उद्योग जगत में उठते सवाल, एसिया की भूमिका पर उद्यमियों की आपत्तियां, उद्यमी संगठन के मूल उद्देश्यों पर सवाल, महिला उद्यमी के प्लॉट से लेकर जियाडा बैठकों में भूमिका पर उठी शिकायतें

जमशेदपुर, 24 सितंबर।
23 सितंबर के अंक में प्रकाशित “औद्योगिक क्षेत्र में दम तोड़ता एसिया, उद्यमी संगठन उद्योग हित के बदले सफेदपोश की स्वार्थसिद्धि का लाइजनिंग मंच……” शीर्षक रिपोर्ट के बाद उद्योग, उपभोक्ता और श्रमिक जगत से जुड़े कई लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अनेक बुद्धिजीवियों और उद्यमियों ने रिपोर्ट में उठाए गए सवालों को महत्वपूर्ण बताते हुए औद्योगिक संगठनों की भूमिका पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता जताई है।
देश के एक बड़े कॉरपोरेट समूह के उद्यमी ने भी रिपोर्ट पढ़ने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए औद्योगिक क्षेत्र के सामान्य उद्यमियों के हित में इस मुद्दे को आगे ले जाने की जरूरत बताई। बताया जाता है कि वे पूर्व में आदित्यपुर ऑटो क्लस्टर की निदेशक मंडली/ट्रस्टी समूह से जुड़े रहे , लेकिन संगठनात्मक कार्यप्रणाली से असहमति के कारण उन्होंने बाद में स्वयं को उससे अलग कर लिया। ऑटो क्लस्टर की कार्यप्रणाली और उससे जुड़े सवालों को भी आगामी कड़ियों में उठाया जाएगा।

उद्योग जगत की सामर्थ्य को नुकसान पहुंचा

अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने प्रतिक्रिया में कहा कि “उद्योग जगत के सामर्थ्य को नष्ट कर दिया गया है।” उन्होंने इसके लिए एसिया और उसके नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।

*महिला उद्यमी का 20 साल पुराना प्लॉट बना बड़ा सवाल*

आदित्यपुर की एक महिला उद्यमी का मामला इस बहस का प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, तत्कालीन आयडा ने लगभग 20 वर्ष पूर्व फेज-3 में महिला उद्यमी की कंपनी को करीब 30 हजार वर्गफीट का औद्योगिक भूखंड आवंटित किया था। सच्चाई है कि आवंटन के बावजूद आज तक उन्हें भूखंड का वास्तविक कब्जा नहीं मिल सका।
महिला उद्यमी की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों और शिकायतों में भूखंड से संबंधित कई गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं। इनमें कथित रूप से दूसरे औद्योगिक प्रतिष्ठान की ओर से नाला निकाले जाने और भूखंड पर किसी अन्य प्रतिष्ठान के नाम से वृक्षारोपण किए जाने जैसे सवाल भी शामिल हैं। सब जानते हैं यह नाला किसने निकाला है और वृक्षारोपण किसने किया है। क्या इसी मतलब से स्व विक्टर सिंह हों या स्व प्रमोद सिंह या आर के सिन्हा ने एसिया का सपना देखा था?

*“संगठन ने मदद के बजाय हतोत्साहित किया”*

महिला उद्यमी का आरोप है कि जिस संगठन से उद्योग हित में सहयोग की अपेक्षा थी, उसकी ओर से उनकी समस्या को प्रभावी ढंग से उठाने के बजाय उन्हें हतोत्साहित किया गया। इस संबंध में लिखित पत्राचार उपलब्ध है।
*नवोदित उद्यमियों की शिकायतें भी सामने आईं*
एक अन्य MSE उद्यमी एम एस सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया में आरोप लगाया है कि उद्योग और उद्यमी हित तथा नवोदित उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के मामलों में एसिया के कुछ प्रतिनिधियों की भूमिका निराशाजनक रही है। उनका दावा है कि जियाडा की बैठकों में आने वाले संगठन के प्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली को लेकर उन्होंने स्वयं एक भुक्तभोगी के रूप में आपत्ति महसूस की है।
उन्होंने यहां तक आरोप लगाया कि कुछ प्रतिनिधि “पॉकेट संस्था” की तरह भूमिका निभाते हैं। *सी ए की भूमिका पर भी उठे सवाल*
इसी क्रम में जियाडा से जुड़े एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। संबंधित सी ए को फिलहाल जियाडा की सेवाओं से अलग कर दिया गया है, लेकिन उनकी नियुक्ति में एसिया नेतृत्व की भूमिका रही थी। यह सी ए अपने आका का एजेंडा चलाते थे जिन्हें फिलहाल फिलहाल जियाडा से मुक्त कर दिया गया है।

*सवाल अब संगठन की भूमिका पर*

उद्योग क्षेत्र में उठती प्रतिक्रियाओं का मूल सवाल यही है कि उद्योग संगठनों की प्राथमिकता सामान्य उद्यमी की समस्याओं का समाधान होना चाहिए या संगठन से जुड़े प्रभावशाली लोगों के हितों की पैरवी?
महिला उद्यमी के 20 वर्ष पुराने भूखंड, नवोदित उद्यमियों की शिकायतों, जियाडा की बैठकों में प्रतिनिधियों की भूमिका, ऑटो क्लस्टर से जुड़े सवाल , स्ट्रीट लाइट के लिए शुल्क वसूली, प्लॉट के लिए ऑनलाइन बीडिंग, आदि मुद्दे औद्योगिक क्षेत्र की संस्थागत कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठाती हैं और इन मुद्दों की कसौटी पर एसिया की भूमिका बेहद कमजोर और एक व्यक्ति के इर्द गिर्द घूमती दिखाई देती है।…. जारी

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