BCCI लोकपाल की कड़ी जांच के घेरे में JSCA,2019, 2022 और 2025 के चुनावों, संविधान के पंजीकरण में विफलता और लोढ़ा सुधारों पर लोकपाल ने मांगा जवाब

“उभरकर सामने आई स्थिति वास्तव में चौंकाने वाली”: सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन
और अवमानना के सवालों के बीच  नंदू पटेल की
शिकायत अब केवल JSCA चुनाव विवाद तक सीमित नहीं

 

नई दिल्ली/रांची, 29 जुलाई 2026: झारखंड क्रिकेट प्रशासन पर दूरगामी प्रभाव डाल सकने वाले एक
महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, BCCI के लोकपाल एवं एथिक्स ऑफिसर तथा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन (JSCA) के संवैधानिक कामकाज को गंभीर जांच
के दायरे में ला दिया है। न्यायमूर्ति मिश्रा ने उनके समक्ष उभरकर आई स्थिति को “वास्तव में चौंकाने वाली” (indeed shocking) करार दिया है। शिकायतकर्ता  नंदू पटेल द्वारा दायर शिकायत संख्या 13/2026 में
29 जुलाई 2026 को पारित सात पृष्ठों के आदेश ने JSCA के प्रशासन और चुनावों को लेकर शुरू हुए विवाद को अब वर्ष 2018 से सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशित क्रिकेट सुधारों के अनुपालन की व्यापक जांच में बदल दिया है।
इस घटनाक्रम का महत्व तब और स्पष्ट हो जाता है जब इसे लोकपाल के 14 जुलाई 2026 के पूर्व आदेश के
संदर्भ में देखा जाए। उस समय न्यायमूर्ति मिश्रा ने दर्ज किया था कि मामले में पक्षकारों की दलीलें पूरी हो चुकी हैं और प्रकरण को 29 जुलाई को वर्चुअल माध्यम से अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था।
ऐसा लग रहा था कि मामला अंतिम निर्णय की ओर बढ़ रहा है, लेकिन 29 जुलाई की सुनवाई ने अप्रत्याशित
रूप से एक व्यापक संवैधानिक जांच का रूप ले लिया। लोकपाल ने दोनों पक्षों से विस्तृत शपथपत्र मांगे और
JSCA के संवैधानिक इतिहास तथा अनुपालन की गहन पड़ताल का रास्ता खोल दिया।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति मिश्रा ने दर्ज किया कि यह स्पष्ट है कि JSCA के संविधान/नियम एवं
विनियमों का अभी तक माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा 9 अगस्त 2018 को BCCI बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ
बिहार मामले तथा 14 सितंबर 2022 के बाद के निर्णय में दिए गए निर्देशों के अनुरूप पंजीकरण नहीं हुआ है।
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आदेश में दर्ज है कि प्रतिवादी पक्ष की ओर से भी इस बात से
इनकार नहीं किया गया कि संशोधित संविधान का अब तक उक्त निर्देशों के अनुसार पंजीकरण नहीं हुआ है।
JSCA ने बताया कि पहले आवेदन किया गया था, लेकिन वर्तमान ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया के कारण अब
उसे नए सिरे से आवेदन करना होगा।
इसी पृष्ठभूमि में न्यायमूर्ति मिश्रा की वह टिप्पणी सामने आई, जिसने झारखंड क्रिकेट प्रशासन में हलचल पैदा
