भाजपा के कार्यक्रम में पानी, छांव और भोजन का टोटा न नेताओं की गरिमा का ख्याल, न कार्यकर्ताओं के सम्मान की चिंता

जमशेदपुर, 5 नवंबर । दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के जमशेदपुर महानगर के कार्यक्रम में बुधवार को कुप्रबंधन का ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसने पार्टी की संगठनात्मक तैयारियों और कार्यकर्ताओं के प्रति उसकी संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए। ‘लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ’ अभियान के तहत आयोजित पदयात्रा में केंद्रीय मंत्री से लेकर पूर्व मुख्यमंत्रियों, सांसदों और विधायकों तक की मौजूदगी रही, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के नाम पर कार्यकर्ताओं को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। न पीने के पानी की समुचित व्यवस्था थी, न धूप से बचने के लिए छांव और न ही भोजन का कोई इंतजाम।

भाजपा महानगर के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत साकची स्थित नेताजी सुभाष मैदान (आमबगान) में जनसभा से हुई। इसके बाद पदयात्रा बंगाल क्लब गोलचक्कर और बड़ा गोलचक्कर होते हुए जमशेदपुर अक्षेस कार्यालय के समीप पहुंचकर संपन्न हुई। कार्यक्रम में केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास एवं मधु कोड़ा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. दिनेशानंद गोस्वामी, सांसद विद्युत वरण महतो, धनबाद के विधायक राज सिन्हा, पूर्वी की विधायक पूर्णिमा साहू, पश्चिम के विधायक सरयू राय, प्रदेश मंत्री शैलेन्द्र सिंह, प्रदेश प्रवक्ता अभय सिंह, भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष शशांक राज, पूर्वी सिंहभूम जिला अध्यक्ष सत्या तिवारी, अमरप्रीत सिंह काले, विनोद सिंह, नंदजी प्रसाद, दिनेश कुमार, मनोज सिंह सहित कई वरिष्ठ नेता उपस्थित थे।
इतने बड़े नेताओं की मौजूदगी और कई दिनों की तैयारियों के दावों के बावजूद कार्यक्रम में अव्यवस्था का आलम यह था कि कड़ी धूप में कार्यकर्ताओं को घंटों बैठना पड़ा। न मंच पर कोई शेड था और न ही मंच के सामने धूप से बचाव की व्यवस्था। आखिरकार पटाखा दुकानदारों के शेड ही कार्यकर्ताओं के लिए राहत का सहारा बने। पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं होने से लोगों को काफी परेशानी उठानी पड़ी। भोजन की व्यवस्था भी नदारद रही। सवाल यह है कि जब इतने बड़े आयोजन की जिम्मेदारी पार्टी के पास थी तो कार्यकर्ताओं की इन बुनियादी जरूरतों का ध्यान क्यों नहीं रखा गया?
कार्यकर्ताओं के बीच इस बात को लेकर भी नाराजगी थी कि जब कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पदयात्रा निकालना था तो उससे पहले इतनी लंबी भाषणबाजी का क्या औचित्य था? अधिकांश नेताओं के भाषणों में एक ही तरह की बातें दोहराई जाती रहीं। विषय भी लगभग एक ही था, इसलिए भाषणों में नयापन नजर नहीं आया। शायद इसी अव्यवस्था और अनावश्यक देरी को भांपते हुए मुख्य अतिथि संजय सेठ ने महज चार मिनट में अपना संबोधन समाप्त कर दिया।
कार्यक्रम के समय को लेकर भी सवाल उठे। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुबह 11 बजे आयोजन शुरू होकर दोपहर साढ़े 12 बजे तक समाप्त होना था, लेकिन कार्यकर्ताओं का जुटान सुबह 10 बजे से ही शुरू हो गया था। इसके बावजूद कार्यक्रम दोपहर दो बजे के बाद ही समाप्त हो सका। यानी जिन कार्यकर्ताओं से समय पर पहुंचने की अपेक्षा की गई, उनके लिए समय और सुविधाओं की कोई चिंता नहीं दिखाई दी।
दीपावली के आसपास कार्यक्रम आयोजित करने को लेकर भी पार्टी के भीतर सुगबुगाहट रही। एक ओर दिल्ली में कांग्रेस की रैली को दीपावली के मद्देनजर अनुचित बताते हुए भाजपा के लोग आलोचना कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर खुद पार्टी ने त्योहार के मुहाने पर ऐसा आयोजन कर दिया। कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा भी रही कि पर्व-त्योहार के ऐन मौके पर इस तरह के कार्यक्रम से जनता के बीच सकारात्मक संदेश जाने के बजाय प्रतिकूल संदेश जा सकता है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि कार्यक्रम की तैयारियां कई दिनों से चल रही थीं। प्रत्येक शहर के कार्यक्रम के लिए अलग-अलग प्रभारी भी बनाए गए थे। इसके बावजूद जमीन पर तैयारियों का कोई खास असर नहीं दिखा। आखिर इन प्रभारियों की जिम्मेदारी क्या थी? क्या उनका काम सिर्फ कार्यक्रम की औपचारिक रूपरेखा तैयार करना था या नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए जरूरी सुविधाएं सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी थी?
राजनीतिक दलों के लिए कार्यकर्ता ही संगठन की असली ताकत होते हैं। उन्हीं के दम पर भीड़ जुटती है, नारे लगते हैं और चुनावी अभियान जमीन पर उतरते हैं। लेकिन जब उन्हीं कार्यकर्ताओं को घंटों धूप में बैठने, पानी के लिए भटकने और भोजन के बिना रहने को मजबूर होना पड़े तो संगठन की संवेदनशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इस आयोजन ने यह भी दिखा दिया कि बड़े नेताओं की मौजूदगी और बड़े-बड़े नारों से किसी कार्यक्रम की सफलता सुनिश्चित नहीं होती। न तो वरिष्ठ नेताओं की गरिमा का ख्याल रखा गया और न ही उन कार्यकर्ताओं के सम्मान का, जिनके दम पर पार्टी अपनी ताकत का प्रदर्शन करती है।

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