कहते हैं कि अगर इरादे फौलादी हों, तो किस्मत की लकीरें भी रास्ता बदल देती हैं। हरियाणा के एक छोटे से गांव निंबी की रहने वाली दिव्या तंवर की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है। दिव्या का यह सफर सिर्फ UPSC
परीक्षा को पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक मां के अटूट विश्वास और उसकी बेटी के कभी न हार मानने वाले संकल्प की गाथा है। आज देश भर के लाखों छात्रों के लिए दिव्या तंवर एक रोल मॉडल बन चुकी हैं।
बचपन में उठा पिता का साया, मां ने खेतों में की मजदूरी
दिव्या का शुरुआती जीवन बेहद कठिनाइयों से भरा रहा। साल 2011 में जब वह महज 8-9 साल की थीं, तब उनके पिता का असमय निधन हो गया। पिता की मौत के बाद पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर में दिव्या और उनके तीन भाई-बहनों की जिम्मेदारी अकेले उनकी मां बबीता तंवर के कंधों पर आ गई। ऐसी कठिन परिस्थितियों में अक्सर बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, लेकिन मां बबीता का हौसला नहीं डगमगाया। उन्होंने
बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन-रात मेहनत की, खेतों में मजदूरी की और रात में कपड़े सिलने का काम भी किया ताकि बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसे जुटाए जा सकें।
स्कूल में जगी अफसर बनने की चाह, ट्यूशन पढ़ाकर निकाला खर्च
दिव्या पढ़ाई में बचपन से ही काफी तेज थीं। उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव के ही सरकारी स्कूल से हुई, जिसके बाद उनका चयन जवाहर नवोदय विद्यालय के लिए हो गया। इसके बाद उन्होंने सरकारी महिला कॉलेज से BSc की डिग्री हासिल की। स्कूल के दिनों में जब दिव्या ने अपने स्कूल के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आए एक एसडीएम (SDM) अधिकारी को देखा, तो उनके मन में भी देश की सेवा करने और समाज में सम्मान पाने की ललक जागी। उसी दिन उन्होंने ठान लिया कि वह भी एक दिन बड़ी प्रशासनिक अधिकारी बनेंगी। अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए दिव्या बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाती थीं ताकि उनकी मां पर आर्थिक बोझ थोड़ा कम हो सके।
बिना महंगी कोचिंग और बिना इंटरनेट के रचा इतिहास
आजकल जहां लोग सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए लाखों रुपये की महंगी कोचिंग, हाई-स्पीड इंटरनेट और बड़े-बड़े गैजेट्स को जरूरी मानते हैं, वहीं दिव्या ने इसके बिल्कुल उलट रास्ता चुना। घर में जगह बहुत कम थी, संसाधन सीमित थे, लेकिन दिव्या ने घर के एक छोटे से कमरे में बैठकर रोजाना 10-10 घंटे तक कड़ी मेहनत की। उन्होंने बिना किसी कोचिंग के सेल्फ स्टडी और मुफ्त ऑनलाइन स्टडी मटेरियल के दम पर तैयारी शुरू की। दिव्या ने अपनी इस पूरी यात्रा में हिंदी माध्यम को चुना और अपनी तैयारी को मजबूत करने के लिए एनसीईआरटी (NCERT) की किताबों को अपना आधार बनाया।
पहले ही प्रयास में 21 की उम्र में बनीं IPS, अगले ही साल हासिल किया IAS का मुकाम
दिव्या की इस कठिन तपस्या का फल साल 2021 में मिला, जब उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में मात्र 21 वर्ष की आयु में यूपीएससी (UPSC) परीक्षा क्रैक कर ली। उन्होंने ऑल इंडिया 438वीं रैंक हासिल की और देश की सबसे युवा महिला आईपीएस (IPS) अधिकारियों में से एक बनीं।
उन्हें मणिपुर कैडर मिला और उन्होंने इसकी ट्रेनिंग भी शुरू कर दी, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य तो IAS बनना था।
उन्होंने अपनी ड्यूटी और जिम्मेदारियों के साथ-साथ पढ़ाई की निरंतरता को बनाए रखा। उनका यह प्रयास अगले ही साल रंग लाया, जब यूपीएससी 2022 के परीक्षा परिणामों में उन्होंने जबरदस्त सुधार करते हुए ऑल इंडिया 105वीं रैंक हासिल की और महज 22 साल की उम्र में अपने आईएएस (IAS) बनने के सपने को सच कर दिखाया। दिव्या की इस अभूतपूर्व सफलता ने साबित कर दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि मेहनत पूरी ईमानदारी से की जाए तो सफलता मिलकर ही रहती है।
