कड़वा सच–कॉकरोच आंदोलन ने बदल दी कई धारणाएं

देश के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की जुबान से निकली “कॉकरोच” वाली टिप्पणी का राजनीतिक असर इतना व्यापक होगा कि वह केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी, इसकी शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन और उसके बाद की घटनाओं ने यह दिखा दिया कि यदि देश का युवा वर्ग किसी मुद्दे पर एकजुट हो जाए, तो वह राजनीतिक समीकरण बदलने की क्षमता रखता है।
पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि जिस आंदोलन को शुरुआत में केवल सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर्स का आंदोलन बताकर हल्के में लिया जा रहा था, वही कुछ ही दिनों में राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया। आज जो राजनीतिक दल इस आंदोलन का समर्थन करते दिखाई दिए, वे शुरुआती दौर में इससे दूरी बनाए हुए थे। उन्हें आशंका थी कि कहीं इसका राजनीतिक नुकसान न उठाना पड़े। आज भी वे अपने अपने तरीके से इस आंदोलन का राजनीतिक लाभ उठाना चाह रहे हैं।
इस आंदोलन को निर्णायक मोड़ तब मिला जब सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल व्यापक जनसमर्थन का केंद्र बन गई। इसके बाद जिस तरह उन्हें धरना स्थल से हटाकर अस्पताल ले जाया गया, उसने आंदोलन के प्रति लोगों की सहानुभूति और बढ़ा दी। 20 जून को दिल्ली में जो हालात बने, उन्हें संभालने में सरकार संघर्ष करती नजर आई। अंतत: सरकार को आंदोलनकारियों से उनकी शर्तों पर बातचीत करनी पड़ी।
सरकार का समर्थन करने वालों की ओर से यह कहा गया कि आंदोलन में असामाजिक और विदेशी तत्व सक्रिय हैं। यदि ऐसा था तो भी उसकी तह तक जाने की जिम्मेदारी भी सरकार की ही होती है। उसकी जांच होनी चाहिए, लेकिन केवल ऐसे आरोप लगाने भर से यह तथ्य नहीं बदलता कि बड़ी संख्या में युवाओं ने इस अभियान से खुद को जोड़ा। यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दो बार स्वयं युवाओं को संबोधित किया। यह इस बात का संकेत था कि सरकार इस आंदोलन को गंभीरता से ले रही थी। सरकार के लिए यह केवल एक छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि युवाओं के बढ़ते असंतोष का संकेत बन चुका था। यह भी उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में धारा 370, जीएसटी, नोटबंदी और राम मंदिर जैसे अत्यंत संवेदनशील मामलों के काफी सफलता से लागू किया। देश के किसी कोने में इसे लेकर कोई प्रतिकूल माहौल नहीं बना। भले ही विपक्ष की ओर से पूरा प्रयास किया गया। ऐसे में यदि शिक्षा से जुड़े मुद्दों और छात्र असंतोष ने सरकार को अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया, तो यह युवाओं की लोकतांत्रिक शक्ति का उदाहरण माना जा सकता है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में भी पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई विवाद सामने आए। ऐसे में बढ़ते दबाव ने इस पूरे प्रकरण को और अधिक राजनीतिक बना दिया।

मीडिया पर हमले लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान जिस तरह मीडिया को निशाना बनाया गया, उसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि अब समाज का बड़ा हिस्सा सवालों का सामना करने के बजाय सवाल पूछने वालों को ही कटघरे में खड़ा करने लगा है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मीडिया स्पष्ट रूप से दो धड़ों में बंटा दिखाई देता है। एक वर्ग हर सरकारी आलोचना को देशविरोध से जोडऩे का प्रयास करता है, जबकि दूसरा वर्ग सरकार पर तीखे सवाल तो उठाता है, लेकिन अक्सर यह उलाहना भी देता है कि बोलने की आजादी नहीं है। ऐसे माहौल में पत्रकारिता की साख लगातार चुनौती के सामने है।
सोशल मीडिया के इस दौर में किसी भी मुद्दे को दबाना पहले जितना आसान नहीं रह गया है। वर्ष 2014 के अन्ना आंदोलन की सफलता में मुख्यधारा के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बड़ी भूमिका थी। इसके विपरीत, कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के शुरुआती चरण में मुख्यधारा का मीडिया अपेक्षाकृत दूरी बनाकर चलता दिखाई दिया। इस खाली स्थान को यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया मंचों ने भर दिया। धीरे-धीरे आंदोलन की कथा और विमर्श उन्हीं मंचों के माध्यम से आगे बढऩे लगा और अनेक डिजिटल चैनल आंदोलनकारियों की भाषा और दृष्टिकोण को ही प्रमुखता देने लगे।
चिंता की बात यह रही कि जब भी कोई पत्रकार आंदोलनकारियों से असहज सवाल पूछता, उसे “गोदी मीडिया” कहकर अपमानित किया जाता और कई बार उसके साथ अभद्र व्यवहार भी किया गया। महिला पत्रकारों के साथ भी काफी अभद्र व्यवहार किया गया। किसी पत्रकार की रिपोर्टिंग से असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन सवाल पूछने के अधिकार पर हमला करना उसी लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है जिसकी दुहाई दी जाती है।
विडंबना यह है कि मीडिया का एक वर्ग इस स्थिति को देखकर प्रसन्न होता दिखाई दिया, क्योंकि निशाने पर उसका वैचारिक प्रतिद्वंद्वी था। लेकिन उसे यह भी समझना चाहिए कि यदि आज किसी एक समूह के पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार को सामान्य मान लिया जाएगा, तो कल यही व्यवहार दूसरे समूह के साथ भी हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारों के सम्मान का सिद्धांत व्यक्ति, संस्था या विचारधारा देखकर नहीं बदला जा सकता।
लोकतंत्र में मीडिया की आलोचना होनी चाहिए, उसके कामकाज पर सवाल भी उठने चाहिए, लेकिन पत्रकारों को डराने, अपमानित करने या उन्हें सवाल पूछने से रोकने की संस्कृति किसी भी पक्ष के लिए अंतत: नुकसानदेह ही सिद्ध होगी। स्वस्थ लोकतंत्र वही है, जहां सत्ता भी सवालों का जवाब दे, आंदोलनकारी भी सवालों का सामना करें और मीडिया भी निष्पक्षता तथा जिम्मेदारी के साथ अपना दायित्व निभाए।

सकारात्मक पक्ष यह रहा कि अंतत: कॉकरोच जनता पार्टी ने अपना आंदोलन वापस लेने की घोषणा की। लोकतंत्र में आंदोलन और संवाद, दोनों की अपनी भूमिका है। यदि किसी विवाद का समाधान बातचीत और संवैधानिक प्रक्रिया से निकलता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहतर संकेत माना जाएगा। साथ ही यह भी आवश्यक है कि किसी भी आंदोलन के दौरान कानून-व्यवस्था बनी रहे और यदि किसी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप या अवैध गतिविधियों के आरोप हों, तो उनकी निष्पक्ष जांच हो। यही लोकतंत्र की मजबूती का आधार है।

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