नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक जीवन में 25 वर्ष पूरे कर एक ऐसा राजनीतिक रिकॉर्ड बनाया है, जिसका भारतीय राजनीति के इतिहास में अपना अलग स्थान रहेगा। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने लगातार राज्य और फिर केंद्र की सत्ता के शीर्ष पर अपनी भूमिका निभाई। अक्टूबर 2001 से मई 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के बाद मई 2014 में वे देश के प्रधानमंत्री बने और अब प्रधानमंत्री के रूप में तीसरा कार्यकाल पूरा कर रहे हैं।
नरेंद्र मोदी को पसंद किया जा सकता है, नापसंद किया जा सकता है। उनकी नीतियों से सहमत हुआ जा सकता है या असहमति जताई जा सकती है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में लगातार 25 वर्षों तक शीर्ष पर बने रहना अपने आप में एक असाधारण राजनीतिक उपलब्धि है। 75 वर्ष की उम्र में भी जिस तरह वे लगातार सक्रिय दिखाई देते हैं, वह उनके राजनीतिक सफर की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। अपने 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर मोदी ने भी अपने इस सफर को सेवा, उद्देश्य, दृढ़ विश्वास और संकल्प से जोड़ते हुए विकसित भारत के लक्ष्य तक काम करते रहने की बात कही है।
इस सफर का एक दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में उदय जितना तेज रहा, उनका विरोध भी उतना ही मुखर रहा। 2014 में केंद्र की सत्ता संभालने के बाद उनके खिलाफ राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर तीखी आलोचना हुई। उनके समर्थकों ने जहां इसे मोदी के खिलाफ स्थापित राजनीतिक धारणाओं की चुनौती माना, वहीं आलोचकों ने उनकी नीतियों और शासन के तौर-तरीकों पर लगातार सवाल उठाए। उनके प्रधानमंत्री बनने के साथ ही विरोध में अवार्ड वापसी का दौर भी कुछ समय के लिए चला.लोकतंत्र की खूबसूरती भी यही है कि सत्ता में बैठे व्यक्ति और सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने की पूरी गुंजाइश बनी रहे।
मोदी के राजनीतिक सफर को केवल उनके समर्थकों की नजर से देखना भी अधूरा होगा और केवल उनके विरोधियों के नजरिये से देखना भी। उनकी सरकार के फैसलों पर बहस हो सकती है, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल उठाए जा सकते हैं और विपक्ष को सरकार की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। लेकिन इन तमाम असहमतियों के बीच यह तथ्य अपनी जगह कायम है कि मोदी भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली और निर्णायक राजनीतिक चेहरों में से एक बन चुके हैं।
भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक सफर में भी मोदी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। जिस भाजपा के पास 1984 के लोकसभा चुनाव में केवल दो सीटें थीं, वही पार्टी 2014 और 2019 में पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र में सरकार बनाने में सफल हुई। 2014 में भाजपा को 282 और 2019 में 303 लोकसभा सीटें मिलीं।
यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि भाजपा का विस्तार उन राज्यों तक हुआ जहां कभी उसे मजबूत राजनीतिक ताकत नहीं माना जाता था। हालांकि हर राज्य में भाजपा की सफलता का कारण केवल नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बताना राजनीतिक रूप से सरल निष्कर्ष होगा, लेकिन यह भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि राष्ट्रीय स्तर पर मोदी की छवि ने पार्टी के चुनावी अभियान को एक अलग पहचान दी है।
झारखंड इसका दिलचस्प उदाहरण है। विधानसभा चुनावों में भाजपा को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन अलग तस्वीर पेश करता रहा। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतदाता के मुद्दे और नेतृत्व की पसंद अलग-अलग हो सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर मोदी की लोकप्रियता भाजपा के लिए इस अंतर को पैदा करने वाले कारकों में से एक मानी जा सकती है।
नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता शायद यही है कि वे भारतीय राजनीति में केवल एक प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि स्वयं में एक राजनीतिक ब्रांड बन चुके हैं। उनके समर्थकों के लिए वे परिवर्तन और निर्णायक नेतृत्व का चेहरा हैं, जबकि उनके आलोचक उनकी नीतियों और शासन शैली पर गंभीर सवाल उठाते हैं। दोनों पक्षों की मौजूदगी ही बताती है कि मोदी का राजनीतिक प्रभाव कितना व्यापक है।
25 वर्ष पूरे होने के बाद नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर का मूल्यांकन आने वाले वर्षों में इतिहासकार करेंगे। लेकिन आज इतना जरूर कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी को नजरअंदाज करके पिछले ढाई दशक की राजनीति को समझना संभव नहीं है। उनसे सहमति हो या असहमति, उनकी लोकप्रियता, राजनीतिक प्रभाव और लंबे समय तक सत्ता के शीर्ष पर बने रहने की क्षमता भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन चुकी है।
