हॉस्टल नहीं, छात्रों की जिंदगी दांव पर है

 

दिल्ली विश्वविद्यालय के 91 कॉलेजों में दाखिले के लिए देशभर से करीब 15 लाख बच्चे आवेदन करते हैं। इनमें लगभग 90 हजार विद्यार्थियों को दाखिला मिलता है। इन कॉलेजों में पढऩे वाले लाखों विद्यार्थियों में से महज 7324 को ही हॉस्टल की सुविधा मिल पाती है। बाकी विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पढ़ाई नहीं, रहने की सुरक्षित जगह तलाशना होती है।
दिल्ली में हाल में एक बहुमंजिला इमारत के ढहने की घटना में सात छात्रों की मौत ने इस पूरे सवाल को फिर सामने ला खड़ा किया है। ये वे छात्र हैं जो अपने सुनहरे भविष्य का सपना लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली आते हैं। उनके माता-पिता अपना पेट काटकर बच्चों की पढ़ाई और रहने का इंतजाम करते हैं। लेकिन क्या कभी किसी ने यह सोचने की कोशिश की कि इन बच्चों को आखिर कहां और किन परिस्थितियों में रहना पड़ता है?
निजी हॉस्टल, पीजी और छोटे-छोटे कमरों में रहने के लिए एक विद्यार्थी को औसतन 10 से 15 हजार रुपये प्रतिमाह खर्च करने पड़ते हैं। सामान्य परिवार के लिए यह रकम छोटी नहीं है। फीस, किताबें, भोजन, यात्रा और अन्य खर्चों के बीच इतना पैसा केवल रहने के लिए जुटाना अभिभावकों के लिए कितनी बड़ी चुनौती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन सवाल केवल पैसे का नहीं है। सवाल सुरक्षा, सम्मान और मानसिक दबाव का भी है।
जब कोई छात्र अपने घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर पढ़ता है, तो उसके सामने पढ़ाई के साथ रहने, खाने, सुरक्षा और भविष्य की चिंता भी होती है। परिवार की आर्थिक स्थिति और उनकी उम्मीदों का दबाव अलग। ऐसे में असफलता की छोटी-सी आहट भी कई बार उसे भीतर तक तोड़ देती है। इसके बाद छात्रों से जुड़े आत्महत्या, अवसाद और अन्य मानसिक संकट के मामले सामने आते हैं। यह अलग और बेहद गंभीर विषय है, लेकिन इसकी जड़ में कहीं न कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था का वह चेहरा भी है जिसे हम देखने से बचते रहे हैं।
हमने शिक्षा के लिए स्कूल और कॉलेज तो बना दिए, लेकिन कभी गंभीरता से यह नहीं सोचा कि वहां पढऩे वाले बच्चे रहेंगे कहां?
आजादी के 80 वर्ष बाद भी अगर देश की राजधानी में देशभर से पढऩे आए विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित हॉस्टल नहीं हैं, तो यह केवल दिल्ली विश्वविद्यालय या दिल्ली सरकार का सवाल नहीं है। यह हमारी पूरी शिक्षा नीति और शासन व्यवस्था पर सवाल है। सरकार किसी भी दल की रही हो, सत्ता में अलग-अलग राजनीतिक दलों को पर्याप्त समय और अवसर मिले हैं। मगर विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त हॉस्टल, सुरक्षित पीजी और सस्ती आवासीय व्यवस्था कभी चुनावी प्राथमिकता नहीं बन सकी।
क्यों? क्योंकि शायद यह वोट बैंक का मुद्दा नहीं है।जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्र की राजनीति में जब तैयार वोट बैंक दिखाई देता हो, तब शिक्षा, हॉस्टल, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षित आवास जैसे मूल सवालों को पीछे धकेल देना राजनीतिक रूप से ज्यादा सुविधाजनक लगता है। दुखद यह है कि जनता भी कई बार इन्हीं भावनात्मक मुद्दों में उलझकर अपने वास्तविक सवालों को भूल जाती है।
दिल्ली की घटना के बाद जांच होगी। आयोग बनेगा। जिम्मेदारी तय होगी। कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई भी हो सकती है। कुछ दिनों तक बहस चलेगी और फिर सब कुछ धीरे-धीरे शांत हो जाएगा। फिर हम अगली इमारत गिरने का इंतजार करेंगे। क्योंकि दिल्ली का यह हादसा न पहला है और न ही दुर्भाग्य से आखिरी होने वाला है, अगर हमने इससे कोई सबक नहीं लिया।
जरूरत केवल जर्जर इमारतों की जांच कराने की नहीं है। जरूरत है देश के हर बड़े शिक्षा केंद्र में विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित, सस्ता और पर्याप्त आवास सुनिश्चित करने की। जिस बच्चे को हम देश का भविष्य कहते हैं, उसे वर्तमान में असुरक्षित परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर करना हमारी सबसे बड़ी विडंबना है।
सवाल यह नहीं है कि दिल्ली हादसे का दोषी कौन है। बड़ा सवाल यह है कि क्या इस हादसे के बाद व्यवस्था बदलेगी?
या फिर कुछ दिनों बाद हम सब भूल जाएंगे और अगली इमारत के गिरने का इंतजार करते रहेंगे?

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