कोलकाता नगर निगम के एक फैसले ने पश्चिम बंगाल में नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. नगर निगम ने शहर के पार्क सर्कस इलाके की प्रमुख सड़क सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड करने का फैसला लिया है. इस फैसले का स्वागत बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने किया है, जबकि कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों ने इसे इतिहास को गलत तरीके से पेश करने की कोशिश बताया है.
नगर निगम की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि अब तक सुहरावर्दी एवेन्यू के नाम से जानी जाने वाली सड़क को आगे से गोपाल मुखर्जी रोड के नाम से जाना जाएगा. पार्क सर्कस के व्यस्त सात-सूत्रीय चौराहे के पास स्थित यह सड़क कोलकाता की महत्वपूर्ण सड़कों में गिनी जाती है. बता दें कि सुहरावर्दी एवेन्यू को उसका नाम 1933 में तत्कालीन कलकत्ता नगर निगम ने दिया था.
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने सोशल मीडिया पर इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे ऐतिहासिक फैसला बताया. उन्होंने कहा कि यह कदम एक “ऐतिहासिक भूल” को सुधारने की दिशा में उठाया गया है और गोपाल मुखर्जी के योगदान को सम्मान देने वाला है.
बता दें कि हुसैन सुहरावर्दी को बंगाल में 1946 में हुए दंगों का जिम्मेदार माना जाता है। उस समय वह बंगाल के प्रीमियर थे। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि जिस शख्स ने सत्ता और हथियारों का इस्तेमाल बेगुनाह लोगों के नरसंहार के लिए किया, केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए उसके नाम पर सड़क बना दी गई। जिस शख्स ने लाखों मासूमों को बताया, न्याय के लिए अब उसके नाम पर सड़क का नाम होगा।
लेकिन इसी दावे को लेकर विवाद खड़ा हो गया है.
विपक्षी दलों का कहना है कि जिस सुहरावर्दी एवेन्यू को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, उसका नाम कभी भी अविभाजित बंगाल के अंतिम प्रीमियर और बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं था. उनका दावा है कि सड़क का नाम उनके चाचा हसन शहीद सुहरावर्दी के सम्मान में रखा गया था.
हसन शहीद सुहरावर्दी को एक प्रतिष्ठित बंगाली शिक्षाविद, चिकित्सक, राजनयिक और कला समीक्षक माना जाता है. ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम कुलपति भी रहे थे.
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि बीजेपी नेता हसन सुहरावर्दी और हुसैन शहीद सुहरावर्दी के बीच का फर्क नहीं समझ रहे हैं. उन्होंने कहा कि सड़क का नाम जिस व्यक्ति के सम्मान में रखा गया था, उसे लेकर ही भ्रम फैलाया जा रहा है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने भी कहा कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्पष्ट हैं और हसन सुहरावर्दी कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे थे. उन्होंने कहा कि बाद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनका स्थान लिया था.
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने भी फैसले पर सवाल उठाए. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम हसन सुहरावर्दी के नाम पर रखा गया था, जो कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे थे. उन्होंने पूछा कि आखिर इस फैसले के जरिए कौन से राजनीतिक अंक बटोरने की कोशिश की जा रही है.
वहीं, सीपीएम ने भी इस कदम का विरोध किया है. पार्टी का कहना है कि सड़क का नाम बदलने का आधार ऐतिहासिक रूप से गलत है. पार्टी के अनुसार तत्कालीन कलकत्ता कॉरपोरेशन ने 8 मार्च 1933 को इस सड़क का नाम हसन सुहरावर्दी के नाम पर रखने का प्रस्ताव पारित किया था और 20 अप्रैल 1933 को यह निर्णय आधिकारिक गजट में प्रकाशित भी हुआ था.
सीपीएम ने इस फैसले को इतिहास को विकृत करने की कोशिश बताते हुए इसे वापस लेने और सड़क के नामकरण से जुड़ी पूरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने की मांग की है.
एक सड़क के नाम को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब इतिहास, विरासत और राजनीति की बहस में बदल चुका है. एक पक्ष इसे ऐतिहासिक न्याय बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी और राजनीतिक प्रतीकवाद का मामला मान रहा है.
