जमशेदपुर, 6 सितंबर। एक कहावत है बड़ -बड़ घोड़ा दहाय जाय गदहा पूछे केतना पानी ….अर्थात जहां सामर्थ्यवान लोग विषय की गंभीरता को देखते हुए चुप लगाए हों वहां कोई अज्ञानी अपनी क्षमता से बढ़ कर सवाल करे या यह कहे कि बैल को देखकर गौरैया नाल ठोकवाने के लिए आगे आये तो क्या कहा जाय? कुछ इसी तरह का वाकया दुहराने की कोशिश की है आदित्यपुर के सफेदपोश स्क्रैप और उद्योग माफिया के एक पेड मैनेजर ने।
न्यू इस्पात मेल में सीरीज में प्रकाशित हो रहे उस सफेदपोश स्क्रैप और उद्योग माफिया के कारनामों को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के खिलाफ न्यू इस्पात मेल द्वारा अखबारी मुहिम के रूप में कुप्रचार देने और स्वयं सेवकों में झूठे आक्रोश की बात फैलाने वाले उस पेड मैनेजर के कारनामों से भी पाठकों को अवगत कराने का समय आ गया है। इसका इतिहास जानने पर सब बातें स्पष्ट हो जाएं कि वास्तव में संघ के साथ कारोबार स्वार्थ के लिए यह सफेदपोश कितना धोखा कर रहा । उक्त सफेदपोश ने एक योजना के तहत उस पेड मैनेजर को सांसद प्रतिनिधि बनवा कर बिठा दिया जो स्वयं संघ विरोधी कार्य में लिप्त पकड़े जाने पर ज्येष्ठ और श्रेष्ठ प्रचारकों पर हाथ उठाने का दोषी रहा है। स्वाभाविक रूप से स्वयंसेवकों में यह चर्चा होती है कि यह प्राइज पोस्टिंग क्यों और कैसे? सांसद को लेकर चर्चा होती थी कि वह जनहित के बजाय उस उद्योग माफिया की फैक्ट्रियों को ऑर्डर के लिए रेल, रक्षा, आदि मंत्रालयों में ज्ञापन सौंपने के बहाने लॉबिंग करते हैं। सब कार्यकर्ता इस चर्चा को निराश हताश सुनते रहते थे , लेकिन न्यू इस्पात मेल में तनातनी की बात सामने आने पर सब राहत महसूस कर रहे हैं। कह रहे सांसद ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ , अन्यथा उद्योग क्षेत्र में मेंटर को कुचलने में देर नहीं लगी तब मौका पाकर माननीय को भी चलता कर दे यह माफिया। आदित्यपुर ही नहीं आसपास जगहों पर संघ की गतिविधियां कमजोर होने के पीछे सांसद के राजनीतिक कार्यालय के दुरुपयोग का बड़ा कारण बताया जाता है। दूसरी ओर सफेदपोश की चलती बढ़ती गई। पता करने पर आश्चर्य होता है कि बागबेड़ा मुहल्ले में जहां यह पेड मैनेजर निवास करते हैं, इनको लोग पसंद नहीं करते लेकिन बना दिए गए एक बड़े संसदीय क्षेत्र के सांसद के प्रतिनिधि। एक तीर से अनेक निशान की योजना के तहत सफेदपोश अपने उस पेड मैनेजर के जरिए सांसद की गतिविधियों पर नजर रखता है। कहा जाता है कि उसकी सांसद के यहां नियुक्ति सिद्धांतों और नीतियों को ताक पर रख कराई गई । यह मैनेजर स्वयं संघ विरोधी कार्यों में लिप्त रहा। उसे प्राइज पोस्टिंग किसके इशारे पर मिली ,यह संघ पदाधिकारी आसानी से पता कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें बहुत पीछे नहीं, सिर्फ बागबेड़ा सरस्वती शिशु मंदिर तक जाना होगा। न्यू इस्पात मेल में छप रही खबरों पर इस पेड़ मैनेजर ने संपादक को व्हाट्सएप्प पर लिखा — ‘आपके द्वारा प्रेषित कतरन प्रतिदिन देख रहा हूँ। अब उबकाई सी आने लगी है।’
*वही सांसद!वही विधायक!*
*वही गाय! वही गोहाल*!
