महा सप्तमी पर पूजा पंडालों में गूंजे मंत्र, पुष्पांजलि के साथ शुरू हुई मां दुर्गा की आराधना

क्या है महा सप्तमी की सुबह नदी से जल लाने की परंपरा और नवपत्रिका पूजन,जानें

महा सप्तमी के साथ ही जमशेदपुर शहर के विभिन्न दुर्गा पूजा पंडालों में विधिवत पूजा-अर्चना और पुष्पांजलि का शुभारंभ हो गया।जमशेदपुर मे 350 से अधिक लाइसेंसी पूजा अलग अलग पंडालो में होती है.शनिवार की सुबह से ही श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। परंपरा के अनुसार, सुबह श्रद्धालु विभिन्न नदी घाटों पर पहुंचे और पवित्र जल को कलश में भरकर पूजा पंडालों तक लाए। इसके बाद निर्धारित धार्मिक विधि-विधान के साथ मां दुर्गा की पूजा-अर्चना शुरू हुई।
महा सप्तमी के अवसर पर नदी घाटों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की चहल-पहल रही। पवित्र जल संग्रह करने के बाद उसे पूजा मंडपों में लाया गया, जहां पुरोहितों ने मंत्रोच्चार के साथ पूजा की प्रक्रिया संपन्न कराई। इसके साथ ही विभिन्न पूजा पंडालों में पुष्पांजलि का आयोजन भी शुरू हो गया। श्रद्धालुओं ने मां दुर्गा के चरणों में पुष्प अर्पित कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।
दुर्गा पूजा में महा सप्तमी का दिन विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है। शारदीय दुर्गोत्सव के इस दिन मां दुर्गा की विधिवत पूजा-अर्चना की शुरुआत के साथ कई प्राचीन परंपराओं का निर्वहन किया जाता है। इनमें नदी से पवित्र जल लाना, नवपत्रिका स्नान और पूजन तथा मां दुर्गा के पूजा मंडप में प्राण-प्रतिष्ठा से जुड़ी धार्मिक प्रक्रियाएं प्रमुख हैं। बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में इन अनुष्ठानों का विशेष स्थान है। झारखंड के जमशेदपुर सहित उन क्षेत्रों में भी, जहां बंगाली परंपरा के अनुसार दुर्गोत्सव मनाया जाता है, महा सप्तमी की सुबह का दृश्य अत्यंत श्रद्धा और भक्ति से परिपूर्ण होता है।
1. महा सप्तमी की सुबह नदी से जल लाने की परंपरा
महा सप्तमी की सुबह सूर्योदय के आसपास, कई पूजा समितियों के पुरोहित, ढाकी और श्रद्धालु नदी या किसी पवित्र जलाशय के तट पर पहुंचते हैं। कुछ स्थानों पर इसके लिए पहले से निर्धारित घाट होता है, जहां हर वर्ष यह अनुष्ठान संपन्न किया जाता है।
इस परंपरा का मूल भाव है प्रकृति, जल और जीवन के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना तथा मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र जल एकत्र करना। हिंदू धार्मिक परंपरा में जल को शुद्धि, जीवन, उर्वरता और मंगल का प्रतीक माना गया है।
अनुष्ठान की सामान्य प्रक्रिया इस प्रकार होती है:
1. घाट पर पहुंचना और संकल्प: पुरोहित पूजा के उद्देश्य से संकल्प लेते हैं। नदी या जलाशय के तट पर देवी-देवताओं का स्मरण किया जाता है तथा पूजा निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना की जाती है।
4. नवपत्रिका को स्नान कराने की तैयारी: बंगाली दुर्गोत्सव में नदी तक जाने का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य प्रायः नवपत्रिका को पवित्र स्नान कराना होता है। नवपत्रिका को स्नान कराने के लिए ले जाया जाता है और विधि पूरी होने के बाद उसे पूजा मंडप में वापस लाया जाता है।
5. शंखध्वनि और ढाक की गूंज: कई स्थानों पर शंख बजाए जाते हैं और ढाक की थाप के साथ यह धार्मिक यात्रा आगे बढ़ती है। श्रद्धालु देवी का स्मरण करते हुए अनुष्ठान में सहभागी बनते हैं।
यह ध्यान देने योग्य है कि केवल नदी से जल लाना और नवपत्रिका का नदी में स्नान कराना एक ही प्रक्रिया नहीं हैं। अनेक बंगाली पूजा पद्धतियों में दोनों एक ही अनुष्ठान-क्रम के अंग होते हैं, लेकिन इनका धार्मिक उद्देश्य और विधि अलग-अलग है। स्थानीय पूजा समिति और पुरोहित की परंपरा के अनुसार इनके क्रम में अंतर हो सकता है।
नवपत्रिका दो शब्दों से मिलकर बना है—‘नव’ अर्थात नौ और ‘पत्रिका’ अर्थात पत्तों या वनस्पतियों का समूह। बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में नौ विशिष्ट वनस्पतियों को एक साथ बांधकर देवी के नौ स्वरूपों के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। इसे नवपत्रिका पूजन कहा जाता है।
नवपत्रिका को बंगाली भाषा में ‘कोलाबौ’ या ‘कला बऊ’ भी कहते हैं। इसमें केले का पौधा प्रमुख होता है। उसे लाल किनारी वाली सफेद साड़ी पहनाई जाती है, जिससे उसका रूप नववधू जैसा दिखाई देता है। हालांकि, धार्मिक दृष्टि से नवपत्रिका को केवल गणेश की पत्नी मानना सही नहीं है। यह वनस्पतियों में देवी की शक्ति और प्रकृति के मातृस्वरूप की आराधना का प्रतीक है।

