राजनीति में गिरती भाषा की मर्यादा

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है। राजनीतिक दलों के बीच मतभेद होते हैं, एक-दूसरे की नीतियों की आलोचना की जाती है और कई बार निजी टिप्पणियां भी होती हैं। लोकतंत्र में यह सब स्वाभाविक है, लेकिन हाल के दिनों में राजनीतिक बयानबाजी जिस तरह गाली-गलौज और अपमानजनक टिप्पणियों तक पहुंच रही है, वह चिंता का विषय है। शब्दों के चयन में जिस सावधानी और मर्यादा की अपेक्षा की जाती है, उसका पालन छोटे स्तर के नेताओं की कौन कहे, कई बार पार्टियों के शीर्ष नेता भी करते नहीं दिखते। जब नेतृत्व ही अपनी भाषा पर संयम नहीं रखेगा, तो निचले स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मर्यादा की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? यह स्थिति राजनीति में गिरते स्तर और संवाद की संस्कृति के कमजोर पड़ने की ओर संकेत करती है।
इस मामले में किसी एक राजनीतिक दल को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा। कमोबेश सभी दलों में ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाते हैं, जहां विरोधियों पर हमला करने के लिए भाषा की सीमाएं लांघ दी जाती हैं। स्थिति ऐसी हो गई है कि मानो कोई भी दल दूध का धुला नहीं है। एक दल का नेता आपत्तिजनक टिप्पणी करता है तो दूसरे दल के नेता को जवाब देने के नाम पर उससे भी आगे निकल जाने की होड़ लग जाती है। नतीजा यह होता है कि नीतियों, विचारों और जनहित के सवालों पर होने वाली बहस व्यक्तिगत कटाक्ष और अभद्रता में उलझकर रह जाती है।
एक दौर ऐसा भी था, जब संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक बहस के दौरान तीखे व्यंग्य और विनोद का ऐसा दौर चलता था कि पूरा सदन ठहाकों से गूंज उठता था। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अपनी जगह थी, लेकिन शब्दों की गरिमा और विरोधी के प्रति सम्मान का भाव भी बना रहता था। नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद होते थे, वे एक-दूसरे की नीतियों पर कठोर प्रहार भी करते थे, मगर व्यक्तिगत अपमान और चरित्र हनन से बचने का प्रयास किया जाता था। व्यंग्य का उद्देश्य विरोधी को निरुत्तर करना होता था, उसे अपमानित करना नहीं। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस की पहचान थी।
आज हालात बदलते दिख रहे हैं। विडंबना यह है कि आपत्तिजनक बयान सामने आने के बाद उस पर आत्ममंथन करने या गलती स्वीकार करने के बजाय उसे जायज ठहराने की कोशिश शुरू हो जाती है। बचाव में पुराने बयानों का हवाला दिया जाता है। कहा जाता है कि जब दूसरे पक्ष के नेता ने पहले ऐसी टिप्पणी की थी, तब सवाल क्यों नहीं उठाया गया? इस तर्क के सहारे मौजूदा अभद्रता को उचित साबित करने का प्रयास होता है। मानो अतीत में किसी ने मर्यादा तोड़ी थी, इसलिए वर्तमान में भी मर्यादा तोड़ने का अधिकार मिल गया हो। यह तर्क न केवल गलत परंपरा को बढ़ावा देता है, बल्कि राजनीतिक संवाद को और अधिक विषाक्त बनाता है।
किसी की गलती दूसरे की गलती का औचित्य नहीं बन सकती। यदि एक नेता ने अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है, तो दूसरे नेता के पास भी वैसा ही करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी केवल अपने विरोधियों की गलतियां गिनाने तक सीमित नहीं है। उन्हें अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के आचरण के प्रति भी जवाबदेह होना चाहिए। विरोधी दल के नेता की अभद्र टिप्पणी पर सवाल उठाने वाला दल अपने नेताओं की ऐसी ही टिप्पणी पर मौन साध ले, तो उसकी नैतिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
राजनीति का उद्देश्य समाज को दिशा देना और जनहित के सवालों का समाधान खोजना है। नेता केवल अपने दल के समर्थकों के सामने ही नहीं बोलते, बल्कि उनके शब्दों का प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। जब शीर्ष नेतृत्व सार्वजनिक मंचों से अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करता है, तो उसका असर कार्यकर्ताओं की राजनीतिक संस्कृति पर भी पड़ता है। फिर राजनीतिक विरोध व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलने लगता है। सोशल मीडिया के दौर में ऐसे बयान तेजी से फैलते हैं और समर्थकों के बीच कटुता को और बढ़ाते हैं। इससे उन लोगों को भी निराशा होती है, जो राजनीति को जनसेवा और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना का माध्यम मानते हैं।
जनीति में तीखी आलोचना होनी चाहिए, सवाल पूछे जाने चाहिए और सरकारों तथा विपक्ष को उनके कामकाज के आधार पर कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। लेकिन आलोचना और अपमान के बीच की रेखा को मिटा देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। किसी की नीतियों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, मगर व्यक्तिगत गाली-गलौज को राजनीतिक साहस या लोकप्रियता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। राजनीतिक विमर्श का स्तर इस बात से तय होना चाहिए कि नेता जनता के सवालों का कितना प्रभावी जवाब देते हैं, न कि इस बात से कि वे अपने विरोधी के लिए कितने अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि भाषा की मर्यादा बनाए रखना कमजोरी नहीं, बल्कि जिम्मेदार नेतृत्व की पहचान है। यदि कोई नेता सीमा लांघता है, तो उसके अपने दल को भी उसका बचाव करने के बजाय उचित कार्रवाई और आत्ममंथन का रास्ता अपनाना चाहिए। केवल विरोधी की टिप्पणी पर आक्रोश जताने से काम नहीं चलेगा। मर्यादा का सिद्धांत सबके लिए समान होना चाहिए।
लोकतंत्र में मतभेद रहेंगे, राजनीतिक संघर्ष भी होगा और आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चलता रहेगा। लेकिन इन सबके बीच संवाद की शालीनता बची रहनी चाहिए। राजनीति में जीत-हार का फैसला जनता करती है, मगर नेताओं के आचरण का मूल्यांकन भी वही करती है। इसलिए राजनीतिक दलों को यह तय करना होगा कि वे जनता के सामने विचारों और नीतियों की प्रतिस्पर्धा प्रस्तुत करना चाहते हैं या अपमानजनक भाषा की। आखिरकार, राजनीति में विरोधी को हराने की कोशिश होनी चाहिए, उसकी गरिमा को कुचलने की नहीं। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता है और यही स्वस्थ राजनीतिक संस्कृति की बुनियाद भी।

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