शिक्षा व्यवस्था की साख पर बड़ा सवाल

देश के छात्रों के भविष्य के साथ आखिर खिलवाड़ कौन कर रहा है? यह सवाल आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। लगातार जिस तरह हमारी शिक्षा व्यवस्था में खामियां उजागर हो रही हैं और हर बार जिम्मेदारी तय करने के बजाय मामले को दबाने या सीमित कार्रवाई तक समेटने की कोशिश होती है, उससे व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहा है।
ताजा विवाद सीबीएसई की 12वीं बोर्ड परीक्षा के परिणामों से जुड़ा है। मामला इतना गंभीर हो गया कि केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और सीबीएसई के शीर्ष स्तर पर कार्रवाई करनी पड़ी। यह तब हो रहा है जब देश पहले ही नीट-यूजी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवादों से जूझ रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर शिक्षा प्रणाली में बार-बार हो रही गड़बड़ियों के लिए जवाबदेही किसकी है?
इस वर्ष सीबीएसई ने मूल्यांकन प्रक्रिया में ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (ओएसएम) लागू किया। उद्देश्य पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाना था, लेकिन आरोप है कि जिस एजेंसी को यह काम सौंपा गया, उसके चयन और कार्यप्रणाली में गंभीर खामियां रहीं। कई विद्यार्थियों की उत्तरपुस्तिकाएं सही तरीके से पढ़ी ही नहीं जा सकीं, जिसके कारण अंकांकन प्रभावित हुआ। यदि उत्तरपुस्तिकाओं का सही मूल्यांकन ही नहीं हुआ तो विद्यार्थियों को न्याय कैसे मिलेगा?
मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब यह सामने आया कि पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 40 हजार अधिक विद्यार्थियों को 75 प्रतिशत से कम अंक मिले। जबकि इस बार परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी थी और सामान्य अनुमान यह था कि बेहतर प्रदर्शन करने वालों की संख्या भी बढ़ेगी। यही आंकड़े संदेह की पहली वजह बने। बाद में कई विद्यार्थियों और अभिभावकों ने मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
इस गड़बड़ी का सबसे बड़ा नुकसान उन विद्यार्थियों को हुआ जो संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई एडवांस्ड) में सफल होने के बावजूद आईआईटी में प्रवेश के लिए आवश्यक 75 प्रतिशत अंकों की शर्त पूरी नहीं कर पाए। वर्षों की मेहनत के बाद जब किसी छात्र का सपना तकनीकी खामी या प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ जाए तो यह केवल एक छात्र की नहीं, पूरे शिक्षा तंत्र की विफलता है। कुछ विद्यार्थियों के मानसिक तनाव और आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं की खबरें भी सामने आई हैं, जो स्थिति की गंभीरता को और बढ़ाती हैं।
पिछले कुछ वर्षों पर नजर डालें तो एक के बाद एक विवाद सामने आए हैं। कभी नीट परीक्षा में पेपर लीक के आरोप, कभी भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएं, यूजीसी का मामला और अब बोर्ड परीक्षा के मूल्यांकन पर सवाल। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही लगातार कमजोर होती जा रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि हर विवाद के बाद कुछ अधिकारियों के तबादले या हटाने की कार्रवाई तो हो जाती है, लेकिन व्यवस्था में सुधार और दोषियों की स्पष्ट जवाबदेही शायद ही कभी तय होती है । शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान निशाने पर हैँ. उनकी कुर्सी के नीचे एक के पद एक ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिसने मोदी सरकार की साख पर बट्टा लगा दिया है.
आज जरूरत केवल कार्रवाई का दिखावा करने की नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली की स्वतंत्र एवं पारदर्शी जांच की है। यदि किसी एजेंसी को नियमों में ढील देकर काम सौंपा गया, यदि तकनीकी खामियों को नजरअंदाज किया गया या यदि लाखों विद्यार्थियों के परिणाम प्रभावित हुए, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी ही चाहिए। शिक्षा व्यवस्था किसी भी देश की नींव होती है। यदि उसी पर छात्रों और अभिभावकों का भरोसा डगमगाने लगे तो इसके दूरगामी परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।
सरकार, परीक्षा एजेंसियों और शिक्षा बोर्डों को यह समझना होगा कि छात्रों के भविष्य के साथ किसी भी प्रकार की लापरवाही केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षति है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे विवाद दोहराए जाते रहेंगे। देश के करोड़ों छात्र केवल आश्वासन नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष, पारदर्शी और भरोसेमंद शिक्षा व्यवस्था के हकदार हैं।

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