कोचिंग संस्कृति का बढ़ता जाल और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर कोचिंग संस्थानों का जिस तरह विशाल कारोबार खड़ा हो गया है, वह केवल एक शैक्षणिक व्यवस्था नहीं बल्कि एक समानांतर शिक्षा उद्योग का रूप ले चुका है। इस उद्योग ने छात्रों और अभिभावकों को इस तरह अपने प्रभाव में ले लिया है कि अब बिना कोचिंग के सफलता की कल्पना तक कठिन मानी जाने लगी है। इसके दूरगामी दुष्परिणाम आज समाज के सामने स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।
विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं कि संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) जैसी परीक्षाओं की बुनियादी तैयारी के लिए एनसीईआरटी की पुस्तकों का अध्ययन पर्याप्त आधार प्रदान करता है। लेकिन जेईई और नीट जैसी परीक्षाओं का स्वरूप ऐसा बना दिया गया है कि स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम और प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई के बावजूद विद्यार्थियों को यह महसूस कराया जाता है कि कोचिंग संस्थानों की मदद के बिना सफलता संभव नहीं है।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा प्रतीक राजस्थान का कोटा शहर बन चुका है, जहां देश के विभिन्न राज्यों, विशेषकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से लाखों छात्र पहुंचते हैं। इनमें अधिकांश मध्यमवर्गीय और सामान्य परिवारों से आते हैं। बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद में अभिभावक भारी-भरकम फीस जुटाने के लिए कर्ज तक लेने को मजबूर हो जाते हैं। एक विद्यार्थी पर सालाना दो से तीन लाख रुपये या उससे अधिक का खर्च सामान्य बात बन चुकी है।
जब किसी परिवार की वर्षों की कमाई और उम्मीदें एक बच्चे पर केंद्रित हो जाती हैं, तब उस विद्यार्थी पर मानसिक दबाव कितना बढ़ जाता होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। यही कारण है कि कोचिंग हबों में अवसाद, तनाव और आत्महत्या की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं। दुखद यह है कि समस्या की जड़ तक पहुंचने के बजाय अक्सर केवल उसके लक्षणों से निपटने की कोशिश होती है। कोटा में छात्र आत्महत्याओं को रोकने के लिए हॉस्टलों के पंखों की संरचना बदली जाती है, लेकिन उस व्यवस्था पर गंभीर चर्चा नहीं होती जो बच्चों को इतनी निराशा और दबाव की स्थिति में पहुंचा देती है।
करीब डेढ़ दशक पहले प्रतियोगी परीक्षाओं को अधिक योग्यता-आधारित और स्कूल शिक्षा से जोड़ने के उद्देश्य से सीबीएसई आधारित मॉडल अपनाने का प्रयास किया गया था। लेकिन विभिन्न कारणों से उसका विरोध हुआ और अंततः पुरानी व्यवस्था ही वापस लागू हो गई। आज स्थिति यह है कि परीक्षाओं का पैटर्न कहीं न कहीं कोचिंग उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप ढलता हुआ दिखाई देता है।
बताया जाता है कि देश का कोचिंग उद्योग लगभग 60 हजार करोड़ रुपये का बाजार बन चुका है। इतने बड़े आर्थिक हितों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में छात्रों की क्षमता का मूल्यांकन कर रही है या फिर एक ऐसे मॉडल को बढ़ावा दे रही है जिसमें सफलता का रास्ता महंगी कोचिंग से होकर गुजरता है।
हाल ही में बिहार के गया निवासी शुभम कुमार ने जेईई एडवांस्ड में सर्वोच्च अंक हासिल कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। लेकिन परिणामों की प्रस्तुति में इस उपलब्धि को ऐसे प्रचारित किया गया मानो सफलता का श्रेय किसी विशेष कोचिंग संस्थान या कोटा मॉडल को जाता हो। यह प्रवृत्ति भी चिंताजनक है, क्योंकि सफलता का वास्तविक श्रेय छात्र की मेहनत, प्रतिभा और परिवार के त्याग को मिलना चाहिए, न कि केवल कोचिंग उद्योग के प्रचार तंत्र को।
शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों में ज्ञान, समझ और क्षमता का विकास करना होना चाहिए, न कि उन्हें एक ऐसी दौड़ का हिस्सा बना देना जिसमें सफलता का पैमाना केवल महंगी कोचिंग और रैंक बनकर रह जाए। जब तक स्कूल शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के बीच की खाई को कम नहीं किया जाएगा, तब तक कोचिंग संस्कृति का यह मायाजाल और मजबूत होता जाएगा तथा छात्र मानसिक, आर्थिक और सामाजिक दबाव का शिकार होते रहेंगे।

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