नई दिल्ली:
भीषण गर्मी, कम बारिश, भीषण सूखा, ये सभी लक्षण हैं मॉनसून के दुश्मन अल नीनो के दस्तक के. मॉनसून पर सुपर अल नीनों नाम के काल का खतरा है. मौसम विभाग इस साल सामान्य से कम बारिश की चेतावनी पहले ही दे चुका है. अल नीलो की वजह से प्रचंड आग बरसेगी. बारिश कम होगी तो फसलों के सूखने का खतरा बढ़ जाएगा. मतलब यह कि अल नीनो बड़ी तबाही मचा सकता है. देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह बहुत ही नुकसानदेह साबित हो सकता है. सरकार ने देश भर में ऐसे 197 जिलों की पहचान की है, जहां अल नीनो का असर सबसे ज्यादा पड़ सकता है. कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि उनके विभाग ने हर राज्य के लिए इमरजेंसी प्लान तैयार कर लिया है.
जुलाई से सितंबर के बीच दिखेगा अल नीनो का प्रभाव
मौसम विभाग ने 12 जून को आधिकारिक तौर पर प्रशांत महासागर के ऊपर अल नीनो के हालात पैदा होने की बात कही. जुलाई से सितंबर के बीच ये चरम पर होगा. ये वह समय तक जिसमें आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून भारत में साल भर की सबसे ज्यादा बारिश लेकर आता है. लेकिन अल नीनो के प्रभाव से बारिश में कमी देखने को मिलेगी.
भारत मौसम विज्ञान विभाग ने कहा,” मॉनसून मिशन कपल्ड फोरकास्ट सिस्टम (एमएमसीएफएस) के पूर्वानुमानों से संकेत मिलता है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान अल नीनो की स्थितियां और मजबूत होंगी.” इससे पहले अल नीनो की स्थितियां 2023 में विकसित हुई थीं. ये स्थितियां 2000 के बाद 2002, 2009 और 2015 में भी बनी थीं.

मॉनसूनी बारिश होगी कम, बढ़ेगी गर्मी
अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म होने की स्थिति है, जिसका असर दुनिया के मौसम और भारत के मॉनसून पर पड़ सकता है.अल नीनो से पृथ्वी पर तापमान बढ़ता है. वहीं इसका विपरीत चरण, जिसे ‘ला नीना‘ कहा जाता है, आमतौर पर तापमान में कमी आती है.
अल नीनो कैसे बढ़ाएगा खाने-पीने की चीजों के दाम
आईएमडी ने मौसमी बारिश के पूर्वानुमान को घटाकर दीर्घकालिक औसत का करीब 90% तक सीमित कर दिया है. इसके बाद देश सामान्य से कम मॉनसून मौसम का सामना कर रहा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमराने का खतरा बढ़ गया है. वहीं खाने-पीने की चीजें महंगी होने का भी खतरा बढ़ गया है. इसे ऐसे समझिए कि अल नीनो की वजह से बारिश कम होगी तो फसलें कैसे फलेंगी-फूलेंगी. सूखे की मार से फसल कम होगी तो महंगाई बढ़ जाएगी. इसका असर आम जनता की पॉकेट पर भी पड़ेगा.
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो एक जलवायु पैटर्न है. इसके प्रभाव से मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2 डिग्री या उससे ज्यादा बढ़ जाता है. इससे हवा का पैटर्न बदल जाता है. इसका विनाशकारी असर दुनियाभर के मौसम पर पड़ता है. अल नीनो के दौरान सामान्य दिनों में समुद्र के ऊपर चलने वाली व्यापारिक हवाएं कमजोर होकर अपनी दिशा बदल लेती हैं. जिसकी वजह से गर्म पानी को पश्चिमी प्रशांत महासागर के बजाय पूर्वी प्रशांत महासागर की ओर फैल जाता है. अल नीनों का प्रभाव 2 से 7 साल के अंतर पर देखा जाता है.1982-83, 1997-98 और 2015-16 में सुपर अल नीनो की घटनाएं दर्ज की गई थीं. वैज्ञानिकों ने 2026 में भी इसके आने की संभावना जताई है. इसकी वजह से मॉनसून कमजोर पड़ेगा और बारिश कम होगी. भीषण सूखा पड़ने की संभावना बढ़ जाती है. इससे कृषि उत्पादन प्रभावित होता है और महंगाई बढ़ सकती है.