करने की क्षमता पैदा कर दी है—“The state of affairs which has emerged is indeed shocking”, अर्थात “उभरकर सामने आई स्थिति वास्तव में चौंकाने वाली है।” आदेश में दर्ज है कि JSCA माननीय सुप्रीम कोर्ट के “बाध्यकारी निर्देशों” के अनुरूप अपने संशोधित संविधान का पंजीकरण कराए बिना काम करता रहा और साथ ही BCCI से अनुदान भी प्राप्त करता रहा। आदेश में यह भी दर्ज किया गया है कि 2025 के चुनाव ऐसे समय में आयोजित किए गए जब संशोधित संविधान का 9 अगस्त 2018 और 14 सितंबर 2022 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के अनुरूप पंजीकरण नहीं हुआ था। साथ ही, नंदू पटेल का आरोप भी दर्ज है कि 2019, 2022 और 2025 के चुनाव अपंजीकृत संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत आयोजित किए गए।

29 जुलाई की मौखिक सुनवाई के दौरान मामला कथित रूप से और गंभीर संवैधानिक आयाम में पहुंच गया।
सुनवाई में उपस्थित लोगों द्वारा बताए गए विवरण के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्देशों के निरंतर
उल्लंघन अथवा अनुपालन न किए जाने के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की प्रत्यक्ष अवमानना (Direct
Contempt) के संदर्भ में भी चर्चा हुई। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
29 जुलाई के लिखित आदेश में JSCA को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का दोषी घोषित करने वाला कोई अंतिम
निष्कर्ष दर्ज नहीं है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को बार-बार “binding directions” कहना और
उनके अनुरूप संशोधित संविधान का पंजीकरण न होने की स्थिति को रिकॉर्ड करना संवैधानिक अनुपालन के
मुद्दे की गंभीरता को कई गुना बढ़ा देता है।
इस प्रकार विवाद अब केवल BCCI अथवा JSCA की किसी आंतरिक प्रक्रिया में कथित त्रुटि तक सीमित नहीं
रह गया है। इसके केंद्र में अब एक बुनियादी सवाल खड़ा है—क्या BCCI से संबद्ध कोई राज्य क्रिकेट संघ सुप्रीम
कोर्ट द्वारा निर्देशित सुधारों के तहत अनिवार्य संवैधानिक पंजीकरण प्रक्रिया पूरी किए बिना लगातार काम
कर सकता है और एक के बाद एक चुनाव आयोजित कर सकता है? यदि किसी सक्षम न्यायिक मंच के समक्ष
बाध्यकारी न्यायिक निर्देशों का जानबूझकर या लगातार उल्लंघन अंततः स्थापित होता है, तो मामला क्रिकेट
प्रशासन, पंजीकरण और चुनावी वैधता से कहीं आगे जा सकता है। हालांकि, किसी आचरण को कानूनी रूप से
अवमानना माना जाए या नहीं, इसका अंतिम निर्धारण सक्षम न्यायिक मंच द्वारा ही किया जा सकता है।
इस जांच का संवैधानिक आधार भी आदेश में स्पष्ट रूप से सामने रखा गया है। न्यायमूर्ति मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट
के 9 अगस्त 2018 के निर्णय के पैरा 45.2 का उल्लेख किया है, जिसके अनुसार BCCI संविधान के पंजीकरण के बाद प्रत्येक सदस्य संघ को समान आधार पर 30 दिनों के भीतर अपने संविधान का पंजीकरण कराकर
अनुपालन प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना था। आदेश में पैरा 45.3 का भी उल्लेख है, जिसमें निर्देशों का अनुपालन
नहीं करने वाले राज्य संघ के संबंध में परिणामों की परिकल्पना की गई थी। न्यायमूर्ति मिश्रा ने यह भी दर्ज
किया कि सुप्रीम कोर्ट ने 14 सितंबर 2022 के अपने निर्णय में इस आदेश की अनिवार्यता को पुनः दोहराया था।
शिकायतकर्ता नंदू पटेल के लिए यह घटनाक्रम उनकी शिकायत में उठाए गए मूल प्रश्नों को महत्वपूर्ण स्तर तक
आगे ले जाता है। उनका मामला अब केवल किसी एक चुनाव की वैधता अथवा कुछ पदाधिकारियों की पात्रता
