बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीटों का कितना अंतर
एक जुलाई से 25 अगस्त 2026 के बीच हुए इस सर्वे के मुताबिक अगर आज लोकसभा चुनाव हुए तो NDA को 45% वोट और इंडिया गठबंधन को 39% वोट, अन्य को 16% वोच मिलेंगे। वहीं अगर सीट के लिहाज से देखा जाए तो 1,16, 644 लोगों के बीच हुआ यह सर्वे बताता है कि बीजेपी को 261 सीटें जबकि कांग्रेस को 106 सीटें मिलेंगी। वहीं अन्य दलों को 16 सीट मिलने का अनुमान बताया गया है।
| गठबंधन | कितनी सीटें मिलेंगी | वोट शेयर |
| NDA | 326 | 45% |
| इंडिया गठबंधन | 185 | 39% |
| अन्य | 16 | 16% |
नोटः आंकड़े इंडिया टुडे- सी वोटर सर्वे से लिए गए हैं।
एनडीए को बहुमत और पिछड़ रहा इंडिया गठबंधन
- सर्वे के आंकड़ों को अगर यही नंबर सीटों में बदल जाए आज की स्थिति में, तो एनडीए को 326 सीटें मिलने का अनुमान है।
- अगर आज चुनाव होते हैं तो एनडीए को 326 सीटें और 45 प्रतिशत वोट शेयर, इंडिया अलायंस को 185 सीटें और 39 प्रतिशत वोट शेयर और अन्य के खाते में, जिसमें डीएमके से लेकर बाकी तमाम पार्टियां भी शामिल होंगी।
- वहीं अन्य दलों आम आदमी पार्टी, डीएमके वगैरह, उन्हें 32 सीटें और उसके साथ-साथ 16 प्रतिशत का वोट शेयर इसमें मिल सकता है।
- इसका मतलब साफ है कि आज की स्थिति में भी एनडीए अपने बलबूते पर सरकार बना सकती है।
पिछले कुछ महीनों में सरकारी भर्तियों और प्रवेश परीक्षाओं में हुए पेपर लीक की घटनाओं ने देश के युवाओं के गुस्से को भड़का दिया है. सर्वे के नतीजे बताते हैं कि 40 प्रतिशत युवाओं ने प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्षता पर कहा कि उन्हें व्यवस्था पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है. इसके अलावा 27 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि उन्हें इस प्रणाली पर बहुत कम भरोसा है. इस प्रकार कुल मिलाकर 67 प्रतिशत युवा आज परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं और केवल 14 प्रतिशत युवा ही इसे पूरी तरह निष्पक्ष मानते हैं. इसके साथ ही Gen-Z के 17 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया बेहद धीमी और गैर-भरोसेमंद हो चुकी है. सरकार की सबसे बड़ी नाकामी के सवाल पर 9.8 प्रतिशत लोगों ने धांधली और भ्रष्टाचार रोकने में विफलता को मुख्य वजह माना है, जो कि पिछले सर्वे के 1.4 प्रतिशत के आंकड़े के मुकाबले एक भारी उछाल है.
आर्थिक मोर्चे पर चौतरफा दबाव और जनता का असंतोष
पेपर लीक के गुस्से को महंगाई और बेरोजगारी की समस्या ने और भी बढ़ा दिया है. सर्वे के अनुसार देश के सामने सबसे बड़ी समस्या के रूप में 22.7 प्रतिशत लोगों ने बेरोजगारी को नंबर एक संकट बताया है. जब बेरोजगारी की स्थिति पर गहराई से सवाल किया गया तो 42.3 प्रतिशत लोगों ने इसे बेहद गंभीर और 23.8 प्रतिशत लोगों ने गंभीर माना. एनडीए सरकार की सबसे बड़ी नाकामी के रूप में 23 प्रतिशत लोगों ने महंगाई और 15.9 प्रतिशत लोगों ने बेरोजगारी को जिम्मेदार ठहराया.
दैनिक जीवन के खर्चों को लेकर 65 प्रतिशत लोगों ने साफ कहा कि पिछले साल के मुकाबले रोजमर्रा के खर्च इतने बढ़ गए हैं कि घर चलाना मुश्किल हो रहा है. आर्थिक नीतियों के लाभ पर 55.7 प्रतिशत जनता का मानना है कि इससे केवल बड़े उद्योगपतियों को फायदा हुआ है, जबकि किसानों के पक्ष में 8.1 प्रतिशत और छोटे कारोबारियों के पक्ष में केवल 6.4 प्रतिशत लोगों ने सहमति जताई. कुल मिलाकर 43.7 प्रतिशत लोगों का मानना है कि आर्थिक विकास का लाभ सिर्फ अमीर तबके तक सीमित रह गया है. इसके अलावा 43.2 प्रतिशत लोगों का मानना है कि मौजूदा शासन में भ्रष्टाचार बढ़ा है.
