खानपान की गुणवत्ता से समझौता आखिर कब तक?

हमारे देश में खानपान को लेकर आम लोगों से लेकर सरकारी तंत्र और निर्माता कंपनियों तक जिस तरह की लापरवाही लगातार बढ़ती जा रही है, वह अब किसी से छिपी नहीं है। भोजन और पेय पदार्थों की गुणवत्ता हमेशा सवालों के घेरे में रहती है, लेकिन इसके बावजूद इसे लेकर अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं देती। हाल ही रेलवे से जुड़ी सामने आई एक रिपोर्ट ने इस समस्या की गंभीरता को एक बार फिर उजागर किया है।
रेलवे को लेकर संसद में पेश कैग की रिपोर्ट में स्टेशनों पर उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी संख्या में रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों के लिए बैठने की व्यवस्था, शौचालय, पंखे और दूसरी आवश्यक सुविधाओं का अभाव है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि कई स्टेशनों पर पीने के पानी के नमूनों में ई-कोलाई जैसे बैक्टीरिया पाए गए। यानी जिस पानी को यात्री अपनी प्यास बुझाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, वही उनके स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है।
रिपोर्ट सामने आने के बाद सरकार हरकत में आई है और व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने की बात कही जा रही है। लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर इतने वर्षों तक ऐसी लापरवाही क्यों चलती रही? क्या किसी बड़े हादसे या किसी रिपोर्ट के सामने आने के बाद ही व्यवस्था को अपनी जिम्मेदारी का एहसास होगा?
यह केवल रेलवे की समस्या नहीं है। सार्वजनिक स्थलों से लेकर होटल और रेस्टोरेंट तक खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। हाल ही में बेंगलुरु के एक पांच सितारा होटल में खाद्य सामग्री की गुणवत्ता को लेकर सामने आया मामला भी इसी ओर इशारा करता है कि महंगे और प्रतिष्ठित संस्थानों में भी गुणवत्ता की गारंटी हमेशा नहीं होती।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमारे यहां खाद्य सुरक्षा के लिए कानून तो हैं, लेकिन उनके पालन को लेकर गंभीरता का अभाव है। समय-समय पर फूड इंस्पेक्टर और संबंधित विभागों की ओर से जांच होती है। नमूने लिए जाते हैं, रिपोर्ट तैयार होती है और कई बार रिपोर्ट में गड़बड़ी भी सामने आती है। लेकिन इसके बाद क्या होता है, यह आम आदमी को पता ही नहीं चलता। कार्रवाई हुई या नहीं, दोषी के खिलाफ क्या कदम उठाया गया और भविष्य में ऐसी गड़बड़ी दोबारा न हो, इसके लिए क्या व्यवस्था बनाई गई—इन सवालों का जवाब अक्सर नहीं मिलता।
जमशेदपुर में पनीर की गुणवत्ता को लेकर उठे सवाल इसका उदाहरण हैं। जांच में पनीर मानक के अनुरूप नहीं पाया गया, लेकिन इसके बाद क्या कार्रवाई हुई, इसका स्पष्ट जवाब लोगों के सामने नहीं आया। यही स्थिति अगर बार-बार दोहराई जाएगी तो जांच का उद्देश्य ही क्या रह जाएगा?
देवघर में सावन के महीने में उमड़ने वाली भारी भीड़ और खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग भी इसी सवाल को जन्म देती है। जब स्थानीय स्तर पर दूध की उपलब्धता सीमित है तो इतनी बड़ी मात्रा में खोवा और दूध से बने दूसरे उत्पाद आखिर आते कहां से हैं? समय-समय पर खोवा और अन्य खाद्य पदार्थों के नमूनों की जांच में गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। फिर भी कार्रवाई के नाम पर यदि केवल खानापूर्ति हो तो समस्या कैसे खत्म होगी?
दरअसल, खाद्य सुरक्षा केवल स्वास्थ्य विभाग या फूड इंस्पेक्टर की जिम्मेदारी नहीं है। यह सरकार, निर्माता, दुकानदार और उपभोक्ता—सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। निर्माता को मुनाफे से पहले गुणवत्ता को महत्व देना होगा, दुकानदार को संदिग्ध सामग्री बेचने से बचना होगा और सरकार को नियमित तथा पारदर्शी जांच के साथ दोषियों पर ऐसी कार्रवाई करनी होगी जिसका स्पष्ट संदेश जाए।
सबसे जरूरी है कि जांच की प्रक्रिया को महज कागजी कार्रवाई न बनाया जाए। नमूना लेना तभी सार्थक है जब खराब पाए जाने पर कार्रवाई भी हो और उस कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक भी की जाए। इससे न केवल दोषियों में डर पैदा होगा, बल्कि उपभोक्ताओं का भरोसा भी बढ़ेगा।
आखिर भोजन कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसमें गुणवत्ता से समझौता किया जा सके। खराब सड़क या खराब सुविधा से असुविधा हो सकती है, लेकिन दूषित भोजन और पानी सीधे इंसान की जिंदगी और स्वास्थ्य से जुड़ा सवाल है। इसलिए अब समय आ गया है कि खानपान की गुणवत्ता को सरकारी फाइलों का विषय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और नागरिक अधिकार का विषय माना जाए।
सवाल केवल यह नहीं है कि जांच कितनी हुई, सवाल यह है कि जांच के बाद कार्रवाई कितनी हुई और उससे व्यवस्था में सुधार कितना आया। यही वह कसौटी है जिस पर हमारी पूरी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को परखा जाना चाहिए।

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