मॉनसून की धीमी रफ्तार
4 जून को दक्षिण-पश्चिम मॉनसून केरल में धीमी रफ्तार यानी कि अपने निर्धारित समय से 3 दिन बाद पहुंचा. जून में भले ही उत्तरी और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में ठीकठाक प्री मॉनसून बारिश देखी गई. लेकिन मौसम विज्ञानिक इस शुरुआती स्थिरता को भ्रम बता रहे हैं. IMD के मॉनसून मिशन कपल्ड फॉरकास्ट सिस्टम के मुताबिक, मौसम के दूसरे हिस्से में वास्तविक कमी खास तौर पर अगस्त और सितंबर में तक आएगी जब अल नीनो की वजह से नमी में भारी कमी होगी.
देश में कैसा है अल नीनो का पिछला रिकॉर्ड?
अगर पिछला रिकॉर्ड उठाकर देखें तो साल 1950 के बाद से अल नीनो की 16 घटनाओं में से 9 में भारत में बारिश पर बुरा असर हुआ है. मुश्किल बात यह है कि ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ इस मौसमी परिस्थिति में भी ज्यादातर समय पूरी तरह न्यूट्रल रहने का अनुमान है. यह समुद्र की सतह के तापमान से जुड़ी एक ऐसी घटना है, जो कभी-कभी प्रशांत महासागर की गर्मी के असर को कम कर सकती है.
भौगोलिक तौर पर इसका असर हर एक जगह एक जैसा नहीं होता है. पूर्वोत्तर में नॉर्मल बारिश होने की उम्मीद है तो वहीं उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत खेती वाले वे इलाके, जो खास तौर पर बारिश पर निर्भर हैं, वहां कम बारिश का खतरा मंडरा रहा है.
अल नीनो का खेती पर क्या असर?
भारत में ज्यादातर खेती गर्मियों में होने वाली बारिश पर ही निर्भर रहती है. अब अल नीनो के तीव्र होने की खबर से खरीफ की फसल पर खतरा मंडरा रहा है. सबसे ज्यादा असर पड़ेगा चावल, दालों, तिलहन और मोटे अनाज के उत्पादन पर. क्यों कि पुराना डेटा अगर देखा जाए तो ये पता चलता है कि अल नीनो से देश में चावल के उत्पादन औसतन 3.4 मिलियन टन तक कम हो जाता है. दालों, सोयाबीन और मूंगफली की फसलों को अगर नमी नहीं मिली तो ये फसलें समय से पहले ही खराब हो सकती हैं. मक्का, बाजरा जैसी फसलें भी बारिश पर निर्भर होती हैं.

आर्थिक और बुनियादी ढांचे पर दवाब कैसे?
कमजोर मॉनसून से फसल की पैदावार पर तो असर होता ही है. साथ ही बड़े-बड़े जलाशयों का जलस्तर भी कम हो जाता है. पानी का स्टॉक कम होने से पनबिजली उत्पादन में भी भारी गिरावट आएगी. वो भी ऐसे समय में जब ग्रामीण इलाकों में ट्यूबवेल और सिंचाई पंप चलाने के लिए बिजली की मांग बढ़ेगी.
ICRA जैसे वित्तीय संस्थानों ने आगाह करते हुए कहा है कि खेती-फसल ठीक से नहीं होने से कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में खाने-पीने की चीजों के दाम 0.4% और बढ़ सकते हैं. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने महंगाई बढ़ने के जोखिम को लेकर पहले ही आगाह कर दिया है.
