इलाज के नाम पर मुनाफे का खेल कब रुकेगा?

शिक्षा और स्वास्थ्य को हमेशा से सेवा के क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में जिस तरह इलाज और दवाओं की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है, उसने इस सेवा-भावना पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। महंगी जांच, महंगी दवाएं और अस्पतालों के भारी-भरकम बिलों के बीच आम आदमी बीमारी से कम और इलाज के खर्च से ज्यादा परेशान नजर आता है।
सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का मुद्दा उठा। अदालत के सामने जिस उदाहरण का जिक्र हुआ, वह इस पूरे खेल को समझने के लिए काफी है। एक इंजेक्शन का अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी 22,437 रुपये बताया गया, जबकि खुदरा विक्रेता के लिए उसकी कीमत करीब 3,520 रुपये थी। सवाल सीधा है—इन दोनों कीमतों के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों और आखिर इसका लाभ किसे मिलता है?
समस्या केवल दवा की कीमत तक सीमित नहीं है। अस्पताल में भर्ती होने के बाद मरीज और उसके परिजनों के विकल्प लगातार सीमित होते जाते हैं। कई अस्पतालों में मरीजों को अस्पताल के ही इन-हाउस मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने के लिए कहा जाता है। यदि वही दवा बाहर किसी केमिस्ट से कम कीमत पर उपलब्ध हो, तो कई बार उसे अस्पताल में स्वीकार करने में भी आनाकानी की जाती है। ऐसे में मरीज के सामने कोई विकल्प नहीं बचता। वह इलाज के साथ-साथ अस्पताल की शर्तों का भी पालन करने को मजबूर होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाया कि कीमतों में इतने बड़े अंतर की रकम आखिर किसकी जेब में जाती है। यह सवाल केवल किसी एक दवा या अस्पताल का नहीं, बल्कि पूरी चिकित्सा व्यवस्था में पारदर्शिता का सवाल है। जब बीमारी से जूझ रहा परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो जाता है, तब दवा और इलाज की कीमतों में मनमानी उसके लिए दोहरी मार बन जाती है।
सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र पर भारी राशि खर्च करती है और सरकारी अस्पतालों के विस्तार तथा सुविधाओं की बात भी लगातार होती है। इसके बावजूद अनेक स्थानों पर मरीजों को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। अस्पताल तक मरीज को खाट पर ले जाने की तस्वीरें आज भी सामने आती हैं। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था जितनी मजबूत होगी, निजी अस्पतालों पर आम आदमी की निर्भरता उतनी ही कम होगी।
निजी चिकित्सा व्यवस्था की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इलाज को ऐसा कारोबार भी नहीं बनाया जा सकता जिसमें मरीज की मजबूरी सबसे बड़ा बाजार बन जाए। बीमारी के समय व्यक्ति मोलभाव की स्थिति में नहीं होता। वह अपने या अपने परिजन की जान बचाने के लिए डॉक्टर और अस्पताल पर भरोसा करता है। इसी भरोसे का फायदा उठाकर यदि दवाओं और उपचार की कीमतों में असामान्य अंतर रखा जाता है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत अधिकतम खुदरा मूल्य से ऊपर मार्जिन को सीमित करने संबंधी सुझाव इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। जरूरत इस बात की है कि दवाओं की कीमत तय करने से लेकर मरीज तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो। अस्पतालों को भी यह स्पष्ट करना चाहिए कि किसी दवा की खरीद केवल उनके ही मेडिकल स्टोर से क्यों कराई जा रही है और मरीज को बाहर से दवा खरीदने का विकल्प क्यों नहीं दिया जाता।
स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य मरीज को स्वस्थ करना होना चाहिए, न कि उसकी बीमारी को मुनाफे का अवसर बनाना। जब इलाज जिंदगी बचाने की जरूरत से बदलकर मुनाफे का कारोबार बन जाता है, तब सबसे ज्यादा चोट उस आम आदमी को लगती है जो बीमारी के सामने पहले ही बेबस होता है।

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