जमशेदपुर। कारोबारी हित, राजनीतिक पहुंच और सत्ता के गलियारों में प्रभाव—इन तीनों का गठजोड़ किसी भी कारोबारी को ताकत दे सकता है। लेकिन जब इसी प्रभाव के साथ आपराधिक दबदबे के आरोप जुड़ने लगें और उसका असर औद्योगिक क्षेत्र में कानून-व्यवस्था तक दिखाई देने लगे तो सवाल केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं रह जाता।
आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में एक सफेदपोश कारोबारी के कथित प्रभाव को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवाल अब उस मोड़ पर पहुंच गए हैं, जहां उसके राजनीतिक रिश्तों और कथित संरक्षण की भी पड़ताल जरूरी हो गई है।
*प्लॉट विवाद ने खोल दी परत*
एक महिला उद्यमी को जियाडा (तत्कालीन आयडा) से अलॉट प्लॉट पर वर्षों बाद भी दखल नहीं मिलना इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू है।
बताया जाता है कि दखल दिलाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर मजिस्ट्रेट और पुलिस बल की तैनाती तक हुई। इसके बावजूद यदि मौके पर विरोध के लिए भीड़ खड़ी हो जाए और कार्रवाई आगे न बढ़ सके, तो सवाल उठता है कि प्रशासनिक आदेश से ऊपर आखिर कौन-सी ताकत काम कर रही थी?
मजिस्ट्रेट तैनात, पुलिस मौजूद—फिर भी कार्रवाई क्यों रुकी?
किसी औद्योगिक भूखंड पर वैधानिक दखल की कार्रवाई को यदि भीड़ के विरोध के कारण रोकना पड़े, तो यह सामान्य घटना नहीं है।
क्या भीड़ स्वतः वहां पहुंची थी?
क्या किसी ने उसे संगठित किया था?
और यदि भीड़ प्रायोजित थी, तो उसके पीछे कौन था?
इन सवालों का जवाब जांच से ही मिल सकता है। लेकिन इन सवालों को नजरअंदाज करना औद्योगिक क्षेत्र में कानून के शासन को कमजोर करना होगा।
*स्क्रैप कारोबार में ‘एकाधिकार’ का आरोप*
आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में स्क्रैप उठाव को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं। स्थानीय कारोबारी बताते हैं कि स्क्रैप कारोबार में प्रतिस्पर्धा करने वाले दूसरे लोगों को कथित रूप से दबाव और धमकी का सामना करना पड़ता है।
आरोप यह भी है कि किसी दूसरे वाहन के स्क्रैप उठाने के लिए निकलते ही रास्ते में उसे रोकने या वाहन पलटने जैसी घटनाओं का भय पैदा किया जाता है।
यदि यह सच है तो सवाल सीधा है—
क्या आदित्यपुर के औद्योगिक प्रतिष्ठानों का स्क्रैप खुले बाजार की प्रतिस्पर्धा से उठता है या किसी कथित सिंडिकेट के नियंत्रण में?
*राशन दुकान से औद्योगिक ‘साम्राज्य’ तक?*
जिस व्यक्ति को लेकर ये आरोप लगाए जा रहे हैं, उसके बारे में स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि कारोबारी सफर की शुरुआत राशन दुकान से हुई और बाद में वह औद्योगिक क्षेत्र के स्क्रैप कारोबार में प्रभावशाली बनता चला गया।
सवाल यह है कि यदि कोई कारोबारी कुछ वर्षों में इतना प्रभावशाली हो जाए कि औद्योगिक क्षेत्र के कारोबारी उसके कथित दबदबे की चर्चा करने लगें, तो संबंधित सरकारी एजेंसियों ने कभी इसकी गंभीरता से पड़ताल क्यों नहीं की?
*अधिकारियों के सम्मान की तस्वीरें क्यों महत्वपूर्ण हैं?*
‘एसिया’ के मंच से प्रशासनिक अधिकारियों को महंगे मोमेंटो अथवा उपहार देकर सम्मानित करने और उनके साथ तस्वीरों को सार्वजनिक करने की परंपरा को भी इस कथित प्रभाव के संदर्भ में देखा जा रहा है।
सम्मान करना अपने आप में कोई अपराध नहीं है।
लेकिन यदि इन्हीं तस्वीरों का इस्तेमाल बाद में प्रशासनिक पहुंच और प्रभाव की छवि बनाने के लिए किया गया हो, तो इसकी भी पड़ताल होनी चाहिए।
सवाल तस्वीरों का नहीं, तस्वीरों से पैदा होने वाली धारणा का है।
*राजनीतिक रिश्ते बने सुरक्षा कवच?*
स्थानीय राजनीतिक हलकों में इस कारोबारी के एक सांसद से करीबी संबंधों को लेकर लंबे समय से चर्चा रही है। इसे कुछ लोग ‘पार्टनरशिप’ तक कहते रहे हैं।
यही कथित राजनीतिक पहुंच क्या उसके कारोबारी प्रभाव का सुरक्षा कवच बनी?
