जौहर को कायर कहना कितना उचित?

पद्मावत के जौहर वाले दृश्य को अभिनेत्री स्वरा भास्कर द्वारा ‘कायरता’ कहे जाने के बाद विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। एक ओर सोशल मीडिया पर स्वरा भास्कर के बयान की आलोचना हो रही है, तो दूसरी ओर कई जानी-मानी हस्तियां भी इस पूरे प्रसंग पर अपनी राय रख रही हैं। इसी क्रम में पूर्व सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि, ‘अगर चुनाव मौत और जीतने वालों की गुलाम बनने के बीच हो, तो कई महिलाओं ने मौत को चुना। कुछ महिलाएं दूसरा विकल्प भी चुन सकती थीं। हालांकि, उन्होंने अपनी मर्जी का इस्तेमाल किया। कोई इससे सहमत हो या न हो, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन यह एक चुनाव था। एक ऐसा चुनाव जो एक महिला ने किया।’
सवाल यह है कि आज से करीब सात सौ वर्ष पहले के उस दौर को आज के नजरिये से देखकर उन महिलाओं के फैसले को कायरता कहना कितना उचित है? इतिहास को समझने के लिए उस समय की परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। उस दौर में युद्ध का अर्थ केवल जमीन और सत्ता पर कब्जा करना नहीं था। पराजित शासक के परिवार की महिलाओं को भी विजेता की संपत्ति मान लिए जाने की मानसिकता मौजूद थी। युद्ध हारने के बाद राजपरिवार की महिलाओं के सामने अपमान, हिंसा, जबरन संबंध, गुलामी और कैद जैसे हालात पैदा हो सकते थे।
ऐसे वातावरण में कुछ महिलाओं ने जौहर को अपने सम्मान और अपनी इच्छा की अंतिम रक्षा के रूप में चुना। आज उस निर्णय से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, उस पर बहस भी की जा सकती है, लेकिन उन महिलाओं को कायर करार देना इतिहास की उस भयावह वास्तविकता को नजरअंदाज करना होगा जिसमें वे जी रही थीं। आज के सुरक्षित कमरे में बैठकर सात सौ वर्ष पहले की परिस्थितियों पर फैसला सुनाना आसान है, लेकिन उस समय उन महिलाओं पर क्या बीत रही थी, इसकी कल्पना करना उतना ही कठिन है।
आज परिस्थितियां निश्चित रूप से बदली हैं। किसी महिला के सामने हिंसा या उत्पीडऩ की स्थिति आए तो पुलिस, अदालत और कानून उसके लिए रास्ता उपलब्ध कराते हैं। समाज में भी महिलाओं के अधिकार और सम्मान को लेकर पहले से कहीं अधिक जागरूकता है। लेकिन क्या हमारी मानसिकता पूरी तरह बदल गई है? शायद नहीं।
अंतर इतना जरूर है कि आज अपराधी को कानून के सामने लाया जा सकता है। पीडि़ता न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है। सात सौ वर्ष पहले ऐसी संस्थागत व्यवस्था और विकल्प कहां थे? युद्ध में पराजित महिलाओं के साथ अत्याचार करने वालों के खिलाफ वे किस अदालत में जातीं? कौन उनकी सुनता? कौन उनके सम्मान की रक्षा करता?
यही बात इतिहास को समझने में सबसे महत्वपूर्ण है। किसी ऐतिहासिक घटना का मूल्यांकन करते समय हमें वर्तमान के नैतिक मानदंडों को हूबहू अतीत पर नहीं थोपना चाहिए। जौहर जैसी परंपरा पर सवाल उठाना अलग बात है और उसमें शामिल महिलाओं को कायर कहना बिल्कुल अलग बात।
हाल ही में इम्तियाज अली की फिल्म मैं वापस आऊंगा में भी ऐसे दर्दनाक दृश्य सामने आए हैं, जहां देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान में एक सिख परिवार की महिलाओं का उस परिवार की एक वृद्ध महिला ने अपने हाथों से चाकू से गला रेत दिया क्योंकि दरवाजे पर उनकी इज्जत के भूखे दंगाई खड़े थे। हिंसा और अपमान से बचने के लिए महिलाओं के सामने मौत को चुनने जैसी परिस्थितियां दिखाई गई हैं। विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा के दौर में भी ऐसी असंख्य त्रासदियां हुईं, जिनमें महिलाओं ने अपने सामने मौजूद भयावह परिस्थितियों के बीच बेहद कठोर निर्णय लिए।
जौहर पर इतिहासकारों की अलग-अलग राय हो सकती है। इसे परंपरा, प्रतिरोध, विवशता या आत्मसम्मान—किस रूप में देखा जाए, इस पर बहस हो सकती है। लेकिन जिन महिलाओं के सामने विकल्प ही सीमित या समाप्त हो चुके थे, उनके फैसले पर आज बैठकर ‘कायरता’ का ठप्पा लगा देना शायद उनके दर्द को समझने के बजाय उसे और छोटा करना है।
इतिहास का न्याय वर्तमान की सुविधा से नहीं, उस समय की परिस्थितियों को समझकर होना चाहिए। जो लोग उस आग से गुजरे थे, उनके दर्द का अनुमान लगाना आसान नहीं है। इसलिए जौहर पर बहस जरूर हो, लेकिन उन महिलाओं के साहस, विवशता और परिस्थितियों को समझे बिना उन्हें कठघरे में खड़ा करना इतिहास के साथ भी अन्याय है और उन महिलाओं के साथ भी।

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