एशिया का पहला एकीकृत इस्पात संयंत्र जब करीब सवा सौ वर्ष पहले जमशेदपुर में स्थापित हुआ था, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यही संयंत्र एक दिन वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाएगा और दुनिया के कई देशों तक अपना विस्तार करेगा। लेकिन जमशेदपुर प्लांट की एक विडंबना भी है। सामान्यत: बड़े उद्योग आबादी से दूर स्थापित होते हैं, जबकि टाटा स्टील का यह संयंत्र उस समय ऐसे स्थान पर बना था, जहां दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं थी। समय बदला, शहर बढ़ा और आज पूरा जमशेदपुर लगभग संयंत्र के चारों ओर बस गया है। यही कारण है कि अब प्लांट का हर विस्तार नई चुनौतियां लेकर आता है। पुराणों और ग्रंथों में दैत्यों का जिक्र आता है जो उत्पात मचाते थे तब भगवान अवतार लेते थे। आज यह शहर किसी ही वैसे दैत्य के डर से सहम रहा है कि पता नहीं कब किस कोने को उजाड़ दिया जाय। जमशेदजी भगवान के रूप में यहां पहले से अवतार लिये हुए हैं। इस भगवान के होते प्लांट विस्तार और उत्पादन के लिए शहर को उजाडऩा कहीं से गंवारा नहीं होता। यह निर्विवाद है ।
आज नए ग्रीनफील्ड स्टील प्लांट की स्थापना आसान नहीं रह गई है। भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय स्वीकृतियां और सामाजिक स्वीकार्यता जैसी अनेक बाधाएं सामने हैं। ऐसे में मौजूदा संयंत्र की क्षमता बढ़ाना कंपनी प्रबंधन ने रास्ता चुना है। इसका असर शहर के घनत्व की तुलना में उसपर बढ़ाए जा रहे लोड और दवाब के संतुलन का समाधान भी करना जरूरी है। राज्य और केंद्र सरकारें। कंपनी को न जमीन दे रही, न इस गंभीर नागरिक संकट पर ध्यान दे रहीं।पिछले लगभग 25 वर्षों में जमशेदपुर प्लांट की उत्पादन क्षमता करीब दस गुणा बढार 10 मिलियन टन से अधिक हो चुकी है। इस विस्तार के लिए कंपनी ने आसपास के अनेक क्वार्टर खाली कराए, कई संस्थानों का स्थानांतरण किया और व्यापक पुनर्गठन की प्रक्रिया अपनाई। सरकार टोंटोपोशी प्रोजेक्ट में सहयोग नहीं कर जमशेदपुर में दैत्य रूपी उद्योग को आकर दिलाने में प्रमुख कारक बनी। कंपनी विस्तार की मजबूरी बताकर शहर समेट रही और यही बात शहर को अब आदमियों के लिए नहीं उत्पादन के लिए तैयार करती दिखा रही। लोगों को नई जगह पर बसाने और विस्तार देने की योजना कहीं दिखाई नहीं दे रही।
एक समय टाटा स्टील में लगभग 70 हजार कर्मचारी कार्यरत थे। आधुनिक तकनीक, मशीनीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप बदलावों के बाद यह संख्या घटकर लगभग 10 हजार रह गई। बाजार में टिके रहने के लिए यह परिवर्तन आवश्यक भी था। इस बदलाव की नींव पूर्व प्रबंध निदेशक डॉ. जे.जे. ईरानी के दौर में पड़ी थी। उनका प्रसिद्ध कथन था कि “छोटी नाव को मोडऩा आसान होता है, लेकिन टाइटैनिक को मोडऩा बेहद कठिन होता है।” टाटा स्टील जैसी विशाल कंपनी के लिए यह बदलाव आसान नहीं था। अपनाए गए तरीकों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि इन्हीं परिवर्तनों ने कंपनी को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत बनाए रखा। अब जमशेद जी के सपनों के अनुरूप उद्योग समाज के विकास के लिए हो, न कि उसके विनाश के लिए। जमशेदपुर के जीवन की पुरानी रौनक और तासीर यहीं खोती दिख रही।
क्या इस विकास की दौड़ में जमशेदपुर की वह तासीर, वे मूल्य और सामाजिक संस्कृति भी सुरक्षित रह पाए हैं, जिनकी पहचान पूरे देश में रही है?
जमशेदपुर और टाटा स्टील का रिश्ता केवल उद्योग और शहर का नहीं, बल्कि साझा संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारी का रहा है। कंपनी ने केवल रोजगार नहीं दिया, बल्कि शहर की कार्य संस्कृति, सामाजिक समरसता, खेल, शिक्षा, स्वास्थ्य और नागरिक जीवन को भी आकार दिया। यही कारण है कि कंपनी के हर बड़े निर्णय का असर पूरे शहर पर पड़ता है।
यदि कंपनी को भविष्य में और विस्तार करना है तो केवल उद्योग ही नहीं, शहर के भविष्य की भी समानांतर योजना बनानी होगी। करीब दो दशक पहले “नया जमशेदपुर” बसाने की अवधारणा सामने आई थी, लेकिन वह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब समय आ गया है कि दिल्ली-एनसीआर की तर्ज पर व्यापक क्षेत्रीय विकास की सोच अपनाई जाए। औद्योगिक विस्तार के साथ नए व्यावसायिक केंद्र, आवासीय क्षेत्र और आधुनिक शहरी ढांचे का विकास भी जरूरी है। अन्यथा साकची, बिष्टुपुर जैसे पारंपरिक बाजारों पर बढ़ता कंपनी के विस्तार का दबाव और उनका घटता आर्थिक महत्व भविष्य में गंभीर चिंता का विषय बन सकता है।
कंपनी को भी समाज के साथ संवाद और अधिक मजबूत करना होगा। शहर की संवेदनाओं और अपेक्षाओं का सम्मान करना उतना ही आवश्यक है, जितना उत्पादन बढ़ाना। जुबली पार्क को अचानक बंद किए जाने जैसी घटनाओं ने यह संदेश दिया था कि संवाद की कमी से अनावश्यक असंतोष पैदा हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों से बचना सभी के हित में है।
एक और गंभीर मुद्दा बड़ी संख्या में खाली पड़े कंपनी क्वार्टरों का है। जहां क्वार्टर तोड़े जा रहे हैं, वहीं अनेक आवास वर्षों से खाली पड़े हैं और वहां असामाजिक तत्वों का जमावड़ा बढ़ रहा है। इससे शहर का माहौल प्रभावित हो रहा है। ऐसे में बेहतर होगा कि जिन सामाजिक, सांस्कृतिक और जनसेवी संगठनों ने लंबे समय से स्थान आवंटन के लिए आवेदन कर रखा है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर इन परिसरों का उपयोग करने का अवसर दिया जाए। इससे एक ओर अवैध कब्जों और असामाजिक गतिविधियों पर रोक लगेगी, वहीं दूसरी ओर शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां भी जीवंत बनी रहेंगी।
टाटा स्टील का विस्तार आवश्यक है, क्योंकि उद्योग का विकास ही शहर और क्षेत्र की आर्थिक प्रगति का आधार है। लेकिन यह विस्तार तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ जमशेदपुर की आत्मा, उसकी सामाजिक पहचान और उसकी विशिष्ट संस्कृति भी सुरक्षित रहे। विकास और विरासत—दोनों के बीच संतुलन ही आने वाले समय में जमशेदपुर की सबसे बड़ी आवश्यकता है।(जारी )