क्या प्रशासनिक अधिकारियों पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष दबाव बनाने में राजनीतिक संबंधों का इस्तेमाल हुआ?
इन सवालों का उत्तर तभी मिलेगा जब पूरे मामले की स्वतंत्र जांच हो।
*अब रिश्तों में दरार क्यों?*
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि दोनों के बीच कभी निकटता थी, तो अब दूरी क्यों दिखाई दे रही है?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सफेदपोश कारोबारी की गतिविधियों से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य और शिकायतें सामने आने लगीं, जिनसे राजनीतिक नेतृत्व को नुकसान की आशंका महसूस हुई।
यही वह बिंदु हो सकता है जहां से कथित ‘पार्टनरशिप’ में दरार शुरू हुई।
*भाजपा के भीतर भितरघात की चर्चा*
आदित्यपुर नगर निकाय अध्यक्ष चुनाव के दौरान भाजपा के कुछ बड़े नेताओं द्वारा इस सफेदपोश के कथित भितरघात को करीब से देखे जाने की चर्चा भी सामने आती रही है।
यदि पार्टी के भीतर किसी कारोबारी की भूमिका को लेकर असंतोष पैदा हुआ और चुनावी राजनीति प्रभावित करने की कोशिश हुई, तो यह केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन का प्रश्न भी बन जाता है।
‘मैं सांसद का चुनाव मैनेज करता हूं’—
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे विस्फोटक पहलू वह कथित दावा है जिसमें उक्त कारोबारी द्वारा यह कहा जाता है कि वह सांसद का चुनाव ‘मैनेज’ करता है और चुनाव का खर्च तक उठाता है।
यहां तक दावा किए जाने की चर्चा है कि दूसरे दल के व्यक्ति को भाजपा में लाने में भी उसकी भूमिका रही। इसे महज राजनीतिक डींग समझकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। किसने कितना पैसा खर्च किया, किस माध्यम से खर्च हुआ और किसके कहने पर खर्च हुआ—ये सभी जांच योग्य प्रश्न हैं।
*मंत्री पद से बार-बार दूरी—अब समीकरण समझ में आया?*
एक सक्षम सांसद होने के बावजूद मंत्री पद की संभावनाओं के समय बार-बार पिछड़ने को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं होती रही हैं।
यदि सांसद के आसपास ऐसे लोगों का प्रभाव रहा हो जिनकी छवि विवादित रही है, तो क्या उसका असर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की धारणा पर पड़ा?
यह प्रश्न भी अब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है।
*संघ के लिए ‘गले की हड्डी’ क्यों?*
संघ से निकटता और पदाधिकारी की जिम्मेवारी के बावजूद किसी व्यक्ति की गतिविधियां यदि संगठन की सार्वजनिक छवि के लिए परेशानी का कारण बनने लगें, तो संगठन के सामने उससे दूरी बनाने का विकल्प स्वाभाविक रूप से आता है।
अंदरखाने की सूचनाओं के मुताबिक संघ से जुड़े कुछ लोग अब इस सफेदपोश से दूरी बनाने और संगठन की छवि को उससे अलग करने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं।
यदि ऐसा हुआ तो यह लंबे समय से चले आ रहे कथित प्रभाव के लिए बड़ा झटका होगा।
*अब ‘तिलिस्म’ टूटने की बारी?*
सांसद से कथित तनातनी, राजनीतिक पार्टनरशिप में दरार, संघ से दूरी की चर्चा और कारोबारी गतिविधियों को लेकर उठते सवाल—इन सबको जोड़कर देखें तो तस्वीर बदलती हुई दिखाई देती है।
वर्षों से कायम प्रभाव यदि राजनीतिक संरक्षण के सहारे खड़ा था, तो संरक्षण हटते ही उसकी वास्तविक ताकत का पता चलेगा।
अब देखना यह है कि—
क्या प्रशासन पुराने प्रभाव से मुक्त होकर कानून के मुताबिक कार्रवाई करेगा?
क्या औद्योगिक क्षेत्र में स्क्रैप कारोबार की कथित एकाधिकार व्यवस्था की जांच होगी?
क्या महिला उद्यमी को उसके अलॉट प्लॉट का वास्तविक दखल मिल पाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव के पीछे छिपे इस कथित कारोबारी साम्राज्य का सच अब सार्वजनिक होगा?
क्योंकि जब पर्दा उठता है तो केवल अभिनेता नहीं दिखते—पूरी पटकथा दिखाई देने लगती है।
जारी…
