सांसद से तनातनी 3.. प्याज के छिलके की तरह उधड़ रहे इस सफेदपोश उद्यमी के कारनामे

” माल महाराज का मिर्जा खेले होली ” अथवा ” पर माथे फलाहार” आदि कहावत हैं जिनका यह अर्थ लगाया जाता है कि गैर जिम्मेदाराना ढंग से उस धन संपति को उड़ाना या फूंकना जिसे स्वयं कड़ी मेहनत से अर्जित नहीं किया गया हो। बात चल रही है आदित्यपुर के उस सफेदपोश उद्योग कारोबार माफिया की जिसने सांसद की उंगली पकड़ कर औद्योगिक क्षेत्र में अनेक उद्योग और प्लॉट खरीदे और अब सांसद और उनके पुत्र को ही किनारे करने की कोशिश शुरू कर दी जिसके बाद इस सफेदपोश माफिया का कच्चा चिट्ठा खोलने के लिए लोग खड़ा होने लगे हैं। दूसरों के कंधे पर चढ़ कर ऊंचा उठने और पांव रखने की जगह बनाकर उसे ही कुचल देने, मुंह से ऐसी मीठी वाणी बोलने कि सुनने वाले को डायबिटीज हो जाय, जैसी विशेषताओं को लेकर चर्चा में रहने वाले इस सफेदपोश ने सिर्फ उद्यमियों के हित के लिए गठित “एसिया ” जैसे संगठन को ही कमजोर बना कर पॉकेट में नहीं रखा, बल्कि ऐसे अनेक संगठन और संस्थाओं को पॉकेट में करने अथवा उन्हें कमजोर करने के लिए चर्चा बटोरी है। टाटानगर बासुकीनाथ धर्मशाला ऐसी संस्थाओं की सूची में उल्लेखनीय है। चंदा ले -लेकर शहर , खासकर जुगसलाई के कतिपय कारोबारियों ने इसकी स्थापना की ,ताकि बाबाधाम के बाद बासुकीनाथ जानेवाले लोगों और विशेष कर शहर के श्रद्धालुओं को ठहरने -, आदि की सुंदर व्यवस्था हो सके। इसकी स्थापना हेतु झारखंड, बिहार एवं निकटवर्ती ओडिशा के दानवीरों से चंदा लिया गया।लेकिन आश्चर्य होता है जब इस बात का खुलासा हुआ कि चंदे से एकत्रित राशि में से पांच लाख रुपए कोरोना काल में इस स्वनामधन्य सफेदपोश ने मुख्यमंत्री कोष को खैरख्वाही में दान दिया। यह सफेदपोश टाटा नगर बासुकीनाथ धर्मशाला में एक प्रमुख पद पर हैं। चंदे का दान, मंदिर की दान पेटी से दान, धर्मशाला कोष में भिक्षाटन से जमा राशि का दान ठीक उसी प्रकार है – माल महाराज का मिर्जा खेले होली या पर माथे फलाहार। विदित हो यह सफेदपोश राशन दुकान से ऊपर उठा। आदित्यपुर का स्वराज पाल बन गया। बड़ी शान से कहता है कि बेटे उन्हें चालीस- पचास हजार का टी शर्ट पहनने के लिए देते हैं। जब खुद इतने बड़े लोग हैं तो कोरोना में पांच लाख अपने खाते से दे सकते थे। टाटा नगर बासुकीनाथ धर्मशाला तो कोई इनका फाउंडेशन नहीं है। इसे रत्ती- रत्ती राशि जोड़कर खड़ा किया गया, फिर चंदा की राशि राहत कोष में दे कर कौन सा पुण्य का निर्णय किया गया, समझ से परे है, जबकि इसके लिए न इसकी संचालन समिति और न ही किसी ट्रस्टी से सहमति ली गयी। कहा जाता है कि मुट्ठी भर आंटा छींट कर या कबूतरों के बीच किलो- दो किलो चावल छींटकर कुछ लोग बहुत बड़ा धर्मादा का काम करने वाले बनते हैं । लेकिन यहां चंदे की राशि से दान की नई कहानी सामने आई। इस रवैये पर टाटा नगर बासुकीनाथ धर्मशाला कमिटी के सदस्यों में बहुत असंतोष और आक्रोश भी पैदा हुआ और बैठकों में इसका विरोध करते हुए जवाब मांगा जो आज तक शायद नहीं बताया गया है। अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भी भीतर झांकना चाहिए कि उसके साथ ऐसे लोग जुड़कर समाज में क्या संदेश भेज रहे। संघ को सजग होना चाहिए कि सनातन वसुधैव कुटुम्बकम् वाली संस्कृति के प्रचार प्रसार का चोला ओढ़कर उसके लोग समाज का हित साध रहे या निज का साम्राज्य खड़ा कर रहे। चंदे से बने धर्मशाला के कोष से दान के पीछे की बात समझने के लिए धर्मशाला सदस्य आज भी इंतजार कर रहे हैं। राज्य सरकार से अगर कोई रैपो कायम हुआ तब किसका- टाटानगर बासुकीनाथ धर्मशाला का, एसिया संगठन का या खुद का ? मजे की बात है इस धर्मशाला में अपने एक शाह जी (समधी साहब) को ट्रस्टी बना दिया है. इनसे जुड़ी अलग कहानी है जो इस सफेदपोश का असली चेहरा और करोड़ों की ठगी में भागीदारी वाला चेहरा के साथ कथनी कुछ -करनी कुछ वाला चेहरा बेनकाब कर देगी…. जारी

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