पूरी दुनिया इस समय असाधारण तनाव के दौर से गुजर रही है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़े देशों के बीच तनातनी है, कहीं युद्ध चल रहा है तो कहीं युद्ध का खतरा मंडरा रहा है। कई देशों के रिश्तों में ऐसी तल्खी है कि शीत युद्ध जैसी परिस्थितियां दिखाई देने लगी हैं। ऐसे वैश्विक माहौल में भारत की भूमिका पर पूरी दुनिया की नजर होना स्वाभाविक है।
यही कारण है कि नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर भी दुनिया की निगाहें टिकी हुई थीं। सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या भारत ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों को एक साझा घोषणा पर सहमत करा पाएगा? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मई में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर गहरे मतभेद के कारण संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं हो सका था।
इसके बाद सितंबर में परिस्थितियां और जटिल थीं। एक तरफ ईरान और दूसरी तरफ अमेरिका के साथ करीबी संबंध रखने वाला संयुक्त अरब अमीरात—दोनों ब्रिक्स के सदस्य हैं। ऐसे में दोनों देशों की सहमति के बिना किसी साझा घोषणा पर पहुंचना आसान नहीं था। लेकिन भारत ने कूटनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए इस कठिनाई को दूर किया। कई दिनों तक चली बातचीत के बाद 12 सितंबर को ब्रिक्स देशों ने सर्वसम्मति से नई दिल्ली घोषणा स्वीकार कर ली। घोषणा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अधिकतम संयम बरतने और विवादों का समाधान संवाद, परामर्श और कूटनीति के माध्यम से करने पर जोर दिया गया। �
यह निश्चित रूप से भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है।
भारत की इस उपलब्धि को केवल ब्रिक्स की एक घोषणा तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। इसके पीछे भारत की उस विदेश नीति की तस्वीर दिखाई देती है, जिसमें किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय सभी पक्षों से संवाद बनाए रखने पर जोर है।
आज अमेरिका और रूस के संबंधों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, लेकिन भारत के दोनों देशों के साथ अपने संबंध हैं। चीन के साथ सीमा विवाद और गलवान के बाद रिश्तों में आई कड़वाहट के बावजूद अब दोनों देशों के बीच संवाद और रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश दिखाई दे रही है। ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बातचीत इसी बदलते परिवेश का संकेत है।
ईरान के साथ भी भारत के संबंध मजबूत हैं और पश्चिम एशिया के संकट के बीच भारत ने किसी पक्ष का अंध समर्थन करने के बजाय संवाद और कूटनीति की वकालत की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात के दौरान भी स्पष्ट किया कि समस्याओं का समाधान बातचीत और कूटनीति से ही होना चाहिए। दूसरी ओर इजरायल के साथ भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं।
यही भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत है।
भारत किसी युद्ध का पक्षकार नहीं बनना चाहता, लेकिन शांति की कोशिशों से खुद को अलग भी नहीं रखना चाहता। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत ने यही रास्ता अपनाया था। भारत ने रूस से भी संवाद रखा और यूक्रेन से भी। आज पश्चिम एशिया के संकट में भी भारत की कोशिश यही है कि टकराव को बढ़ाने के बजाय बातचीत के रास्ते खुले रहें।
इसका अर्थ यह नहीं कि भारत की विदेश नीति में कोई मतभेद नहीं हैं या भारत हर देश की बात से सहमत है। बल्कि इसका अर्थ यह है कि भारत ने अपनी स्वतंत्र रणनीतिक सोच को बनाए रखा है। वह किसी दूसरे देश के दबाव में अपनी विदेश नीति तय करने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक शांति दोनों को ध्यान में रखकर निर्णय ले रहा है।
ब्रिक्स की नई दिल्ली घोषणा में भी भारत की इसी सोच की झलक दिखाई देती है। 11 देशों को एक साझा दस्तावेज पर सहमत कराना उस समय विशेष महत्व रखता है, जब स्वयं ब्रिक्स के भीतर भी अलग-अलग देशों के हित और वैश्विक मुद्दों पर दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। �
आज दुनिया को ऐसे ही किसी भरोसेमंद सेतु की आवश्यकता है। एक ऐसा देश जो अमेरिका से बात कर सके, रूस से संवाद कर सके, चीन के साथ मतभेदों के बावजूद बातचीत का रास्ता खुला रख सके, ईरान से संबंध बनाए रख सके और पश्चिम एशिया के दूसरे देशों से भी संपर्क में रहे।
भारत आज उसी भूमिका में दिखाई दे रहा है।
दुनिया भले अलग-अलग खेमों में बंटती दिखाई दे रही हो, लेकिन भारत का संदेश स्पष्ट है—युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है, संवाद का रास्ता कभी बंद नहीं होना चाहिए और वैश्विक राजनीति किसी एक शक्ति के इशारे पर नहीं चल सकती।
नई दिल्ली में ब्रिक्स की सर्वसम्मत घोषणा केवल एक कूटनीतिक दस्तावेज नहीं है। यह इस बात का संकेत भी है कि बदलती दुनिया में भारत अब केवल एक बड़ी आर्थिक या जनसंख्या शक्ति नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली कूटनीतिक संतुलनकारी शक्ति के रूप में भी अपनी जगह बना रहा है।
