जमशेदपुर, 12 सितंबर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सांस्कृतिक उत्थान, शिक्षा, अनुशासन, खेल और शुद्ध आचरण के माध्यम से समाज में जमीनी स्तर पर कार्य करने वाला संगठन माना जाता है। स्वयंसेवक राष्ट्रीयता और भारत माता के प्रति अपने योगदान को गौरव का विषय मानते हैं। लेकिन सवाल यह है कि आज जमशेदपुर समेत पूरे कोल्हान में कुछ स्वयंसेवकों के बीच कथित असंतोष और घुटन की चर्चा क्यों बढ़ रही है?
अनुशासन और संगठनात्मक संस्कारों के कारण बहुत से लोग सार्वजनिक रूप से बोलने से बचते हैं। दूसरी ओर, संगठन के कुछ जिम्मेदार लोगों के रवैये को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि कहीं “ऑल इज वेल इन स्वीटजरलैंड” वाली मानसिकता तो नहीं बन गई है—अर्थात वास्तविक स्थिति चाहे जैसी हो, सब कुछ ठीक होने का संदेश दिया जाता रहे।
*लघु उद्योग भारती और विद्या विकास समिति की भूमिका पर सवाल*
मामला लघु उद्योग भारती का हो या विद्या विकास समिति का, दोनों संघ परिवार से जुड़े महत्वपूर्ण संगठन माने जाते हैं। आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में लघु उद्योग भारती की सक्रियता और भूमिका को लेकर पहले से सवाल उठते रहे कि कैसे सफेदपोश माफिया ने इसे जेबी संगठन बनाया और इसके बाद संगठन ने उद्यमियों के हितों से जुड़े कई मुद्दों पर अपेक्षित मुखरता नहीं दिखाई, अलबत्ता इससे जुड़े लोग अलग होकर ” इसरो ” नामक संगठन बना कर आगे बढ़े। इसी क्रम में महिला उद्यमी के प्लॉट का मामला भी देखा जाता है जिसको आवंटित औद्योगिक प्लॉट पर कब्जा नहीं मिलने का मामला लंबे समय से चर्चा में है। इस महिला प्रकरण में लघु उद्योग भारती के बड़े सफेदपोश पदाधिकारी का ही वह महिला नाम ले रही कि वह कब्जा में अड़ंगा डालते और डराते हैं।
*विद्या विकास समिति के विद्यालयों में प्रबंधन का सवाल*
इसी तरह विद्या विकास समिति से जुड़े मुसाबनी, घाटशिला और सरायकेला के विद्यालयों में प्रबंधन समितियों में बदलाव को लेकर चर्चा है। मुसाबनी स्थित बलदेव दास संत लाल चैरिटी ट्रस्ट द्वारा संचालित सरस्वती विद्या मंदिर में प्रबंध कार्यकारिणी में लंबे समय से बदलाव नहीं होने का मुद्दा उठाया गया है।
*“ट्रस्ट संचालित है, इसलिए बदलाव नहीं”*
विद्या विकास समिति के प्रदेश सचिव नकुल कुमार शर्मा से इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि विद्यालय ट्रस्ट द्वारा संचालित है, इसलिए प्रबंधन में परिवर्तन नहीं किया जा रहा है। साथ ही उनका कहना था कि विद्यालय विद्या विकास समिति के अधीन भी है और यहां समिति तथा ट्रस्ट दोनों के संविधान लागू होते हैं।
दो संविधानों से प्रबंधन कैसे?
यही बयान अब सवालों के घेरे में है। यदि किसी विद्यालय का संचालन एक साथ दो संविधानों के तहत होता है तो उसकी प्रशासनिक और प्रबंधकीय व्यवस्था की स्पष्ट सीमा क्या होगी? विद्यालय में प्रदर्शित वर्तमान प्रबंध कार्यकारिणी की सूची से यह भी स्पष्ट किया जा सकता है कि उसमें एक ही परिवार के कितने सदस्य पदाधिकारी अथवा सदस्य हैं।
चर्चा है कि हाल में विद्या विकास समिति की ओर से स्थानीय प्रबंधन समिति में बदलाव का प्रयास किया गया था। आरोप है कि वही लघु उद्योग भारती वाले संघ चालक ने इसमें हस्तक्षेप किया और प्रस्तावित बदलाव नहीं हो सका।
*बागबेड़ा प्रकरण से उठता बड़ा सवाल*
मुसाबनी प्रकरण के साथ बागबेड़ा के पुराने विवाद को भी जोड़ा जा रहा है। वहां प्रबंधन में हस्तक्षेप को लेकर विवाद और कार्रवाई की चर्चा होती है। सवाल यह है कि यदि अलग-अलग संस्थानों में प्रबंधन व्यवस्था के अलग-अलग मानदंड हैं तो उनकी स्पष्ट व्याख्या सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? फिर बागबेड़ा स्कूल की प्रबंध व्यवस्था हाथ में करने के लिए तत्कालीन सचिव संजीव कुमार को क्यों हटाया गया। मामला पुलिस- मुकदमा तक पहुंचा। क्यों?
*स्वयंसेवकों की निराशा की वजह?*
इन घटनाओं के आधार पर अब संगठन से जुड़े कुछ लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रभावशाली व्यक्तियों के कारण संघ परिवार से जुड़ी संस्थाओं की मूल कार्यसंस्कृति प्रभावित हो रही है? कुछ लोगों द्वारा कथित रूप से निजी प्रभाव और “प्राइज पोस्टिंग” जैसी व्यवस्था बनाए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
मुद्दा किसी संगठन को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि संगठन के घोषित आदर्शों और जमीन पर दिखाई देने वाली व्यवस्था के बीच संभावित अंतर पर पारदर्शी जवाब मांगना है और यह भी जानना है कि संगठन में ऊंचे पद पर पहुंचने के लिए धन पशु होना ही एकमात्र योग्यता होती है क्या?…
जारी
