूरी की जा सकती है.
दुनिया में भी बढ़ रही चीनी की कीमत
चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. दुनिया में भी चीनी की सप्लाई प्रभावित हुई है. 2026-27 में वैश्विक स्तर पर करीब 33 LMT चीनी की कमी का अनुमान है. इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमत 30 जून को 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को 552 डॉलर प्रति टन हो गई. यानी करीब दो महीने में कीमत में 16% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है.
इथेनॉल से किसानों और चीनी मिलों को फायदा
सरकार के मुताबिक भारत में सामान्य तौर पर हर साल 320-340 LMT चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 280-290 LMT है. ज्यादा उत्पादन होने पर चीनी का स्टॉक बढ़ जाता है और मिलों का पैसा फंस जाता है, जिससे किसानों को गन्ने का भुगतान भी प्रभावित हो सकता है.
ऐसे में अतिरिक्त चीनी से इथेनॉल बनाने की नीति से चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है. इसका असर यह है कि 20 अगस्त 2026 तक 2025-26 सीजन के गन्ना बकाये का 97% भुगतान किसानों को किया जा चुका है.
जमाखोरी रोकने के लिए सरकार के बड़े कदम
सरकार ने चीनी की जमाखोरी और फर्जी कमी रोकने के लिए कई फैसले लिए हैं.
1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक चीनी कारोबारियों के लिए 400 टन की स्टॉक लिमिट लागू की गई है.
1 सितंबर से बड़े खरीदार 15 दिन की खपत से ज्यादा चीनी स्टॉक नहीं रख सकेंगे.
केंद्र और राज्य सरकार की टीमें चीनी मिलों में जाकर स्टॉक की जांच कर रही हैं.
घरेलू सप्लाई बढ़ाने के लिए 10 LMT रॉ शुगर चीनी के ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति दी गई है.
राज्यों और चीनी मिलों से 15 अक्टूबर से गन्ने की पेराई शुरू करने को कहा गया है.
सरकार का अनुमान है कि अक्टूबर में चीनी का उत्पादन सामान्य 3-4 LMT से बढ़कर 10 LMT से ज्यादा हो सकता है. इससे त्योहारों के दौरान बाजार में चीनी की उपलब्धता बेहतर होगी. सरकार का कहना है कि वह उपभोक्ताओं और गन्ना किसानों दोनों के हितों का ध्यान रखेगी और चीनी के दाम, स्टॉक और बाजार की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाएगी.