नवपत्रिका में शामिल नौ वनस्पतियां और उनके देवी-स्वरूप

परंपरागत बंगाली दुर्गा पूजा में नवपत्रिका में निम्नलिखित नौ वनस्पतियां शामिल की जाती हैं।
1. कदली — केले का पौधा
इसे देवी ब्रह्माणी का प्रतीक माना जाता है। यह समृद्धि, उर्वरता और जीवन की निरंतरता का भाव व्यक्त करता है।
2. कचू — अरबी या कचू का पौधा
इसे देवी कालिका के स्वरूप से जोड़ा जाता है। यह प्रकृति की विविधता और जीवनशक्ति का प्रतीक है।

3. हरिद्रा — हल्दी का पौधा
इसे देवी दुर्गा या महिषासुरमर्दिनी के स्वरूप से जोड़ा जाता है। हल्दी मंगल, पवित्रता और आरोग्य का प्रतीक है।
4. जयंती — जयंती का पौधा
यह देवी कार्तिकी का प्रतीक है। इसके साथ विजय और शक्ति का भाव जुड़ा है।
5. बिल्व — बेल का पौधा
इसे शिव के स्वरूप से संबद्ध माना जाता है। बेलपत्र भगवान शिव की पूजा में विशेष महत्त्व रखता है।
6. दाड़िम — अनार का पौधा
यह देवी रक्तदंतिका का प्रतीक है। अनार के लाल फल को शक्ति और जीवन के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।

7. अशोक — अशोक का पौधा
इसे देवी शोकहरिता से जोड़ा जाता है। नाम के अनुरूप यह दुख दूर होने और प्रसन्नता का प्रतीक है।
8. मानकचू — मान कचू का पौधा
इसे देवी चामुंडा का प्रतीक माना जाता है। यह देवी की उग्र और दुष्ट शक्तियों का विनाश करने वाली शक्ति को दर्शाता है।
9. धान — धान का पौधा
इसे देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। धान अन्न, धन-धान्य, कृषि और जनजीवन की समृद्धि का प्रतिनिधित्व करता है।
इन वनस्पतियों के नामों और देवी-स्वरूपों के संबंध में स्थानीय परंपराओं तथा पूजा-पद्धतियों के अनुसार कुछ अंतर मिल सकते हैं।

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