
पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सभी मदरसों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान ‘वंदे मातरम’ गाना तत्काल प्रभाव से अनिवार्य कर दिया है। यह आदेश मदरसा शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी किया गया है। अधिसूचना के अनुसार यह निर्देश सरकारी मॉडल मदरसों, सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों, मान्यता प्राप्त गैर-सहायता प्राप्त मदरसों, साथ ही अल्पसंख्यक मामले और मदरसा शिक्षा विभाग के तहत संचालित अनुमोदित शिशु शिक्षा केंद्रों और माध्यमिक शिक्षा केंद्रों पर लागू होगा।
अधिकारियों ने बताया कि इस कदम का उद्देश्य विभाग के अंतर्गत आने वाले सभी शैक्षणिक संस्थानों में प्रार्थना सभा की प्रक्रियाओं में एकरूपता लाना है। इस आदेश को लागू करने के लिए जिला मजिस्ट्रेटों, स्कूलों के जिला निरीक्षकों और पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड को भेजा गया है।
यह घटनाक्रम राज्य सरकार द्वारा सभी सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में ‘वंदे मातरम’ गाना अनिवार्य किए जाने के लगभग एक सप्ताह बाद सामने आया है। संस्थानों के प्रमुखों को निर्देश दिया गया था कि वे यह सुनिश्चित करें कि कक्षाएं शुरू होने से पहले सभी छात्र इस राष्ट्रगीत में भाग लें।
इस बीच, यह कदम केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से संबंधित प्रावधानों को और अधिक सुदृढ़ बनाने के प्रयासों के बीच भी आया है। केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971’ में संशोधन का प्रस्ताव रखा है, जिसमें ‘वंदे मातरम’ गाने में बाधा डालना एक दंडनीय अपराध बनाना भी शामिल है।
वहीं, इस मामले में कोलकाता खिलाफत कमेटी के प्रमुख मोहम्मद अशरफ अली कासमी ने कहा, “मैंने पहले भी कहा था कि सरकार को किसी भी धर्म के आधार पर काम नहीं करना चाहिए। उसका काम नागरिकों का विकास सुनिश्चित करना और हमें रोजगार देना है। हम यह नहीं कहते कि ‘वंदे मातरम’ नहीं गाया जाना चाहिए, लेकिन इसे मुसलमानों पर थोपना गलत है, क्योंकि इस गीत की कुछ पंक्तियां हमारे धर्म के खिलाफ हैं… हम पश्चिम बंगाल सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह इस फैसले को वापस ले। हम बहुत साफ तौर पर कहते हैं कि हम इसी देश में रहते हैं और हम इससे प्यार करते हैं, लेकिन हम इस देश की पूजा नहीं करते। मुसलमान सिर्फ एक और एकमात्र अल्लाह की इबादत करते हैं।”
