दिशोम गुरु शिबू सोरेन पद्म भूषण से सम्मानित, पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति से ग्रहण किया पुरस्कार

 

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में 2026 के लिए कई हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया। राष्ट्रपति ने आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने वाले और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के संस्थापक स्वर्गीय दिशोम गुरु शिबू सोरेन को देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया। शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से यह सम्मान ग्रहण किया। इस मौके पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन के अलावा गांडेय विधायक कल्पना सोरेन, शिबू सोरेन की बेटी अंजनी सोरेन और अन्य परिजन भी उपस्थित रहे.

रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार को राष्ट्रपति भवन के गणतंत्र मंडप में आयोजित समारोह में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक शिबू सोरेन को पद्म भूषण से सम्मानित किया।राष्ट्रपति ने टेनिस के दिग्गज खिलाड़ी विजय अमृतराज, अभिनेता ममूटी और पार्श्व गायिका अलका याग्निक समेत 65 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया।

बीते 21 फरवरी को झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने फादर्स डे पर अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक भावुक पोस्ट किया था। हेमंत सोरेन ने लिखा था कि पिता केवल एक रिश्ता नहीं वरन संघर्ष, साहस, संकल्प और संस्कार की वह पाठशाला हैं, जहां जीवन जीने का ज्ञान मिलता है। दिशोम गुरु शिबू सोरेन जी ने हमें हमेशा सिखाया कि लोगों का विश्वास ही सबसे बड़ी ताकत है। अपने राज्य और लोगों के अधिकारों के लिए हर परिस्थिति में डटकर खड़ा रहना ही सच्ची सेवा है।

‘दिशोम गुरु’ यानी धरती के नेता

झारखंड को अलग राज्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव (तब बिहार, अब झारखंड में) में हुआ था। शिबू सोरेन आदिवासी और क्षेत्रीय राजनीति में सबसे लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले नेताओं में से एक माने जाते हैं। उन्हें ‘दिशोम गुरु’ (धरती के नेता) के तौर पर जाना जाता है। शिबू सोरेन को आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने वाले नेता के तौर पर जाना जाता है।

संघर्षों से भरा जीवन

शिबू सोरेन का शुरुआती जीवन निजी दुख और गहरे सामाजिक-आर्थिक संघर्षों से भरा था। शिबू सोरेन जब 15 साल के थे तब 27 नवंबर, 1957 को गोला ब्लॉक मुख्यालय से लगभग 16 किलोमीटर दूर लुकाइयाटांड जंगल में उनके पिता शोबारन सोरेन की कथित तौर पर साहूकारों ने हत्या कर दी थी। इस घटना ने उन्हें झकझोर दिया था। इस घटना ने उन पर गहरा असर डाला। यही घटना उनके भविष्य के राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत का कारण बनी।

जेएमएम के जरिए अलग राज्य की मांग, बढ़ता गया कारवां

साल 1973 में धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में एक जनसभा के दौरान शिबू सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा यानी जेएमएम की स्थापना की थी। यही जेएमएम अलग आदिवासी राज्य की मांग के लिए राजनीतिक आवाज बनी गई। पार्टी को आदिवासी समाज का व्यापक समर्थन मिलता गया। शिबू सोरेन ने सामंती शोषण के खिलाफ लोगों को एकजुट करने का काम किया। जल्द ही वह आदिवासी नेता के रूप में चर्चित हो गए।

अलग झारखंड के लिए उठाई थी आवाज

शिबू सोरेन के और अन्य लोगों की अगुवाई में दशकों तक चले आंदोलन के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड के गठन के साथ अलग राज्य की मांग आखिरकार पूरी हो गई। वे दुमका से कई बार विधायक बने। वह मई 2014 से 2019 के बीच 16वीं लोकसभा के सदस्य बने। जून 2020 में उन्हें राज्यसभा के लिए चुना गया। UPA सरकार में उन्होंने कई बार केंद्रीय मंत्री के रूप में काम किया।साल 2025 में शिबू सोरेन का 81 साल की उम्र में निधन हो गया था।

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