*वही एशिया!* *वही अफ्रीका!*
*वही जियाडा*! *रियाडा*!
*ये दिल मांगे मोर*
*हाँ इसी क्रम में आप प्रतिदिन एक गलती करते चले जा रहे हैं। एक राष्ट्रवादी एवं देशभक्त संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम प्रतिदिन घसीट रहे हैं, जिसकी तीखी प्रतिक्रिया स्वयंसेवकों में है। साथ ही एक और पाप आप कर चुके हैं! ना जाने किसके बहकावे में आकर एक अत्यंत ज्येष्ठ और श्रेष्ठ प्रचारक जी के नाम का उल्लेख कर आपने अत्यंत निंदनीय कार्य किया है। यह बिल्कुल अस्वीकार्य है!* अखबार में अपने आका सफेदपोश के बेनकाब हो रहे चेहरे से ध्यान हटाने के लिए स्वयंसेवकों की बात कहां से श्रीमान को सूझी, नहीं पता, लेकिन कहते हैं न ईश्वर आपके कर्मों को आपकी ही जिह्वा से उगलवा देता है, ठीक उसी तरह जैसे हर अपराध अपना सबूत छोड़ता है। आप राजनीतिक कार्यालय में बैठ कर संघ का दुरुपयोग कर रहे एक सफेदपोश का बचाव करने किस कारण से आए , जबकि आप पर संघ और स्वयं सेवक विरोधी होने का आरोप चस्पा है ? तो क्या उनके मुंह से उनकी ही पोल खुल गयी? अखबार की कतरनों से उन्हें उबकाई आ रही थी. तब उबकाई आने पर खटाई चटाना देहाती टोटका और मानवीयता भी है। शायद यह खटाई उन्हें पसंद आए *-सरस्वती शिशु मंदिर में जिस पर हाथ उठाया गया था, वह भी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ प्रचारक थे। हाथ उठाने वालों में यह मैनेजर साहब थे।*
*स्व रमाकांत राय जी की दिवंगत पुण्य आत्मा ढूंढ रही खटाई ताकि पूर्व निष्कासित सचिव की बंद हो अब उबकाई*…
*राम जी की कृपा से जो बने इंद्र के प्यारे विद्युत की ऊर्जा से आगे जीवन अबतक संवारे*… *पर भूल गए तुम उसे भी मतलबी जिसने जीता इंद्रीय को और कभी जो तुम्हें थे संकट से उबारे* …
*तुमने पापाचार किया दिवाकर पर प्रहार किया* ।किस मुँह से स्वयंसेवक कहलाते हो जो स्वयं स्वार्थ सिद्धि में लोगों को बरगलाते हो? जुगसलाई थाने में इसी मैनेजर ने संघ के अनेक वरीय पदाधिकारियों जिनमें संगठन मंत्री, प्रदेश मंत्री स्तर के लोग थे एफआईआर दर्ज करायी है.
पहले भी हमने स्पष्ट किया कि अखबार की पंक्तियों में प्रचारक का जिक्र नहीं होने पर भी इस मैनेजर साहब में व्यक्ति पूजक के नाते नमक का कर्ज अदा करने का धर्म जग गया और अखबार के खिलाफ स्वयं सेवकों को उकसाने का प्रयास किया,लेकिन भ्रष्टाचार के मामले से बचने और बागबेड़ा में सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल पर कब्जा करने के लिए प्रचारक पर हमला करते समय मैनेजर साहब को संघ परंपरा की मर्यादा वाला धर्म नहीं जगा? एक तरफ मालिक के प्रति निष्ठा का धर्म और दूसरी तरफ शिशु मंदिर पर कब्जे का अधर्म ? कहां हैं आपके वह माननीय जिनके संरक्षण में चला था सारा प्रकरण..?
तब कहाँ था राष्ट्रभक्ति का संस्कार जब गाली देते फिरते थे एक निश्चल मन के साधु को…
बात निकली है तो दूर तलक जाएगी… (जारी)
