जमशेदपुर : आदित्यपुर ऑटो क्लस्टर में चर्चित सफेदपोश व्यक्ति की निदेशक पद पर नियुक्ति को लेकर उठे सवाल अब कंपनी के संचालन, निदेशक मंडल की संरचना और सरकारी प्रतिनिधित्व तक पहुंच गए हैं। इस संबंध में आर ओ सी, रांची को शिकायत भेजी जा रही कि वह इस विषय पर कानूनी कार्रवाई करे। यह सफेदपोश 2015 से यहां अनियमित ढंग से स्वतंत्र निदेशक के पद पर नियुक्त है ,जबकि वह स्वतंत्र निदेशक की अहर्ता पूरी नहीं करते, अलबत्ता एसिया से जुड़े हैं, स्वयं शेयर होल्डर हैं। न्यू इस्पात मेल में खबर प्रकाशित होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि नियुक्ति प्रक्रिया में जो अनियमितता हुई है वह इतने लंबे समय तक कैसे बनी रही और अब कंपनी कानून के तहत उसे दुरुस्त करने की जिम्मेदारी किसकी होगी ?
उपलब्ध कॉरपोरेट रिकॉर्ड के अनुसार आदित्यपुर ऑटो क्लस्टर में वर्तमान में 9 निदेशक दर्ज हैं। इनमें जियाडा के प्रेम रंजन नॉमिनी निदेशक के रूप में दर्ज हैं । ऐसे में निदेशक मंडल की वास्तविक संरचना, प्रत्येक निदेशक की नियुक्ति का आधार, नामांकन करने वाली संस्था और उनके वर्तमान प्रतिनिधित्व की स्थिति को सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट किया जाना महत्वपूर्ण हो जाता है।
सरकारी प्रतिनिधित्व का सवाल
ऑटो क्लस्टर की स्थापना स्थानीय उद्योगों के विकास, तकनीकी सहयोग और औद्योगिक अधोसंरचना को मजबूत करने के उद्देश्य से हुई थी। इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार, तत्कालीन आयडा/जियाडा, एसिया और अन्य उद्यमियों की भूमिका रही है।
ऐसे संस्थान में सरकारी हिस्सेदारी अथवा नामित निदेशक पद रिक्त रहे हों तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि बोर्ड के निर्णयों में सरकारी हितों का प्रभावी प्रतिनिधित्व कैसे सुनिश्चित किया गया ?
*क्या बोर्ड की संरचना की फिर से समीक्षा होगी?*
कंपनी कानून के जानकारों के हवाले से यह चर्चा है कि निदेशक की नियुक्ति या बोर्ड गठन में वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है । इस कारण संबंधित दस्तावेजों, नामांकन, बोर्ड प्रस्ताव और ROC/MCA में दाखिल विवरण की जांच जरूरी है। इसलिए अब मूल प्रश्न सिर्फ किसी एक व्यक्ति की नियुक्ति का नहीं, बल्कि यह है कि ऑटो क्लस्टर के बोर्ड का गठन उस समय लागू नियमों और कंपनी के संविधानों के अनुरूप हुआ था या नहीं।
9 निदेशक और एसिया का प्रभाव?
वर्तमान बोर्ड के उपलब्ध रिकॉर्ड में नौ निदेशक दर्ज हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिन्हें किसी न किसी रूप में एसिया से जुड़ा माना जाता है। अतः संबंधित निदेशकों की वर्तमान अथवा पूर्व संस्थागत संबद्धता को दस्तावेजों के आधार पर अलग-अलग स्पष्ट किया जाना चाहिए।
यही वह बिंदु है जहां ऑटो क्लस्टर के संचालन में संस्था बनाम व्यक्तियों के प्रभाव का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।
कभी नेतृत्वकारी उद्यमियों की थी मजबूत मौजूदगी
ऑटो क्लस्टर के शुरुआती दौर में विक्टर सिंह, एस.के. बेहरा, विकास मुखर्जी, अतुल दुआ, किलोल डी. कमानी, दिलीप गोयल और सज्जन कुमार नरेडी जैसे उद्यमियों के नाम निदेशक मंडल से जुड़े रहे हैं। यह पड़ताल का विषय है कि समय के साथ ऐसे अनुभवी उद्यमी बोर्ड से क्यों बाहर हुए और क्या इससे किसी एक समूह या सीमित व्यक्तियों का प्रभाव बढ़ा ?
सवाल अब सरकार से
ऑटो क्लस्टर में सरकारी और संस्थागत हिस्सेदारी सर्वाधिक है , फिर बोर्ड की संरचना, नामांकन और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता भी उतने ही महत्वपूर्ण ढंग से होना चाहिए।
न्यू इस्पात मेल के खुलासे के बाद अब अपेक्षा है कि जियाडा और राज्य सरकार पूरे मामले के दस्तावेजों की समीक्षा करें—कौन किसके प्रतिनिधि के रूप में निदेशक बना, नियुक्ति कब हुई, किस प्रस्ताव के आधार पर हुई और वर्तमान में प्रत्येक निदेशक किस संस्था का प्रतिनिधित्व करता है।
मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि उस संस्थान की गरिमा, पारदर्शिता और उद्योगहित को सुनिश्चित करना है जिसे सार्वजनिक संसाधनों और औद्योगिक हितों से जोड़कर खड़ा किया गया था।
आगे की पड़ताल
सवाल सिर्फ ऑटो क्लस्टर तक सीमित नहीं है। किसी संस्था में किसी का प्रभाव कैसे धीरे-धीरे बढ़ता है, पहले प्रतिनिधित्व, फिर निर्णय प्रक्रिया और अंततः संस्थागत नियंत्रण तक बात कैसे पहुंचती है – यह अपने आप में अलग पड़ताल का विषय है। एसिया, लघु उद्योग भारती, टाटानगर-बासुकीनाथ धर्मशाला और अन्य संस्थागत उदाहरणों के साथ ऐसा बेहिचक कहा जाता है कि सफेदपोश किस प्रकार इन संस्थाओं पर काबिज हुआ। पार्वती घाट से जुड़ा अध्याय भी इसी श्रृंखला की अगली कड़ी हो सकता है।.. जारी