तक सीमित नहीं है। लोकपाल ने अब औपचारिक रूप से 9 अगस्त 2018 से अब तक JSCA द्वारा किए गए
अनुपालन का पूरा विवरण मांगा है। इस तरह करीब आठ वर्षों के प्रशासनिक एवं संवैधानिक कामकाज की
पड़ताल का रास्ता खुल गया है।
29 जुलाई की सुनवाई में JSCA अध्यक्ष अजय नाथ देव सिंह की ओर से दिया गया बयान भी बेहद महत्वपूर्ण
रहा। लोकपाल के विशेष प्रश्न के जवाब में अध्यक्ष ने कहा कि JSCA की वार्षिक आम बैठक 31 अगस्त 2026 या उससे पहले आयोजित की जाएगी और इसके बाद आमसभा की स्वीकृति प्राप्त कर संविधान के पंजीकरण के लिए नए सिरे से आवेदन किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि JSCA अपने संविधान को सुप्रीम कोर्ट के 2018 एवं 2022 के निर्णयों और न्यायमूर्ति लोढ़ा समिति द्वारा अनुशंसित सुधारों के अनुरूप लाएगा।
महत्वपूर्ण रूप से न्यायमूर्ति मिश्रा ने स्पष्ट शब्दों में दर्ज किया—“The aforesaid statement is taken on record.” अर्थात उक्त बयान को आधिकारिक रिकॉर्ड पर ले लिया गया।
लोकपाल ने अब JSCA को एक व्यापक शपथपत्र दाखिल कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि उसके संवैधानिक पंजीकरण की प्रक्रिया में वास्तव में क्या हुआ। संघ को बताना होगा कि आवेदन कब दाखिल किया
गया, महानिरीक्षक निबंधन अथवा अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा कौन-कौन सी त्रुटियां या आपत्तियां बताई गईं, उन्हें दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए और कोई त्रुटि दूर नहीं हुई तो उसका कारण क्या था। साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि पुराना आवेदन कब समाप्त, अस्वीकृत अथवा बंद हुआ और उसके तत्काल बाद नया आवेदन क्यों दाखिल नहीं किया गया।
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण निर्देश यह है कि JSCA को 9 अगस्त 2018 से अब तक सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों और लोढ़ा समिति सुधारों के अनुपालन के लिए उठाए गए प्रत्येक कदम का विस्तृत विवरण देना होगा। इस निर्देश
ने मामले को किसी एक विवादित चुनाव की जांच के बजाय विभिन्न कार्यकालों में संघ के संवैधानिक
अनुपालन की दस्तावेज-आधारित पड़ताल में बदल दिया है।
अब सबसे संवेदनशील चुनावी सवाल 2019, 2022 और 2025 के JSCA चुनावों पर केंद्रित हो गया है।
न्यायमूर्ति मिश्रा ने संघ को बताने का निर्देश दिया है कि इन तीनों चुनावों को आखिर किस संवैधानिक
प्रावधान के तहत आयोजित किया गया था। JSCA को यह भी स्पष्ट करना होगा कि जिस संविधान के आधार
पर ये चुनाव हुए, क्या उसे आमसभा की मंजूरी प्राप्त थी, क्या वह सक्षम प्राधिकारी के समक्ष पंजीकृत था और
क्या वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुमोदित BCCI संविधान के अनुरूप था।
हालांकि आदेश ने अभी इन चुनावों को अवैध अथवा शून्य घोषित नहीं किया है, लेकिन तीन लगातार चुनावों
के संवैधानिक आधार पर JSCA से स्वयं स्पष्टीकरण मांगना नंदू पटेल की शिकायत के एक प्रमुख मुद्दे को सीधे
औपचारिक न्यायिक-सदृश जांच के केंद्र में ले आया है।
दूसरी ओर, लोकपाल ने शिकायतकर्ता नंदू पटेल पर भी अपने आरोपों को अत्यंत सटीक रूप से प्रमाणित करने
