नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (SC/ST) एक्ट की कई धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. जमानत और गिरफ्तारी को लेकर सख्त धारा 18-A हटाने की मांग की गई है. एक्ट को संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है. आज सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्यकांत मिश्रा की बेंच इस पर सुनवाई करेगी.अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की कई धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है.
विष्णु शंकर जैन की याचिका में क्या मांग
वकील विष्णु शंकर जैन के माध्यम से बृजभूषण सैनी और 18 अन्य याचिकाकर्ताओं ने दायर याचिका में अधिनियम की धारा 3(1), 3(2)(i), 3(2)(v), 4, 8, 18, 18-A और 19 को चुनौती दी है. याचिका में दावा किया गया है कि इन प्रावधानों में से कुछ संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 में दिए गए समानता, जीने एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा कानूनी प्रक्रिया के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं. याचिकाकर्ताओं ने पुलिस को एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने और गिरफ्तारी की प्रक्रिया के संबंध में दिशानिर्देश जारी करने की भी मांग की है.
धारा 18-A को लेकर मुख्य चुनौती
याचिका में विशेष रूप से धारा 18-A को चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रावधान के तहत एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है. गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति भी जरूरी नहीं है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और पुलिस को आरोपों की प्रारंभिक जांच के बिना कार्रवाई करनी पड़ सकती है. याचिकाकर्ताओं ने 2018 के संशोधन के जरिए धारा 18-A जोड़े जाने को सुप्रीम कोर्ट के 2018 के सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले के संदर्भ में चुनौती दी है.उनका कहना है कि संसद ने न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों को प्रभावहीन करने के लिए यह प्रावधान बनाया.
अग्रिम जमानत और गिरफ्तारी पर भी सवाल
याचिका में धारा 18 को भी चुनौती दी गई है कि याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह प्रावधान एससी/एसटी एक्ट के मामलों में अग्रिम जमानत के रास्ते को प्रतिबंधित करता है और इससे झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों के मामले में व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है. धारा 8 में कुछ परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ अनुमान से जुड़े प्रावधानों को निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के विरुद्ध बताया गया है.
याचिका में कई सवाल
धारा 19 के तहत अधिनियम के तहत दोषसिद्ध मामलों में परिवीक्षा संबंधी राहत उपलब्ध नहीं होने को भी चुनौती दी गई है. याचिका में धारा 3(2)(v) के तहत अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति के खिलाफ किए गए अपराध में सजा बढ़ाए जाने और धारा 3(2)(i) से जुड़े मौत की सजा के प्रावधान को भी संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित आनुपातिकता के सिद्धांत के संदर्भ में चुनौती दी गई है.याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि कानून के कुछ प्रावधानों के दुरुपयोग से निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी और लंबे समय तक मुकदमे की स्थिति पैदा हो सकती है.
अंतरिम राहत की भी मांग
याचिका के साथ दाखिल अंतरिम राहत आवेदन में धारा 8, 18, 18-A और 19 के संचालन पर रोक लगाने की मांग की गई है. आवेदन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जीने और गरिमा की सुरक्षा का हवाला दिया गया है इस याचिका में केंद्र सरकार, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को पक्षकार बनाया गया है.
