एक दौर था, जब देश में करीब दर्जन भर मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियां थीं। डेटा की मात्रा आज के मुकाबले बेहद कम थी, लेकिन उसकी कीमत भी कम थी। छोटे से रिचार्ज के बाद ग्राहकों को लंबे समय तक इनकमिंग की सुविधा मिल जाती थी। यही वह दौर था, जब मोबाइल धीरे-धीरे घर-घर पहुंचने लगा।
फिर आया जियो का दौर। उस समय करीब 200 रुपये में कंपनियां एक महीने के लिए 2 जीबी डेटा देती थीं। जियो ने बाजार में कदम रखा तो मुफ्त कॉलिंग और लगभग असीमित डेटा वाले आक्रामक प्लान सामने आए। सस्ते और मुफ्त ऑफरों की इस होड़ में देखते ही देखते जियो के सिम बड़ी संख्या में लोगों के हाथों में पहुंच गए।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जियो की आक्रामक रणनीति का असर यह हुआ कि एक-एक कर कई मोबाइल कंपनियां बाजार से बाहर होती चली गईं। आज स्थिति यह है कि देश के दूरसंचार बाजार में मुख्य रूप से तीन बड़े निजी मोबाइल सेवा प्रदाता रह गए हैं। नतीजा यह हुआ कि जिस प्रतिस्पर्धा का लाभ कभी ग्राहक को मिलता था, वह धीरे-धीरे सीमित होती गई।
आज किसी ग्राहक को अपना मोबाइल नंबर चालू रखने के लिए भी हर महीने करीब 200 से 300 रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। समस्या सिर्फ इतनी नहीं है। जिन लोगों को डेटा की जरूरत नहीं है, उन्हें भी ऐसे पैकेज लेने पड़ते हैं जिनमें डेटा अनिवार्य रूप से शामिल होता है। जिनके पास साधारण बटन वाला मोबाइल है, उन्हें भी स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों जैसी योजनाओं का भुगतान करना पड़ता है।
दो सिम रखने वाले ग्राहक की परेशानी और बढ़ जाती है। यदि दोनों नंबर जरूरी हैं—मसलन एक नंबर बैंक खाते, आधार और दूसरे जरूरी दस्तावेजों में दर्ज है—तो केवल नंबर चालू रखने के लिए ही हर महीने 600-700 रुपये तक खर्च हो सकते हैं। चार सदस्यों वाले परिवार में यह बोझ आसानी से 2,500 से 3,000 रुपये महीने तक पहुंच सकता है।
मोबाइल अब विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। बैंकिंग से लेकर आधार, ओटीपी, सरकारी सेवाओं और रोजमर्रा के काम तक मोबाइल नंबर से जुड़े हैं। इसलिए ग्राहक के पास नंबर बंद कराने का विकल्प भी व्यवहार में आसान नहीं है।
इसी संदर्भ में केवल वॉइस कॉल और एसएमएस की जरूरत वाले ग्राहकों के लिए अलग और कम कीमत वाले प्लान उपलब्ध कराने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। यदि नियामक की पहल जमीन पर लागू होती है तो यह उन करोड़ों ग्राहकों के लिए राहत का कारण बन सकती है, जिन्हें डेटा की जरूरत नहीं होने के बावजूद उसके लिए भुगतान करना पड़ता है।
मोबाइल कंपनियों की एक और व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। 28 दिन की वैधता वाले प्लान ने महीने के हिसाब से भुगतान की पुरानी व्यवस्था को बदल दिया है। इसका सीधा अर्थ है कि 12 महीने में 12 के बजाय कई मामलों में 13 बार रिचार्ज करना पड़ता है। ग्राहक के लिए यह मामूली अंतर नहीं है; करोड़ों ग्राहकों पर इसका सामूहिक आर्थिक प्रभाव पड़ता है।
दूरसंचार क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कम होने के बाद ग्राहक की सौदेबाजी की ताकत भी कम हुई है। ऐसे में नियामक की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। सवाल यह नहीं है कि कंपनियां कितना मुनाफा कमाती हैं, सवाल यह है कि क्या ग्राहक को उसकी जरूरत के मुताबिक सेवा चुनने की वास्तविक स्वतंत्रता मिल रही है?
मोबाइल आज जरूरत है, मजबूरी नहीं बनना चाहिए। यदि किसी ग्राहक को केवल कॉल और एसएमएस चाहिए तो उसे डेटा खरीदने के लिए मजबूर करना उचित नहीं कहा जा सकता। उम्मीद यही की जानी चाहिए कि नियामक की पहल केवल कागज तक सीमित न रहे और ग्राहकों को वास्तव में सस्ते, जरूरत आधारित विकल्प मिलें।
मोबाइल सेवा का मतलब सुविधा होना चाहिए, हर महीने चुकाया जाने वाला ‘रंगदारी टैक्स’ नहीं।
