प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के 12 वर्ष पूरे होने और निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे लंबे समय तक लगातार इस जिम्मेदारी का निर्वहन करने के दावे के साथ ही देश में एक नई बहस शुरू हो गई है। यह बहस उपलब्धियों के मूल्यांकन से अधिक जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी की तुलना पर केंद्रित होती जा रही है। एक पक्ष मोदी की इस उपलब्धि को ऐतिहासिक बताने में जुटा है, तो दूसरा पक्ष नेहरू के योगदान को सामने रखकर उन्हें अधिक बड़ा नेता साबित करने की कोशिश कर रहा है।
इस बहस में आजादी के आंदोलन में नेहरू की भूमिका, उनके लंबे कारावास और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान की चर्चा हो रही है। दूसरी ओर मोदी समर्थक उनके नेतृत्व में भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा, बुनियादी ढांचे के विस्तार और राजनीतिक स्थिरता को प्रमुख उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि स्वस्थ विमर्श के बजाय सोशल मीडिया पर यह बहस व्यक्तिगत हमलों और चरित्र हनन तक पहुंच गई है।
कहा जाता है कि किसी को बड़ा साबित करने के लिए बड़ी लकीर खींचनी चाहिए, दूसरी लकीर मिटाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लेकिन आज दोनों पक्ष अपने-अपने नेताओं को महान साबित करने के लिए दूसरे की छवि धूमिल करने में लगे हैं। पुराने फोटो, अधूरी जानकारियां और संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किए गए तथ्यों के जरिए नेताओं के व्यक्तित्व और चरित्र पर सवाल उठाए जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संवाद के लिए शुभ संकेत नहीं है।
वास्तव में नेहरू और मोदी दो अलग-अलग युगों के नेता हैं। नेहरू ने उस भारत का नेतृत्व किया जो अभी-अभी औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुआ था। देश के सामने विभाजन का दर्द, आर्थिक बदहाली, संस्थाओं के निर्माण और राष्ट्रीय एकता जैसी गंभीर चुनौतियां थीं। वहीं नरेंद्र मोदी ऐसे भारत का नेतृत्व कर रहे हैं जिसकी अर्थव्यवस्था कहीं अधिक मजबूत है, वैश्विक अपेक्षाएं ऊंची हैं और जनता की आकांक्षाएं पहले से कहीं अधिक व्यापक हैं। इसलिए दोनों की चुनौतियां और परिस्थितियां अलग-अलग थीं।
किसी भी नेता की आलोचना और मूल्यांकन लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। नेहरू के निर्णयों पर सवाल उठाए जा सकते हैं और मोदी सरकार की नीतियों की भी समीक्षा हो सकती है। लेकिन तुलना तभी सार्थक होगी जब उस समय की परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों और चुनौतियों को भी ध्यान में रखा जाए। केवल समर्थकों और विरोधियों की भावनाओं के आधार पर इतिहास और वर्तमान का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन इसके साथ ही उसने आधी-अधूरी सूचनाओं, दुष्प्रचार और कटुता को भी बढ़ावा दिया है। आमने-सामने बैठकर होने वाली बहस में तर्क और तथ्य का महत्व होता है, जबकि सोशल मीडिया की बहस अक्सर आरोप-प्रत्यारोप और ट्रोलिंग तक सीमित रह जाती है। पिछले कुछ दिनों से चल रही “नेहरू बनाम मोदी” की होड़ इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है।
देश के लिए अधिक महत्वपूर्ण यह है कि दोनों नेताओं के योगदान और कमियों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए। इतिहास को वर्तमान की राजनीति का हथियार बनाने और वर्तमान को इतिहास के खिलाफ खड़ा करने से न तो लोकतंत्र मजबूत होगा और न ही समाज में सौहार्द बढ़ेगा। लोकतंत्र का हित इसी में है कि हम व्यक्तियों की पूजा या निंदा के बजाय उनके कार्यों और नीतियों पर तथ्य आधारित चर्चा करें। तभी स्वस्थ राजनीतिक संस्कृति का निर्माण संभव होगा।
