बदलती लौहनगरी: सिमटती रौनक, बिखरता अपनापन
जमशेदपुर अपनी कॉस्मोपॉलिटन संस्कृति के लिए देश ही नहीं दुनिया में विख्यात है। इस औद्योगिक नगरी की पहचान चौड़ी सडकें, साफ-सुथरा वातावरण, निर्बाध बिजली-पानी और हरियाली तो थी ही , यहां की सबसे बड़ी ताकत यहां का सामाजिक तानाबाना है ।देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग, अलग-अलग भाषाएं, खान-पान और संस्कृतियां होने के बावजूद जिस आत्मीयता से एक-दूसरे के साथ रहते आए हैं यह जमशेदपुर की विशिष्ट पहचान है। इस कारण इस शहर की एक अपनी तासीर है। टाटा साहब पूजे जाते हैं तो कारण साफ है, लेकिन कहा जाय कि आज टाटा साहब का यह सपना बिखर रहा है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जीवंतता की जगह रोबोटिक प्रोडक्शन और मूल संस्कृति की जगह बनावटी हाट कल्चर की कागजी नाव चलने लगी है।
कंपनी के क्वार्टर केवल रहने की जगह नहीं , बल्कि सामाजिक जीवन के केंद्र थे
कंपनी के क्वार्टर केवल रहने की जगह नहीं थे, बल्कि सामाजिक जीवन के केंद्र थे। पड़ोसी केवल पड़ोसी नहीं, परिवार का हिस्सा होते थे। बच्चों के लिए खेल के मैदान हमेशा गुलजार रहते थे। गर्मियों की रातों में लोग क्वार्टरों के बाहर खाट डालकर बेफिक्र होकर सो जाया करते थे। न अपराध का भय था, न असुरक्षा की भावना।
लेकिन समय के साथ तस्वीर तेजी से बदली। उद्योगों का विस्तार हुआ, उत्पादन बढ़ा, तकनीक बदली और उसके साथ शहर का सामाजिक ढांचा भी बदलता चला गया।” वी मेक स्टील और वी आल्सो मेक स्टील” का अंतर दिखने लगा।जिन इलाकों में कभी जीवन की चहल-पहल रहती थी, वहां आज सन्नाटा पसरा है। हजारों कंपनी क्वार्टर तोड़े जा चुके हैं और जो बचे हैं, उनमें भी बड़ी संख्या खाली पड़ी है। उनका भविष्य क्या होगा, यह कह पाना मुश्किल है।
साकची, जिसे शहर का हृदयस्थल कहा जाता है, उसका बड़ा हिस्सा अब पुराने स्वरूप में नहीं बचा। कई स्थानों पर कंपनियां स्थापित हो चुकी हैं तो कहीं विशाल पार्किंग स्थल बन गए हैं। साकची बाजार इन क्वार्टरों पर बहुत हदतक निर्भर करता था। शहर में क्वार्टर तोड़े जाने की शुरुआत इसी साकची के सुपरवाइजर फ्लैट से हुई थी। बाद में शहर के अलग अलग हिस्सों के क्वार्टर तोड़े जाने लगे। बर्मामाइंस. टेल्कों, बारीडीह, टिनप्लेट कदानी रोड सहित कई इलाके, जो कभी आबाद और जीवंत हुआ करते थे, आज वीरानी का अहसास कराते हैं। यहां बड़ी संख्या में क्वार्टर टूट चुके हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि खाली पड़े क्वार्टर अब असामाजिक तत्वों, शराबियों, जुआडिय़ों और नशेडिय़ों के अड्डे बनते जा रहे हैं। शहर में बढ़ते अपराध के पीछे इसे भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। एक समय जिस जमशेदपुर में रात देर तक भी लोग निश्चिंत होकर निकलते थे, आज वहां भय का माहौल है। यह आशंका बनी रहती है कि कब, कहां और किस अपराधी के हाथों कोई वारदात हो जाए। अभी चापड़ की घटनाओं ने ऐसा भयावह रुप ले लिया है कि सोशल मीडिया में जमशेदपुर को चापड़पुर कहा जाने लगा है।
शहर की सामाजिक आत्मा भी कमजोर हुई
सिर्फ शहर की भौतिक तस्वीर ही नहीं बदली, बल्कि उसकी सामाजिक आत्मा भी कमजोर हुई है। बच्चे उच्च शिक्षा के लिये शहर से दूर जा रहे हैं और फिर वहीं के होकर रह जाते हैं। एक दौर था जब शहर के हर अभिभावक की अभिलाषा यही होती थी कि उसकी संतान यहीं कंपनी में नौकरी करे। ऐसा उनके सपने पूरे भी हुआ करते थे। समय के साथ साथ ये सारी बातें अब काफूर हो चुकी हैं। रोजगार के बेहतर अवसरों की तलाश में बड़ी संख्या में युवा दूसरे शहरों का रुख कर चुके हैं और यह सिलसिला लगातार जारी है। नई पीढ़ी का जमशेदपुर से भावनात्मक जुड़ाव पहले जैसा नहीं रह गया है। उन्हें लगता है कि शहर में अब उनके लिए अवसर और आकर्षण सीमित हैं। शहर को बूढों का शहर बनते देर नहीं लगेगी अगर इस स्थिति पर हम नहीं चेते। इसके लिये कंपनी से लेकर राजनीतिक स्तर पर भी पहल की जरुरत है। शहर में युवाओं को कैसे आकर्षित किया जाए, इसे देखा जाना चाहिए। वरना इस पीढी को पता ही नहीं चलेगा कि यह शहर क्यों इतना गौरवशाली क्यों कहा जाता रहा है?
