आदित्यपुर का चर्चित सफेदपोश स्क्रैप माफिया सिर्फ कारोबार तक ही सीमित नहीं रहा उसने झारखंड में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा तक का कद छोटा करने की कोशिश की ।यह कहानी है सत्ता, संगठन, धनबल और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के गठजोड़ की।
आश्चर्य है राशन दुकान से स्क्रैप और उसके बाद फाउंड्री किंग के रूप में यह सफेदपोश माफिया संघ चालक भी है, भले उसके पास इस पद के लिए आवश्यक प्रशिक्षण वाली योग्यता भी नहीं है। वक़्त ज्यादा नहीं गुजरा जो लोग भूल सकें जब आदित्यपुर में नगर निगम के मेयर का चुनाव हुआ जिसमें इस सफेदपोश ने संघ चालक होते हुए भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी के विरोध में काम किया और इसके इशारे पर इसके साथ रहने वाले वैसे लोग खुलकर विरोधी प्रत्याशी के लिए मैदान जीतने उतरे मानो वे आदित्यपुर रूपी अयोध्या उनकी ही हो और वे सचमुच राजा दशरथ हों , जबकि वे एक कुशल तबलची भी नहीं बन सके। यह चुनाव दलगत नहीं हुआ था, लेकिन सभी पार्टियों ने अपने उम्मीदवार घोषित किए थे। झामुमो ,भाजपा, कांग्रेस आदि दलों ने अपने उम्मीदवार घोषित किए। अनेक जगहों पर उम्मीदवार अपने दल से विद्रोह करके मैदान में उतरे। आदित्यपुर में भाजपा ने संजय सरदार को अपना उम्मीदवार घोषित किया। वह पूर्व मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडा के नजदीक हैं। तब भाजपा के दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री चम्पई सोरेन के कथित इशारे पर संजय सरदार की प्रतिद्वंदिता में सावित्री लियांगी उम्मीदवार बनायी गयी। लेकिन सफेदपोश माफिया और उसकी टीम ने चम्पई सोरेन समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में खुलकर काम किया। ऐसा करने का दुस्साहस अर्थात भाजपा और खासकर पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का कद छोटा करने की हिम्मत इस सफेदपोश ने दिखाई, जबकि भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेता और राज्य सभा सांसद प्रदीप वर्मा प्रभारी की हैसियत से चुनाव मैदान में थे। इस माफिया के रवैए को उन्होंने नजदीक से देखकर इसरो की टीम को औद्योगिक क्षेत्र में जन संपर्क में लगाया। सफेदपोश कब्जा वाले एसिया के साथ सांसद वर्मा ने कोई बैठक नहीं की।संजय सरदार की अंततः जीत हुई। लेकिन एक संघ चालक का भाजपा विरोधी और शीर्ष नेतृत्व विरोधी चेहरा खुलकर सामने आ गया। उल्लेखनीय है इसी तरह लघु उद्योग भारती में भी एक ऐसे पदाधिकारी को इस सफेदपोश ने महिमा मंडित कर रखा है जो झामुमो मानसिकता का है और चुनाव में झामुमो का समर्थन करता है। इस प्रकार संघ और संघ पोषित इकाइयों के स्वयंसेवकों और सदस्यों का भी मनोबल यह सफेदपोश तोड़ते रहता है और इन सदस्यों और स्वयं सेवकों द्वारा अपने भाव व्यक्त करने पर ऊपर के कतिपय पदाधिकारी इस सफेदपोश के प्रति यह कहते हुए श्रद्धावान रहते हैं कि पैसे वालों से आपको क्या दिक्कत? अर्थात पैसों के बल पर संगठन शक्ति से ऊपर का दर्जा मिल जाने के कारण इन संगठनों में यह सफेदपोश दैत्य का रूप लेता जा रहा। **जारी…**
