यूपीआई यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस का विस्तार भारत में जिस तेजी से हुआ है, वह अपने आप में किसी आर्थिक क्रांति से कम नहीं है। कभी दस रुपये के भुगतान के लिए भी लोग नकद निकालने की जरूरत महसूस करते थे, लेकिन आज चाय की दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक कुछ रुपये का भुगतान भी यूपीआई से सहजता से हो जाता है। जिस डिजिटल भुगतान व्यवस्था को अपनाने में शुरुआत में लोग हिचकते थे, वही अब उनकी रोजमर्रा की जरूरत बन चुकी है। भारत में सफलता के बाद यूपीआई अब दूसरे देशों में भी अपनी जगह बना रहा है।
ऐसे में पिछले कुछ दिनों से यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाए जाने की खबरों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी। सरकार ने 14 सितंबर को यह स्पष्ट किया कि ₹2,000 तक के यूपीआई लेनदेन पर ग्राहक और दुकानदार, दोनों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। लेकिन बड़ा सवाल अभी भी अनुत्तरित है—₹2,000 से अधिक के लेनदेन का क्या होगा?
सरकार की इस सफाई को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि उसने ₹2,000 तक के लेनदेन को शुल्कमुक्त रखने की बात कही है, लेकिन इससे अधिक के भुगतान को लेकर तस्वीर देर शाम साफ़ की गई । यह आशंका स्वाभाविक है कि आने वाले दिनों में बड़े लेनदेन पर किसी न किसी रूप में शुल्क लगाया जा सकता है।
यहां सवाल केवल शुल्क का नहीं, बल्कि एक ऐसी सुविधा को धीरे-धीरे महंगा बनाने का है जिसे जनता अब अपनी रोजमर्रा की जरूरत मान चुकी है। यही वजह है कि जब भी यूपीआई पर शुल्क लगाने की चर्चा होती है, उसका विरोध शुरू हो जाता है। दुकानदारों का अपना तर्क है। यदि डिजिटल भुगतान पर उन्हें प्रत्येक लेनदेन के लिए शुल्क देना पड़ेगा तो छोटे कारोबारियों के लिए यह अतिरिक्त बोझ होगा। पहले भी क्रेडिट और डेबिट कार्ड के लेनदेन पर शुल्क का असर देखने को मिला है और कई कारोबारी इसी कारण कार्ड भुगतान को हतोत्साहित करते रहे हैं।
यूपीआई की कहानी हमें मोबाइल सेवाओं की भी याद दिलाती है। एक दौर था जब मोबाइल कंपनियां ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए लगभग मुफ्त जैसी सुविधाएं देती थीं। इनकमिंग मुफ्त थी, आउटगोइंग के लिए मामूली खर्च होता था और बहुत कम रकम में लंबे समय तक नंबर चलता रहता था। फिर मुफ्त में मोबाइल डाटा दिया जाने लगा.आज मोबाइल फोन जीवन की ऐसी अनिवार्यता बन चुका है कि कंपनियां धीरे-धीरे अपने शुल्क बढ़ाती गईं। अब हर महीने सैकड़ों रुपये खर्च करना आम बात है। विरोध की आवाज भी इसलिए कमजोर पड़ गई है क्योंकि मोबाइल के बिना जिंदगी की कल्पना मुश्किल हो चुकी है।
यूपीआई के साथ भी कहीं ऐसी ही कहानी तो नहीं लिखी जा रही?
पहले आदत डाली गई, फिर जरूरत बनाई गई और अब जरूरत बन जाने के बाद शुल्क की संभावना दिखाई देने लगी है। फिलहाल ₹2,000 तक की सीमा को शुल्कमुक्त रखने की बात कही गई है, लेकिन यदि भविष्य में इससे ऊपर के भुगतान पर शुल्क लगता है और बाद में वही सीमा भी बदलती है तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
यूपीआई ने बैंकों को भी बड़ी राहत दी है। डिजिटल लेनदेन बढ़ने से छोटी-छोटी जरूरतों के लिए बैंक शाखाओं में जाने की मजबूरी कम हुई है। नकदी संभालने, गिनने और लेनदेन दर्ज करने का काम भी काफी हद तक डिजिटल हो गया है। यानी यूपीआई से केवल ग्राहक ही लाभान्वित नहीं हुए, बल्कि पूरी बैंकिंग व्यवस्था को इसका फायदा मिला है।
इसलिए यूपीआई को केवल एक भुगतान माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में देखना चाहिए। ऐसी व्यवस्था पर शुल्क लगाने का कोई भी फैसला बेहद सावधानी से लिया जाना चाहिए। खासकर छोटे दुकानदार और आम ग्राहक इसका पहला और सबसे सीधा असर झेलेंगे।
सरकार को यह भी याद रखना होगा कि किसी सुविधा को लोकप्रिय बनाना जितना कठिन होता है, उसे महंगा बनाकर जनता का विश्वास बनाए रखना उससे कहीं अधिक कठिन।
यूपीआई के दस वर्ष पूरे होने के बाद भारत ने दुनिया को डिजिटल भुगतान का एक सफल मॉडल दिया है। अब चुनौती यह है कि यह सफलता आम आदमी की जेब पर बोझ बने बिना आगे बढ़े। यूपीआई को सुविधा से चुंगी के रास्ते पर ले जाने की जल्दबाजी हुई तो डिजिटल इंडिया की यह बड़ी उपलब्धि सवालों के घेरे में आ सकती है।