एक समय नटराज, वसंत, स्टार जैसे सिनेमा घर शहर की सांस्कृतिक पहचान थे। परिवार और दोस्तों के साथ वहां जाना अपने आप में एक उत्सव होता था। आज मल्टीप्लेक्स जरूर आ गए हैं, लेकिन वे उस आत्मीय माहौल और सामाजिक जुड़ाव की भरपाई नहीं कर पाए हैं। शहर में ऐसे सार्वजनिक स्थान भी कम होते गए हैं, जहां युवा अपना समय सार्थक ढंग से बिता सकें।
कभी जमशेदपुर की बड़ी आबादी सीधे-सीधे उद्योगों और विशेषकर कंपनी संस्कृति पर निर्भर थी। उसी संस्कृति ने शहर में अनुशासन, सामाजिक जुड़ाव और स्थायित्व को जन्म दिया था। आज कंपनियों में पेशेवर कर्मचारियों की नई पीढ़ी आ रही है, जिनका इस शहर से भावनात्मक रिश्ता बिलकुल नहीं है। पहले जहां पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग यहीं बसने का सपना देखते थे,क्योकि बाप के बाद बेटे को नौकरी मिलती थी। घर परिवार अपने भविष्य को लेकर सुरक्षित महसूस करता था, वहीं अब नई पीढ़ी का भविष्य दिल्ली, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद या विदेशों में अपना भविष्य तलाश रही है। सरकार को और कंपनी के लोगों को इसपर मिलबैठकर विचार करना चाहिए कि यहां की संस्कृति कैसे सुरक्षित रहे।
इस बदलाव का सबसे भावुक पक्ष
इस बदलाव का सबसे भावुक पक्ष वे माता-पिता हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए बाहर भेजा। बच्चे अपने करियर में आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन माता-पिता की निगाहें आज भी उनके लौटने की राह देखती रहती हैं। धीरे-धीरे जमशेदपुर उनकी अगली पीढ़ी की प्राथमिकताओं की सूची में पीछे खिसकता जा रहा है।
समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है और उसे रोका भी नहीं जा सकता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों, उद्योगों और सडक़ों से नहीं होती, बल्कि वहां बसने वाले लोगों, उनके रिश्तों और सामाजिक जीवंतता से होती है। जमशेदपुर आज भी देश के सबसे बेहतर नियोजित शहरों में गिना जाता है, लेकिन यदि उसकी पुरानी आत्मीयता, सामाजिक संस्कृति और युवा पीढ़ी का जुड़ाव लगातार कम होता गया, तो यह केवल एक औद्योगिक शहर बनकर रह जाएगा ।
इन सब हालात का कारोबार पर भी बुरा असर पड़ रहा है।कंपनी क्वार्टर टूटने से पास के बाजारों पर इसका प्रतिकूल असर हो रहा है। उनके सामने बड़ा संकट मुंह बाये अब खड़ा है और इसमें और बड़ी समस्या आन लाइन मार्केटिंग के कारण आ रही है।
शहर की सामुदायिक संस्कृति को फिर से मजबूत करने का प्रयास हो
अब जरूरत इस बात की है कि उद्योगों के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को भी नई ऊर्जा दी जाए। खाली होते इलाकों का बेहतर उपयोग हो, युवाओं के लिए रोजगार और मनोरंजन के नए अवसर विकसित किए जाएं, तथा शहर की सामुदायिक संस्कृति को फिर से मजबूत करने का प्रयास हो। तभी जमशेदपुर अपनी खोती हुई रौनक और पहचान को दोबारा हासिल कर सकेगा।(जारी)
