कोहरे के नाम पर हर साल जलियांवाला बाग एक्सप्रेस पर ही क्यों लगता है ब्रेक?

टाटानगर से चलने वाली जलियांवाला बाग एक्सप्रेस पिछले कई वर्षों से ठंड शुरू होते ही कोहरे के नाम पर करीब तीन से साढ़े तीन महीने के लिए बंद कर दी जाती है। हर साल यही कहानी दोहराई जाती है और हर बार यात्रियों तथा इस क्षेत्र के लोगों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ता है। आंदोलन के बाद रेलवे कभी पांच-दस दिन तो कभी कुछ और दिनों की राहत दे देता है, लेकिन मूल समस्या जस की तस बनी रहती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोहरा सिर्फ जलियांवाला बाग एक्सप्रेस को ही प्रभावित करता है? टाटानगर से अमृतसर और उत्तर भारत की ओर जाने वाली कई दूसरी ट्रेनें भी इसी रेल मार्ग से गुजरती हैं। उन ट्रेनों का परिचालन जारी रहता है, लेकिन जलियांवाला बाग एक्सप्रेस के लिए हर साल कोहरा अचानक इतना गंभीर हो जाता है कि उसका परिचालन ही रोक दिया जाता है। रेलवे को इसका स्पष्ट और तार्किक जवाब देना चाहिए।
यह सही है कि दिसंबर से उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा घने कोहरे की चपेट में रहता है और इससे ट्रेनों की रफ्तार प्रभावित होती है। सुरक्षा रेलवे की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि यदि कोहरे के कारण ट्रेनों की गति कम की जा सकती है, समय-सारिणी में बदलाव किया जा सकता है या अन्य परिचालन उपाय किए जा सकते हैं तो एक ट्रेन को लगातार तीन महीने तक बंद करना ही एकमात्र समाधान क्यों है?
टाटानगर के लोगों की मांग पर करीब दो दशक पहले इस ट्रेन का परिचालन शुरू हुआ था। आज भी यह ट्रेन सप्ताह में महज दो दिन चलती है। लंबे समय से इसका फेरा बढ़ाने की मांग होती रही है, लेकिन रेलवे उस पर गंभीरता से विचार करने के बजाय सर्दियों में इसका परिचालन ही रोक देता है। यह स्थिति निश्चित रूप से यात्रियों के लिए निराशाजनक है।
एक ओर रेलवे देश में आधुनिक और तेज रेल व्यवस्था की बात कर रहा है। वंदे भारत से लेकर बुलेट ट्रेन तक की चर्चा हो रही है। दूसरी ओर वर्षों से चली आ रही एक महत्वपूर्ण ट्रेन का परिचालन हर साल तीन महीने के लिए रोक दिया जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
रेलवे को बताना चाहिए कि जलियांवाला बाग एक्सप्रेस को ही कोहरे की मार बार-बार क्यों झेलनी पड़ती है? यदि सुरक्षा कारण वास्तविक हैं तो दूसरे विकल्पों पर विचार क्यों नहीं किया जाता? और यदि दूसरे विकल्प संभव हैं तो यात्रियों को हर साल इस परेशानी से क्यों गुजरना पड़ता है?
रेलवे को इस मामले में केवल आंदोलन के दबाव में कुछ दिनों की राहत देने के बजाय स्थायी समाधान तलाशना चाहिए। ट्रेन बंद करना आसान है, लेकिन यात्रियों की जरूरतों को समझकर व्यवस्था को बेहतर बनाना ही असली रेल प्रबंधन है।

Share this News...