की जिम्मेदारी डाली है। उन्हें BCCI संविधान के कथित रूप से उल्लंघित प्रावधान, JSCA के मौजूदा एवं
प्रस्तावित संविधान के कथित असंगत प्रावधान, सुप्रीम कोर्ट के 2018 एवं 2022 के निर्णयों के कथित रूप से
उल्लंघित निर्देश तथा लोढ़ा समिति की कथित रूप से उल्लंघित सिफारिशें स्पष्ट करनी होंगी। यदि किसी
पदाधिकारी की पात्रता को आयु, कार्यकाल, कूलिंग-ऑफ अवधि अथवा अयोग्यता के आधार पर चुनौती दी
जाती है, तो उसका नाम, पद और कथित उल्लंघन का परिणाम भी स्पष्ट करना होगा।
न्यायमूर्ति मिश्रा ने इस आवश्यकता को बेहद स्पष्ट शब्दों में रखा है—“कथित उल्लंघनों को, जहां भी लागू हो,
प्रावधान-वार और व्यक्ति-वार स्पष्ट किया जाना चाहिए, ताकि विवाद का प्रभावी ढंग से निर्णय किया जा
सके।” इस निर्देश से नंदू पटेल को अपनी शिकायत को एक सुव्यवस्थित संवैधानिक चुनौती के रूप में प्रस्तुत
करने का अवसर मिलता है, लेकिन साथ ही प्रत्येक आरोप को ठोस और विशिष्ट आधार पर स्थापित करने की
जिम्मेदारी भी आती है।
एक अन्य बेहद उल्लेखनीय पहलू यह है कि लोकपाल ने इस तथ्य का उल्लेख किया है कि संशोधित संविधान
का सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्देशों के अनुरूप पंजीकरण न होने के बावजूद JSCA BCCI से अनुदान प्राप्त
करता रहा। आदेश ने इन अनुदानों को अवैध घोषित नहीं किया है, न उनकी वसूली का निर्देश दिया है और न
कोई वित्तीय दंड लगाया है। फिर भी जिस अनुच्छेद में न्यायमूर्ति मिश्रा ने स्थिति को “वास्तव में चौंकाने
वाली” बताया, उसी संदर्भ में BCCI अनुदानों का उल्लेख मामले की संस्थागत गंभीरता को बढ़ाता है।
दोनों पक्षों को आवश्यक शपथपत्र तीन सप्ताह के भीतर दाखिल करने और उसके बाद एक सप्ताह में जवाब देने
का निर्देश दिया गया है। लोकपाल ने पहले से रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज दोबारा दाखिल करने के बजाय
उनका स्पष्ट तिथिवार विवरण और विशिष्ट संदर्भ देने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर 2026
को दोपहर 12 बजे वर्चुअल माध्यम से निर्धारित की गई है।
इस प्रकार 14 जुलाई से 29 जुलाई के बीच Complaint No. 13 of 2026 की दिशा नाटकीय रूप से बदल गई है। अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध मामला अब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन, लोढ़ा सुधारों, संविधान के पंजीकरण, BCCI अनुदान और लगातार तीन JSCA चुनावों के संवैधानिक आधार की व्यापक जांच में बदल चुका है।
अब निगाहें 9 सितंबर की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। नंदू पटेल की शिकायत से शुरू हुआ मामला JSCA के
करीब आठ वर्षों के संवैधानिक कामकाज की पड़ताल तक पहुंच चुका है। अभी न तो किसी चुनाव को रद्द
किया गया है और न ही अवमानना का कोई अंतिम निष्कर्ष निकला है, लेकिन JSCA के सामने अब यह स्पष्ट
करने की चुनौती है कि उसने 2018 से सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी सुधारों का अनुपालन कैसे किया और
लगातार चुनाव आखिर किस संवैधानिक आधार पर कराए गए।
और इन तमाम सवालों के ऊपर लोकपाल की वह असाधारण टिप्पणी अब भी गूंज रही है—

“उभरकर सामने आई स्थिति वास्तव में चौंकाने वाली है।”

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