Gen-Z की प्राथमिकताएं और उनका राजनीतिक रुख
पेपर लीक और रोजगार की मार झेल रहा Gen-Z सबसे ज्यादा प्रभावित है, लेकिन यही वर्ग सरकार के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी किरण बना हुआ है. व्यक्तिगत तौर पर Gen-Z के 53 प्रतिशत युवाओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा नौकरी और रोजगार है, जिसके बाद 22 प्रतिशत युवाओं के लिए शिक्षा और परीक्षा की निष्पक्षता सबसे अहम मुद्दा है. रोजगार के अवसर बढ़ाने की मुख्य जिम्मेदारी के सवाल पर 63 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि यह केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है. वहीं 32 प्रतिशत युवा मानते हैं कि भारत में आज भी कड़ी मेहनत और योग्यता का सम्मान होता है. हालिया आंदोलनों के दौरान उभरे कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP जैसे प्रेशर ग्रुप को लेकर 39 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि इसे सिर्फ एक प्रेशर ग्रुप बने रहना चाहिए, न कि राजनीतिक दल बनना चाहिए. जब पूछा गया कि अगर CJP चुनाव लड़ती है तो क्या वे उसे वोट देंगे, तो 43 प्रतिशत युवाओं ने सीधा इनकार कर दिया और केवल 33 प्रतिशत ने समर्थन जताया. यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि युवा विरोध तो दर्ज करा रहे हैं, लेकिन वे किसी नए राजनीतिक दल या अस्थिरता के बजाय मुख्यधारा की व्यवस्था में ही सुधार चाहते हैं.
देश में लोकतंत्र की स्थिति पर 46.7 प्रतिशत लोगों का मानना है कि लोकतंत्र खतरे में है, जबकि 41.6 प्रतिशत लोग इससे असहमत हैं. चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी 40.9 प्रतिशत लोगों ने संदेह जताया है. अयोध्या के राम मंदिर में हुई चोरी की घटना पर 46.6 प्रतिशत लोगों का कहना है कि इससे केंद्र और राज्य सरकार दोनों की छवि को नुकसान पहुंचा है. पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग की नीति पर 58 प्रतिशत लोग बदलाव के पक्ष में हैं, जिनमें से 35 प्रतिशत वाहन सुरक्षा गाइडलाइन और 23 प्रतिशत नॉन-कंप्लाएंट गाड़ियों को छूट देने की मांग कर रहे हैं, जबकि केवल 21 प्रतिशत लोग मौजूदा नीति को बिना बदलाव जारी रखने के पक्ष में हैं. सांप्रदायिक सौहार्द के मुद्दे पर केवल 34 प्रतिशत लोग सुधार मानते हैं, जबकि 29.5 प्रतिशत का मानना है कि स्थिति बिगड़ी है. माहौल बिगड़ने का आरोप लगाने वालों में से 18.8 प्रतिशत लोग इसके लिए सत्ताधारी दल और उससे जुड़े संगठनों को जिम्मेदार ठहराते हैं.
पीएम मोदी का अटूट भरोसा और बड़ी नीतियों को समर्थन
तमाम चिंताओं के बावजूद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और सरकार के बड़े नीतिगत एजेंडों पर जनता का भरोसा बहुत मजबूत है. अगले प्रधानमंत्री के रूप में 48.7 प्रतिशत जनता आज भी नरेंद्र मोदी को अपनी पहली पसंद मानती है, जबकि राहुल गांधी 27.1 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर हैं. सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री की दौड़ में भी नरेंद्र मोदी 41.1 प्रतिशत के साथ शीर्ष पर बने हुए हैं. प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत कामकाज को 51.3 प्रतिशत जनता ने शानदार या अच्छा बताया है. नीतियों के मोर्चे पर सरकार को व्यापक समर्थन मिला है, जिसमें यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को 75.0 प्रतिशत समर्थन, घुसपैठ पर नियंत्रण को 76.2 प्रतिशत समर्थन, वन नेशन वन पोल को 70.4 प्रतिशत समर्थन, और सख्त दलबदल विरोधी कानून को 64.4 प्रतिशत समर्थन मिला है. इसके अलावा विकसित भारत 2047 के विजन को लेकर देश के 57.6 प्रतिशत लोग उत्साहित हैं.
