(सारंडा में नक्सली-फाईल फोटो)
मनोहरपुर संवाददाता: देश के कई नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अब हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। एक ओर सुरक्षा बलों की लगातार बढ़ती पकड़ तो दूसरी ओर माओवादियों की कमजोर होती स्थिति इन सबके बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या लंबे समय से सक्रिय नक्सली नेता मिसिर बेसरा के पास अब सिर्फ दो ही रास्ते बचे हैं मुठभेड़ में मौत या आत्मसमर्पण? । लेकिन इस बहस के बीच एक अहम पहलू अक्सर नजरअंदाज हो जाता है—क्या मिसिर बेसरा को भी अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए?
कई वर्षों से सशस्त्र संघर्ष में सक्रिय रहे मिसिर बेसरा न केवल एक नाम हैं, बल्कि उस विचारधारा और संघर्ष के प्रतीक भी हैं, जिसने दशकों तक देश के कई हिस्सों में अपनी पकड़ बनाए रखी।उनके कई करीबी साथी अब आत्मसमर्पण कर चुके हैं। ऐसे में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि उनके मन में इस बदलते हालात को
लेकर क्या चल रहा है।
साथियों के आत्मसमर्पण का असर
लगातार हो रहे आत्मसमर्पण ने माओवादी संगठनों की कमर तोड़ी है। जिन साथियों के साथ वर्षों तक जंगलों में संघर्ष किया, उनके मुख्यधारा में लौटने से मिसिर बेसरा जैसे नेताओं के मानसिक और रणनीतिक हालात पर असर पड़ना स्वाभाविक है। क्या वे भी इस रास्ते पर विचार कर रहे हैं या फिर अपने विचारों और संघर्ष को अंत तक जारी रखने का मन बना चुके है । यह जानना बेहद जरूरी है।
सुरक्षा बलों का बढ़ता दबाव
झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में अब सुरक्षा बलों ने FOB (Forward Operating Base) कैंपों का जाल बिछा दिया है। हर तरफ निगरानी और दबाव के कारण माओवादियों की स्थिति पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुकी है। खाने-पीने से लेकर संसाधनों की कमी तक अब उनका जीवन पहले जैसा नहीं रहा।
छत्तीसगढ़ मॉडल क्यों नहीं दोहराया जा रहा?
छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा को अपनाया। वहां सरकार की पुनर्वास नीति और सख्त कार्रवाई दोनों का असर देखने को मिला।
लेकिन सवाल यह है कि झारखंड और सारंडा जैसे क्षेत्रों में वैसी स्थिति क्यों नहीं बन पाई?
क्या यहां के माओवादी आत्मसमर्पण को कमजोरी मानते हैं या फिर उन्हें व्यवस्था पर भरोसा नहीं है? क्या संवाद का रास्ता खुल सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी लंबे संघर्ष का अंत सिर्फ गोली से नहीं, बल्कि संवाद से होता है। अगर मिसिर बेसरा जैसे नेताओं को अपनी बात रखने, अपनी मांगों को सामने रखने का मौका दिया जाए तो शायद एक स्थायी समाधान की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है। आने वाले दिनों में क्या? नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में माना जा रहा है। ऐसे में मिसिर बेसरा की भूमिका और प्रतिक्रिया बेहद अहम हो जाती है। क्या वे आत्मसमर्पण करेंगे? क्या यह फिर आखिरी सांस तक संघर्ष करेंगे? या फिर कोई नया रास्ता निकालने की कोशिश करेंगे?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में मिलेंगे। लेकिन एक बात साफ है इस संघर्ष के अंत में सिर्फ जीत-हार नहीं बल्कि एक विचारधारा का भविष्य भी तय होगा। देखते है आने वाले समय में सारंडा में नक्सली क्या कदम उठाते हैं।
