जमशेदपुर/धालभूमगढ़। धालभूमगढ़ के नरसिंहगढ़ स्थित ऐतिहासिक त्रिवेणेश्वर मंदिर परिसर में आयोजित दो दिवसीय ‘त्रिवेणेश्वर म्यूजिक एंड डांस फेस्टिवल 2026’ का रविवार को भव्य समापन हुआ। नृत्य गंधर्व ओडिसी केंद्र, नरसिंहगढ़ की ओर से आयोजित इस महोत्सव में देश के विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों ने ओडिसी, कथक, भरतनाट्यम, मोहिनीयाट्टम, सत्रिया एवं सरायकेला छऊ नृत्य की मनमोहक प्रस्तुतियों से भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत की विविधता को मंच पर जीवंत किया।
समापन समारोह में घाटशिला के विधायक सोमेश चंद्र सोरेन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर क्षेत्र के अनेक गणमान्य व्यक्ति, कला प्रेमी एवं संस्कृति जगत से जुड़े लोग मौजूद थे।
महोत्सव के आयोजन में दिलीप कुमार महांकुड़ा की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जबकि गुरु ओमिनिश दास के निर्देशन में पूरे कार्यक्रम का संचालन हुआ। दूसरे दिन देश के प्रतिष्ठित गुरुओं एवं कलाकारों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत गुरु प्रणति मोहंती की ओडिसी प्रस्तुति से हुई। उन्होंने मंगलाचरण एवं ‘लागी गोपो दंड’ प्रस्तुत कर दर्शकों की सराहना प्राप्त की। वे गुरु केलुचरण महापात्र की वरिष्ठ शिष्या हैं। वहीं, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान पुरस्कार से सम्मानित गुरु अरूपा गायत्री पांडा ने ‘मेघ पल्लवी’ एवं ‘बाजुची साहे बाजा रे’ की प्रभावशाली प्रस्तुति दी।
कोलकाता की कलामंडलम स्वर्णदीपा एवं केरल के कलामंडलम के विद्यार्थियों ने मोहिनीयाट्टम की मनोहारी प्रस्तुतियों से दर्शकों को आकर्षित किया। असम के गुवाहाटी से आईं तन्मना चौधरी ने सत्रिया नृत्य के माध्यम से असम की वैष्णव सांस्कृतिक परंपरा और आध्यात्मिक विरासत का परिचय कराया।
महोत्सव का विशेष आकर्षण गुरु ओमिनिश दास की मौलिक ओडिसी नृत्य रचना ‘महानंदा’ रही। इस प्रस्तुति में राधा और श्रीकृष्ण के प्रेम, भक्ति तथा आध्यात्मिक मिलन की अनुभूति को नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया। इसकी पटकथा दिलीप महांकुड़ा ने लिखी। प्रस्तुति में पखावज पर गुरु धनेश्वर स्वाईं, संगीत संयोजन में निमाकांत राउत्राय, निर्देशन में गुरु अरूपा गायत्री पांडा तथा कोरियोग्राफी में गुरु ओमिनिश
दास का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
कोलकाता के रोक्तिम गुहा ने भरतनाट्यम शैली में ‘वंदे शंभु उमापतिम’ एवं ‘प्रदोष समयादि’ प्रस्तुत किया। वहीं, नई दिल्ली की आकांक्षा मिश्रा ने कथक की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। वे विदुषी शाश्वती सेन एवं विदुषी ममता महाराज की शिष्या हैं। उनकी प्रस्तुति में कथक की लयकारी, पद संचालन और भावाभिनय का सुंदर समन्वय देखने को मिला।
कार्यक्रम के अंतिम चरण में त्रिनेत्र सेंटर ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स, दिल्ली एवं सरायकेला के कलाकारों ने सरायकेला छऊ नृत्य प्रस्तुत किया। स्वर्गीय पद्मश्री गोपाल दुबे की नृत्य परंपरा से जुड़े कलाकारों ने झारखंड की विशिष्ट मुखौटा नृत्य शैली की कलात्मक विशेषताओं और पारंपरिक स्वरूप को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
छह नृत्य शैलियों के संगम ने बढ़ाई महोत्सव की गरिमा
दो दिनों तक चले इस महोत्सव में ओडिसी, कथक, भरतनाट्यम, मोहिनीयाट्टम, सत्रिया और सरायकेला छऊ की प्रस्तुतियों ने भारतीय शास्त्रीय एवं पारंपरिक नृत्य की समृद्ध विविधता को एक मंच पर प्रस्तुत किया।
विभिन्न राज्यों के कलाकारों की सहभागिता ने इस आयोजन को राष्ट्रीय सांस्कृतिक स्वरूप प्रदान किया।
आयोजकों के अनुसार, महोत्सव का मूल उद्देश्य भारतीय शास्त्रीय नृत्य एवं संगीत की परंपराओं का संरक्षण, गुरु-शिष्य परंपरा को प्रोत्साहन तथा देश के विभिन्न हिस्सों के कलाकारों को साझा मंच उपलब्ध कराना है।
ऐतिहासिक त्रिवेणेश्वर मंदिर परिसर में इस आयोजन के माध्यम से नरसिंहगढ़ एवं धालभूमगढ़ क्षेत्र को राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्र पर स्थापित करने की दिशा में एक सार्थक पहल की गई है।
कला, संस्कृति, संगीत और भक्ति के वातावरण में संपन्न हुए इस दो दिवसीय महोत्सव ने दर्शकों के बीच भारतीय नृत्य परंपराओं की अमिट छाप छोड़ी।
