जमशेदपुर 28 अगस्त संवाददाता -आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में संघ से जुड़े और एसिया नामक औद्योगिक संगठन को जेबी और फैंसी संस्था बनाने के लिये जाने जा रहे बहुचर्चित सफेदपोश उद्योगपति तथा सांसद के बीच रिश्तों में कल सामने आई तना- तनी की खबर ने एसिया से जुड़े हताश सदस्यों में एक ऊर्जा पैदा की है। अब उनका मानना है कि लगता है सांसद को भी उक्त सफेदपोश का असली चेहरा दिखने लगा है। कहा जाता है कि सांसद के प्रभाव के बल पर इस व्यक्ति ने राशन दुकान से उठकर औद्योगिक क्षेत्र में इंडस्ट्रीयल प्लाटों और फैक्ट्रियों की कतार लगा दी, उनके बल पर रक्षा मंत्रालय में घुसपैठ बनाकर आर्डर लेने में कामयाबी हासिल की, जिनके साथ मिलकर कोकाकोला वाले बंद प्लांट की जमीन और अन्य परिसंपत्तियों को हासिल किया, अब उनके साथ तनातनी होने के बाद क्या परिणाम सामने आता है, देखने वाली बात है। एसिया ऐसा औद्योगिक संगठन है जो पहले एसिया प्रसिद्ध आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में संघर्ष और उद्यमी हित के लिये जाना जाता था, आज नख -दंत विहीन होकर अधिकारियों के स्वागत और निजी स्वार्थ साधन का एक मंच भर बनकर रह गया है। एक जमाने में जहां इसके सदस्यों की संख्या उत्तरोत्तर बढती जा रही थी, आज गिरकर 500 से कम हो गई बताया जाता है। इसे पॉकेट संगठन बनाने का हर काम हुआ, जैसे बाईलॉज में परिवर्तन कर अध्यक्ष का लगातार दो टर्म बढाकर तीन टर्म करना और पुन: बीच में एक गैप कर फिर से चुनाव लडऩे के काबिल बनाना। आज यही कारण है कि इस संगठन पर व्यक्ति विशेष का कब्जा हो गया है, जबकि एक दशक पहले तक जब प्रमोद सिंह और विक्टर सिंह का जमाना हुआ करता था,यह व्यक्ति प्रेस विज्ञप्ति छपवाने के लिये संगठन में प्रेस प्रवक्ता की तरह भूमिका में जुड़ा। शकुनी की भांति तरह -तरह की चालें चलकर संगठन के प्रमोटरों और जुझारु लोगों को एक दूसरे से लड़ाया। फिर उन्हें बेइज्जत कराकर शांत करा दिया। प्रमोद सिंह और विक्टर सिंह भले आज दुनियां में नहीं है, लेकिन इस शकुनी चाल के मारे कई लोग अभी भी मौके का इंतजार कर रहे हैँ।
आज औद्योगिक क्षेत्र में अवस्थित उद्योगों के समक्ष कई समस्याएंं हैं। लेकिन इनके लिये कभी आवाज नहीं उठाई जाती। सदस्य अपने संगठन के ग्रुप में खुलेआम संघ की समस्याओं को उठा रहे हैं। कई निराश भी हैं जो कहते हैं कि नक्कारखाने में तूती बजाने की कोशिश मत करो, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।फिलहाल सडक़ और बिजली खासकर स्ट्रीट लाइट की समस्या से सदस्यों में काफी असंतोष है। एसिया के प्रति अधिकांश सदस्यों में अब दिलचस्पी भी घटती जा रही है। हालत यहां तक आ गई बताया जा रहा है कि सरकारी सिस्टम के इंस्पेक्टर राज ने उद्यमों को अपने शिकंजे में कसकर जकड़ रखा है। लेकिन एसिया नेतृत्व को इससे कोई लेना देना नहीं है। यह भी कहा जाता है कि जब किसी सरकारी अधिकारी का स्वागत या कोई कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तो उपस्थिति दिखाने के लिये नेतृत्वकर्ता अपनी – कंपनियों के लोगों को बुलाकर भीड़ के रूप में दिखाते हैं। क्या कारण है कि जहां सभी संगठनों में सदस्यता लेने की की होड़ रहती है वहीं एसिया में उदासीनता बढ रही है….. जारी
